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Wednesday, June 11, 2014

Mahfuz - Pallav

महफूज
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माँ !
मैं बहुत खुश हूँ
यहाँ तुम्हारे अंदर...
सुखी,सुरक्षित,निर्भीक
और स्वतन्त्र भी.
ले सकती हूँ
अपनी मर्जी की साँसें
यहाँ मेरे लिए
कोई बंदिश भी नहीं है
फैला सकती हूँ पंखें
उड़ सकती हूँ निर्बाध.
दूर-दूर तक नहीं है यहाँ
घृणित मानसिकता की
घूरती आँखें
आदमजात की खालों में
पशुओं की घातें.
महफूज हूँ उन खतरों से भी
जिससे तुम्हें हर रोज वाकिफ
होना पड़ता है
मेरी दुनियाँ छोटी ही सही पर
तुम्हारी दुनिया जितनी
स्याह और विषैली नहीं है...
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पल्लव 

Thursday, June 27, 2013

Videsh - Mamta Sharma

बच्चे जब काम करने विदेश चले जाते हैं उनके माँ -बाबा पर क्या गुजरती है ........इसी के ऊपर है ये मेरी कविता। कुछ समय तो अपने घर वालों की याद आती है फिर सब कुछ सामान्य।
मगर माँ - पिता वे अपना मोह नहीं त्याग पाते हैं, और माँ की दशा तो सिर्फ महसूस करने योग्य ही होती है .......
 
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विदेश 
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क्या गुजरती  उन पे है ,तुम छोड़ जाते हो जब अकेला

टीस सी उठती है मन में ,ज्यों अकेला हो ये मेला

बूढी आँखें सुख- व् -दुःख में ,गीली हो -हो सूख गईं

पुत्र  प्रेम की वो डोर जपते -जपते चूर हुई
 
 
 

कोई आता अपने मन के भाव भर वो थैलियों में

भेजते हैं दूर देश प्रेम मन का थैलियों में

अश्रु पूर्ण आँखों से चुन - चुन कर तेरी रुचियाँ

माँ भरती मुट्ठी में भेजती तुझको है खुशियाँ
 
 
 

फ़ोन  पर सुन तेरी बातें ,चाहती छिपाना भाव

शक ना हो तुझे कोई झेल जाती है वो घाव

यूँ ही लड़ झगड़ के वो काटते हैं अपनी शाम

क्यों हमने सींचे बाग़ क्यों हमने रोपे आम
 
 
 

बेटा तू छोड़ - छाड़ आ जा अब यहाँ ही

हमें क्यों बुला है रहा घर अपना यहाँ ही

पर   बेटा गया जो है आएगा कहाँ  वापिस

वह तो सुख की दुनियाँ,दुःख से हो क्या हासिल
 
 
 

अपने बच्चे अपनी बीवी ,माँ  की जगह टीवी

सुख -सुविधा धन - माया ,सब की तो यहीं वीथी
 
 
पलक पांवड़े बिछाये ,दिन बीते  रात जाएँ 
 
 
बेटा - बहू  गए  जो हैं  लौट के शायद वो आयें  ................
 
~~ ममता शर्मा ~~ 
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Us Raat - Mamta Sharma

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उस रात
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कुछ रात हुआ भीषण निकृष्ट,सब ने पढ़ लिया पत्र में भोर।
खूब बातें झाड़ीं हर मुँह ने ,गाल बजे हुआ था शोर।
शर्मसार परिवार था रोया , दर्द से टूटा था हर पोर।
आज दिवस व् रात्रि वही हैं , घर से उनके रूठी भोर।
 
 
भूली दुनिया, रूठी खुशियाँ , उनका आज न ओर न छोर।
कहाँ गईं वे सहानुभूतियाँ , कवि ,टी वी वालों का जोर।
खा गए बीच -बिचौली वाले , रूपये लूटे ताबड़ - तोड़।
छोड़ शहर मकान बेच कर , भगे बिचारे बस्ती छोड़।
 
 
इस दुनिया में भाषण चक - मक, बातें होतीं होड़म- होड़।
कहाँ गए सुख -दुःख के साथी, दुनियां पर है छाया कोढ़।
कैसा शहर ये कैसा मेट्रो , चुरा ले गया सब जमा-जोड़।
हार गए बेचारे थक कर, याद आये गाँवों के मोड़।
 
~~ ममता शर्मा ~~ 
 
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Meri Maa - Bhavana Tiwari

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 मेरी माँ
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अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ ,
चूल्हे चौके से घिरी,प्यार भरी,घर को घर सा बनाएँ, मेरी माँ ..!!

अंक में प्यार भरे ,
सोच को पंख दिए
पूजे बरगद तुलसी ,
हाथ में शंख लिए !
अपनी चोटi में गूँथ लीं तुमने,मेरे सर की बलाएँ ,मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!

तेरे वरदान फले ,
मुझको सम्मान मिले
चार धामों के सभी,
पुण्य चरणों में मिले !
मेरे जीवन में कड़ी धूप बढ़ी,अपना आशिष उढ़ाएँ,मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!

भोर की पहली किरण,
प्रार्थनाओं का चलन ,
सब दवाओं में दुआ
मंत्र पढ़ती है छुअन !
दर्द को दूर उड़ा ले के गईं ,बनके ठण्डी हवाएँ मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!


~~ भावना तिवारी ,कानपूर  ~~ 
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Us chaukhat se - Devendra Sharma

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उस चौखट से 
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उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ,
कुछ ख्वाबो का दरिया , सपनीली रात थी ,
कहना बहुत था ,सुनाने थे किस्से ,
यादों ने रखे थे अनजाने हिस्से ,
बेबस सी रोती वो चौखट दुखी थी ,
बांटी थी खुशिया जो ,शायद छिपी थी ,
जो अरमाँ संजोते थे अक्सर इकठ्ठे ,
जो नज़्मे लिखी थी यूँ लड़ते झगड़ते ,
वो रूठे मनाते , वो किस्से सुनाते ,
बारिश में मिलकर वो बूंदे चुराते ,
वो सिसकी वो आंसू जो बहते से उसपे ,
वो आंगन के पौधों से तितली उड़ाते ,
वो ममता का आँचल वो अपनों सा रिश्ता ,
वो अश्को की ज्वाला में अरमाँ झुलसते ,
कुछ छूटी हुई सी अनकही बात थी ,
हाँ उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ...
~~ देवेन्द्र शर्मा ~~ 
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