Friday, September 10, 2010

सूर के पद - Sur Ke Pad

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मुख दधि लेप किए

सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥

चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥

कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥


प्रभू! जी मोरे औगुन चित न धरौ ।
सम दरसी है नाम तुम्हारौ , सोई पार करौ ॥

इक लोहा पूजा मैं राखत , इक घर बधिक परौ ॥
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ ॥

इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ ॥
जब मिलिगे तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परौ ॥

तन माया जिव ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ॥
कै इनकौ निर्धार कीजिये, कै प्रन जात टरौ ॥


मैं नहिं माखन खायो

मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।

हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो|
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥


कबहुं बढैगी चोटी

मैया कबहुं बढैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥

तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढत गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥

काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥



मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?

कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?

गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।

तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।

सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥



चोरि माखन खात
चली ब्रज घर घरनि यह बात।
नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥
कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥
कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥
कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥
सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥



मन न भए दस-बीस
ऊधौ मन न भए दस-बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस।
आसा लागि रहत तन स्वासा जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के सकल जोग के ईस।
सूर हमारैं नंदनंदन बिनु और नहीं जगदीस॥



मन माने की बात
ऊधौ मन माने की बात।
दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥
ज्यौं चकोर को देइ कपूर कोउ तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरि काठ मैं बंधत कमल के पात॥
ज्यौं पतंग हित जानि आपनौ दीपक सौं लपटात।
सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥


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बसंती हवा केदारनाथ अग्रवाल

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हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ
सुनो बात मेरी अनोखी हवा हूँ

बड़ी बावली हूँ
बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फ़िकर है
बड़ी ही निडर हूँ
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ
मुसाफिर अजब हूँ।
न घर बार मेरा
न उद्देश्य मेरा
न इच्छा किसी की
न आशा किसी की
न प्रेमी न दुश्मन
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ
हवा हूँ हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं
शहर गाँव बस्ती
नदी खेत पोखर
झुलाती चली मैं
हवा हूँ हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ
थपाथप मचाया
गिरी धम्म से फिर
चढ़ी आम ऊपर
उसे भी झकोरा
किया कान में ''कू''
उतर कर भगी मैं
हरे खेत पहुँची
वहाँ गेहुँओं में
लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं।
खड़ी देख अलसी
मुझे खूब सूझी
हिलाया झुलाया
गिरी पर न अलसी
इसी हार को पा
हिलाई न सरसों
झुलाई न सरसों
हवा हूँ हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई
मनाया बनाया
न मानी न मानी
उसे भी न छोड़ा
पथिक आ रहा था
उसी पर ढकेला
हँसी ज़ोर से मैं
हँसी सब दिशाएँ
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी।
हवा हूँ हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

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Guru Nanak Dev ke pad

गुरु नानकदेव के पद
Guru Nanakdev Ke Pad

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झूठी देखी प्रीत

जगत में झूठी देखी प्रीत।
अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत॥
मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥

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को काहू को भाई

हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥



दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥

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Raheem ke dohe

रहीम के दोहे
Raheem Ke Dohe
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एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥

अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥

गरज आपनी आप सों रहिमन कहीं न जाया।
जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात लजाया॥

छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

खीरा को मुंह काटि के, मलियत लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय॥

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

जे गरीब सों हित करै, धनि रहीम वे लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥

जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घटि जांहि।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नांहि॥

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥

रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥ 
                                 
                                         __रहीम
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Thursday, September 9, 2010

कबीर की कुंडलियां Kabir Ki Kundaliyan


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माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर
कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर
मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला
धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला
कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी
धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो


आया है किस काम को किया कौन सा काम
भूल गए भगवान को कमा रहे धनधाम
कमा रहे धनधाम रोज उठ करत लबारी
झूठ कपट कर जोड़ बने तुम माया धारी
कहते दास कबीर साहब की सुरत बिसारी
मालिक के दरबार मिलै तुमको दुख भारी


चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय
साबित बचा न कोय लंका को रावण पीसो
जिसके थे दस शीश पीस डाले भुज बीसो
कहिते दास कबीर बचो न कोई तपधारी
जिन्दा बचे ना कोय पीस डाले संसारी


कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
ना काहू से बैर ज्ञान की अलख जगावे
भूला भटका जो होय राह ताही बतलावे
बीच सड़क के मांहि झूठ को फोड़े भंडा
बिन पैसे बिन दाम ज्ञान का मारै डंडा |

                                    ___ कबीर
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कबीर के दोहे Kabir Ke Dohe


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चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥

जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम ।
दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम ॥

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥
                                 ___कबीर 
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Sunday, September 5, 2010

Mantra purane kaam na denge,mantra naya padhna hai - Gulab khandelwal मन्त्र पुराने काम नं देंगें, मन्त्र नया पढ़ना है (तृतीय सर्ग)  - गुलाब खंडेलवाल


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मन्त्र पुराने काम नं देंगें, मन्त्र नया पढ़ना है
मानवता के हित मानव का रूप नया गढ़ना है
सागर के उस पार शक्ति का कैसा स्रोत निहित है?
ज्ञान और विज्ञान कौन वह जिससे विश्व विजित है?
मुझे सिंह की गहन गुफा में घुसकर लड़ना होगा
दह में धँस कर कालिय के मस्तक पर चढ़ना होगा
मुक्ति नहीं, पिंजरे में पक्षी कितना भी पर मारे
बिना युक्ति के राम न मिलते, कोई लाख पुकारे’

. . .

मद्य-मांस-मुक्ताचारी उस भ्रष्ट देश में जाकर
लौट सका है कोई अपना धर्माचरण बचाकर!
यद्यपि मोहन के चरित्र में तनिक नहीं है शंका
किन्तु मोहिनी मायावाली वह सोने की लंका
उस काजल के घर से अमलिन कौन भला फिर आये!
"मेरे भोले बालक को तो, चाहे जो, ठग जाये"
जननी की आँखों को लगता पुत्र सदा बालक ही
कितना भी हो जाय बड़ा, रहता है घुटनों तक ही
कंस-विजय को दया यशोदा ने देवों की माना
कब, रावण का जयी, राम को कौशल्या ने जाना
मिल पाये कैसे माँ का आदेश विदेश-गमन को?
चैन न लेने देती थी चिंता मोहन के मन को
माँ का आकुल प्रेम उधर श्रृंखला-सदृश लिपटा था
पंख तोलता उड़ने को नवयौवन इधर डटा था...

Aaj sukhi me kitni pyare - Hariwansha Rai Bacchan आज सुखी मैं कितनी,प्यारे' / हरिवंशराय बच्चन


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’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

चिर अतीत में ’आज’ समाया,
उस दिन का सब साज समाया,
किंतु प्रतिक्षण गूँज रहे हैं नभ में वे कुछ शब्द तुम्हारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

लहरों में मचला यौवन था,
तुम थीं, मैं था, जग निर्जन था,
सागर में हम कूद पड़े थे भूल जगत के कूल किनारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

साँसों में अटका जीवन है,
जीवन में एकाकीपन है,
’सागर की बस याद दिलाते नयनों में दो जल-कण खारे!’
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’ 
 
                                      __ हरिवंशराय बच्चन

Saturday, September 4, 2010

Garibo ki Jawani (गरीबो की जवानी)    - Devi Prasad Shukla(देवी प्रसाद शुक्ल 'राही') 

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रूप
से कह दो की देखे दूसरा घर ,
में गरीबो की जवानी हूँ ,मुझे फुर्सत नहीं है |

बचपने में मुश्किलों की गोद में पलती रही मैं
धुंए की चादर लपेटे,हर घड़ी जलती रही मैं
ज्योति की दुल्हन बिठाए, ज़िन्दगी की पालकी में
सांस की पगडंडियों पर रात - दिन चलती रही मैं
वे ख़रीदे स्वप्न, जिनकी आँख पर सोना चढ़ा हो
मैं आभावों की कहानी हूँ ,मुझे फुर्सत नहींन है |

मानती हूँ मैं, की मैं भी आदमी का मन लिए हूँ
देह की दीवार पर, तस्वीर सा यौवन लिए हूँ
भूख की ज्वाला बुझौ , या रचाऊँ रास लीला
आदमी हूँ ,देवताओं से कठिन जीवन लिए हूँ
तितलियों, पूरा चमन है,प्यार का व्यापार कर लो
मैं समर्पण की दीवानी हूँ, मुझे फुर्सत नहीं है|

जी रहीं हूँ क्योकि मैं निर्माण की पहली कड़ी हूँ
आदमी की प्रगति बनकर,हर मुसीबत से लड़ी हूँ
मैं समय के पृष्ठ पर श्रम की कहानी लिख रही हूँ
नींद की मदिरा छिड़को,मैं परीक्षा की घड़ी हूँ

हो जिन्हें अवकाश ,खेले रूप रंगों के खिलौने
मैं पसीने की रवानी हूँ, मुझे फुर्सत नहीं है|

ज़िदगी आखिर कब तक सब की मूरत गढ़ेगी
घुटन जितनी ही अधिक हो, आंच उतनी ही बढ़ेगी
आंधियो को भी बुलाना दर्द वाले जानते हैं
रूढ़ियों की राख कब तक, आंच के सर पर चढ़ेगी
शौक हो जिनको जियें पर्चियों की ओट ले कर
मैं उजाले की निशानी हूँ, मुझे फुर्सत नहीं हैं |

- देवीप्रसाद शुक्ल राही


Friday, August 20, 2010

बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है




बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |
रेशम की डोरी से -
रेशम की डोरी से संसार बंधा है |

सुन्दरता में जो कन्हैया है ,
ममता में यशोदा मैय्याँ है ,
वो और नहीं दूजा कोई वो तो मेरा राजा भैया है ,
बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |

मेरा फूल है तू, तलवार है तू
मेरी लाज का पेहेरेदार है तू
मैं अकेली कहाँ इस दुनियां में
मेरा तो सारा संसार है तू
बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |

हमें दूर भले किस्मत कर दे
अपने मन से जुदा करना
सावन के पावन दिन भैया
बहेना को याद किया करना

बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |


फिल्म - रेशम की डोरी (१९७६),
सुमन कल्यानपुर द्वारा गाया गया था |