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Wednesday, June 11, 2014
Prayatn - Sumit Jain
प्रयत्न
____________________________
मनुष्य का जीवन सफलता
और असफलता के बिच घिरा हुआ है
मानो इस का कारण प्रयत्न ही तो है
किसी को थोडा तो किसी को ज्यादा
और किसी को कुछ भी नहीं
प्रत्येक प्रयत्न सफल होता है
आज नहीं तो कल होता है
व्यक्ति हर पल प्रयत्न करता है
कभी वह अपने आप से
कभी नींद से जाग ने के लिए
कभी तो जाग कर सोने के लिए
कभी वह जित ने के लिए
कभी वह हार ने के लिए
कभी दुनिया से लढने के लिए
फिरभी वह प्रयत्न करता ही जाता
क्यों मनुष्य जल्दी से विचलित हो जाता है
और अपने को गम के आसु से भिगो देता है
क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकता असफलता को
या क्यों खुश हो जाता है सफलता से
और क्यों भाग खड़ा होता है प्रयत्न करने से
पानी की बूंद- बूंद से घड़ा भरता है
वैसे ही थोड़ा थोड़ा प्रयत्न करने से
एक दिन सफलता मिल ही जाती है
प्रयत्न का मतलब ही तो स्वयं को खोजना
और जीवन को सही राह बताना है
सफलता की कुंजी ही है एक मात्र प्रयत्न
हमें जोड़ना होगा स्वयं को व्यक्ति से,
और व्यक्ति को धर्म से
मुक्ति के मार्ग पर चल ने के लिए
हमें प्रयत्न करना है - और करते रहना है!!
और असफलता के बिच घिरा हुआ है
मानो इस का कारण प्रयत्न ही तो है
किसी को थोडा तो किसी को ज्यादा
और किसी को कुछ भी नहीं
प्रत्येक प्रयत्न सफल होता है
आज नहीं तो कल होता है
व्यक्ति हर पल प्रयत्न करता है
कभी वह अपने आप से
कभी नींद से जाग ने के लिए
कभी तो जाग कर सोने के लिए
कभी वह जित ने के लिए
कभी वह हार ने के लिए
कभी दुनिया से लढने के लिए
फिरभी वह प्रयत्न करता ही जाता
क्यों मनुष्य जल्दी से विचलित हो जाता है
और अपने को गम के आसु से भिगो देता है
क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकता असफलता को
या क्यों खुश हो जाता है सफलता से
और क्यों भाग खड़ा होता है प्रयत्न करने से
पानी की बूंद- बूंद से घड़ा भरता है
वैसे ही थोड़ा थोड़ा प्रयत्न करने से
एक दिन सफलता मिल ही जाती है
प्रयत्न का मतलब ही तो स्वयं को खोजना
और जीवन को सही राह बताना है
सफलता की कुंजी ही है एक मात्र प्रयत्न
हमें जोड़ना होगा स्वयं को व्यक्ति से,
और व्यक्ति को धर्म से
मुक्ति के मार्ग पर चल ने के लिए
हमें प्रयत्न करना है - और करते रहना है!!
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सुमित जैन
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सुमित जैन
Mujhe Sangharshrat rehne do - Sanjay Kirar
मुझे संघर्षरत रहने दो
_________________________
मुझे संघर्षरत रहने दो
अभी हवाओ की डोर थामी है
मौसमों से कहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
तलवों ने अभी रेत चूमी
जिज्ञासा अभी इर्द हिर्द घूमी है
अंगड़ाई लेकर रूह जागी अभी
इसे प्रातः की पहली किरण छूने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
इतनी प्यास की समुन्दर सूख जाए
इतिहास आज खुद से ऊब जाए
जीवन मरण की सेज बिछाकर
कुछ कर्त्तव्य अर्पित करने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
माना घनी रात है उजाला नहीं
प्रेरणा दीप से कब डरा धुधलका नहीं
एक दीप ही सही आंधियो में
प्रेरणा के नाम प्रज्वलित रहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
अभी हवाओ की डोर थामी है
मौसमों से कहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
तलवों ने अभी रेत चूमी
जिज्ञासा अभी इर्द हिर्द घूमी है
अंगड़ाई लेकर रूह जागी अभी
इसे प्रातः की पहली किरण छूने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
इतनी प्यास की समुन्दर सूख जाए
इतिहास आज खुद से ऊब जाए
जीवन मरण की सेज बिछाकर
कुछ कर्त्तव्य अर्पित करने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
माना घनी रात है उजाला नहीं
प्रेरणा दीप से कब डरा धुधलका नहीं
एक दीप ही सही आंधियो में
प्रेरणा के नाम प्रज्वलित रहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
_________________________
संजय किरार
Saturday, April 19, 2014
Chitran - Adarsh Tiwary
_______________________________
चित्रण
_______________________________
चित्रण
_______________________________
चौकोर सफ़ेद पन्ने सा जीवन चरित्र था मेरा
कोई दाग नहीं, कुछ भी नहीं, अंत किनारा गहरा
जब बरस पड़े कुछ रंग, लाल हरे नीले से सारे
चित्र बना वो ऐसा , सुनहरे चमक मे इंद्रधनुष उखर पड़ा हो जैसे
कागज के कश्ती बन, दरिया मे मैं बह चला
कश्ती और पानी का, शुरू हुआ यूं सिलसिला
थपेड़ो को झेलता, तूफानों से खेलता
आगे बढ़ चला मैं काफिर सा फुहारो संग संभालता
तूफानो के आगाज से कायर सदैव घबराते हैं,
रंग भरी इस दुनिया मे, कोरे ही रह जाते हैं
जो सैलाब न आते तो ठहराव का जिक्र न होता
जो फुहारे समझ इन्हे पार न करते, उन्हे वीर कहा ना जाता
रास्ते आसान सभी को भाते है,
कुछ अपने रास्ते खुद लिख जाते है
जोखिम उठाना हर एक के बस का नहीं,
चुने कल को गढ़ने के अपने माने होते हैं
रास्ता नया हर वक़्त सहारे को पुकारा करती है
हर शाम ढलने पर निशा सूरज को आवाज़ देती हैं
आत्म परिभाषित ये जीवन का मेरा यह एक अंश हैं
प्रीत संकल्प का चित्रण है, यह मेरे स्वेत लेखन मे।।
- आदर्श तिवारी
_______________________________
Friday, October 25, 2013
Bharat ka yuvak - Puneet Jain
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भारत का युवक
--------------------------------------------------
युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .
ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .
हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .
खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .
बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .
बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,
युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती
बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .
उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .
लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,
हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।
- पुनीत जैन
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भारत का युवक
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युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .
ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .
हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .
खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .
बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .
बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,
युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती
बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .
उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .
लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,
हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।
- पुनीत जैन
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Thursday, June 27, 2013
Sipahi - Mamta Sharma
============================
''सिपाही ''
============================
जय घोष करो , उद्घोष करो
सम्मान करो आजादी का।
संतोष करो न रोष करो ,
उठो ! संबल बनो सिपाही का।
हम मिलें - जुलें सुख में रहते,
वे धूप ,ठण्ड ,गोली सहते,
वे विलग समाज से दुःख सहते,
चलो ! मान करो सिपाही का।
उन्हें क्या हम कुछ दे पाते है
वे राष्ट्र पे बलि - बलि जाते हैं ,
सीने पे गोली खाते हैं ,
सम्मान करो सिपाही का।
ये देश है हर एक राही का ,
क्या फर्ज सभी सिपाही का ,
चलो उस सम हम कुछ कर्म करें,
हर बच्चा बने सिपाही सा।
~~ ममता शर्मा ~~
============================
''जय हिन्द''
============================
Amrit Kalash baat do jag me - Anand Vishwas
===========================================
अमृत-कलश बाँट दो जग में
===========================================
अगर हौसला तुम में है तो,
कठिन नहीं है कोई काम।
पाँच - तत्व के शक्ति - पुंज,
तुम सृष्टी के अनुपम पैगाम।
तुम में जल है, तुम में थल है,
तुम में वायु और गगन है।
अग्नि-तत्व से ओत-प्रोत तुम,
और सुकोमल मानव मन है।
संघर्ष आज, कल फल देगा,
धरती की शक्ल बदल देगा।
तुम चाहो तो इस धरती पर,
सुबह सुनहरा कल होगा।
विकट समस्या जो भी हो,
वह उसका निश्चित हल देगा।
नीरस जीवन में भर उमंग,
जीवन जीने का बल देगा।
सागर की लहरों से ऊँचा,
लिये हौसला बढ़ जाना है।
हो कितना भी घोर अँधेरा,
दीप ज्ञान का प्रकटाना है।
उथल-पुथल हो भले सृष्टि में,
झंझावाती तेज पवन हो।
चाहे बरसे अगन गगन से,
विचलित नहीं तुम्हारा मन हो।
पतझड़ आता है आने दो,
स्वर्णिम काया तप जाने दो।
सोना तप कुन्दन बन जाता,
वासन्ती रंग छा जाने दो।
संधर्षहीन जीवन क्या जीवन,
इससे तो बेहतर मर जाना।
फौलादी ले नेक इरादे,
जग को बेहतर कर जाना।
मानव-मन सागर से गहरा,
विष, अमृत दोनों हैं घट में।
विष पी लो विषपायी बन कर,
अमृत-कलश बाँट दो जग में।
~~ आनन्द विश्वास ~~
अगर हौसला तुम में है तो,
कठिन नहीं है कोई काम।
पाँच - तत्व के शक्ति - पुंज,
तुम सृष्टी के अनुपम पैगाम।
तुम में जल है, तुम में थल है,
तुम में वायु और गगन है।
अग्नि-तत्व से ओत-प्रोत तुम,
और सुकोमल मानव मन है।
संघर्ष आज, कल फल देगा,
धरती की शक्ल बदल देगा।
तुम चाहो तो इस धरती पर,
सुबह सुनहरा कल होगा।
विकट समस्या जो भी हो,
वह उसका निश्चित हल देगा।
नीरस जीवन में भर उमंग,
जीवन जीने का बल देगा।
सागर की लहरों से ऊँचा,
लिये हौसला बढ़ जाना है।
हो कितना भी घोर अँधेरा,
दीप ज्ञान का प्रकटाना है।
उथल-पुथल हो भले सृष्टि में,
झंझावाती तेज पवन हो।
चाहे बरसे अगन गगन से,
विचलित नहीं तुम्हारा मन हो।
पतझड़ आता है आने दो,
स्वर्णिम काया तप जाने दो।
सोना तप कुन्दन बन जाता,
वासन्ती रंग छा जाने दो।
संधर्षहीन जीवन क्या जीवन,
इससे तो बेहतर मर जाना।
फौलादी ले नेक इरादे,
जग को बेहतर कर जाना।
मानव-मन सागर से गहरा,
विष, अमृत दोनों हैं घट में।
विष पी लो विषपायी बन कर,
अमृत-कलश बाँट दो जग में।
~~ आनन्द विश्वास ~~
Saturday, May 11, 2013
Prayatn - Abhishek
प्रयत्न
__________________________
मंजिले खोयी नहीं जाती, धुंधलाती रोशनी-ए-मशालो में ,
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलानों में ||
उम्मीदें टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलानों में ||
उम्मीदें टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
अभिमन्युं के भेदन से कोई बच सकता नहीं |
सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||
शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||
सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||
शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||
__________________________
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Saturday, March 16, 2013
Prayatna - Abhishek Gupta
____________________________
प्रयत्न
____________________________
मंजिले खोयी नहीं जाती, धुंधलाती रोशनी-ए-मशालो में ,
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलालो में ||
उमीदे टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
भेदने से थमते नहीं, अर्जुन के बेटे इनके प्रहारों से नहीं||
सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||
शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलालो में ||
उमीदे टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
भेदने से थमते नहीं, अर्जुन के बेटे इनके प्रहारों से नहीं||
सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||
शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||
~~ अभिषेक गुप्ता ~~
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Monday, September 17, 2012
Pyaas Barkarar Rakh - Ashish Pant
प्यास बरकरार रख
_____________________
धूप हो कड़ी तो क्या
तीरगी घनी तो क्या
लक्ष्य का अमृत भी तू
पायेगा पर इतना तो कर
प्यास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
मंजिलें कभी कभी
अदृश्य जो लगें तुझे
तू तनिक आराम कर
एक गहरी सांस भर
आस बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
राह हो, थकान हो
बाधाएँ तमाम हों
नींद भी गर ले पथिक
जगे हुए ख्वाब संग
रास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
हाँ, छूटते हैं आसरे
हाँ, छूटते हैं काफिले
पर सांस छूटने तलक
दिल में हौसलों का तू
वास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
बस धड़कने से ही नहीं
दिल हो जाता दिल है
आदमी बने इन्सान
इसीलिए दिल में तू
आभास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
हर हर्फ़ में जो पीड़ हो
वक़्त गूढ़ गंभीर हो
फीके क्षणों की धार में
थोड़ी हँसी को घोल के
परिहास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
गुलशन जब बेनूर हो
और वसंत कुछ दूर हो
क्रूर खिज़ाओं में डटकर
अपनी आरजूओं के
अमलतास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
नौ भावों से है बना
ये ज़िन्दगी का चित्र है
इक भी कम नहीं पड़े
खुद में नवरसों का तू
एहसास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
कल ही कल की नींव था
कल ही कल का सार है
कभी भी ये भूल मत
भविष्य को तू साध पर
इतिहास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
पहले वार में कहाँ
कटे कभी पहाड़ हैं
हर नदी मगर मिली
अन्तः अपने नदीश से
बस, प्रयास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
धूप हो कड़ी तो क्या
तीरगी घनी तो क्या
लक्ष्य का अमृत भी तू
पायेगा पर इतना तो कर
प्यास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
मंजिलें कभी कभी
अदृश्य जो लगें तुझे
तू तनिक आराम कर
एक गहरी सांस भर
आस बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
राह हो, थकान हो
बाधाएँ तमाम हों
नींद भी गर ले पथिक
जगे हुए ख्वाब संग
रास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
हाँ, छूटते हैं आसरे
हाँ, छूटते हैं काफिले
पर सांस छूटने तलक
दिल में हौसलों का तू
वास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
बस धड़कने से ही नहीं
दिल हो जाता दिल है
आदमी बने इन्सान
इसीलिए दिल में तू
आभास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
हर हर्फ़ में जो पीड़ हो
वक़्त गूढ़ गंभीर हो
फीके क्षणों की धार में
थोड़ी हँसी को घोल के
परिहास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
गुलशन जब बेनूर हो
और वसंत कुछ दूर हो
क्रूर खिज़ाओं में डटकर
अपनी आरजूओं के
अमलतास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
नौ भावों से है बना
ये ज़िन्दगी का चित्र है
इक भी कम नहीं पड़े
खुद में नवरसों का तू
एहसास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
कल ही कल की नींव था
कल ही कल का सार है
कभी भी ये भूल मत
भविष्य को तू साध पर
इतिहास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
पहले वार में कहाँ
कटे कभी पहाड़ हैं
हर नदी मगर मिली
अन्तः अपने नदीश से
बस, प्रयास बरकरार रख
तू प्यास बरकरार रख
~~ आशीष पंत ~~
_____________________
Jo darta nahin - Dr. Pawan Kumar Bharti
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India
Friday, June 22, 2012
Kya banu - Dr.Pawan Kumar "Bharti"
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Sunday, June 17, 2012
Piche mud kar kabhi naa dekho - Anand Vishwas
पीछे मुड़ कर कभी न देखो
_____________________
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
उज्ज्वल "कल" है तुम्हें बनाना,वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।
संघर्ष आज तुमको करना है,
मेहनत में तुमको खपना है।
दिन और रात तुम्हारे अपने,
कठिन परिश्रम में तपना है।
फौलादी आशाऐं ले कर, तुम लक्ष्य प्राप्ति करते जाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
इक-इक पल है बहुत कीमती,
गया समय वापस ना आता।
रहते समय न जागे तुम तो,
जीवन भर रोना रह जाता।
सत्य-वचन सबको खलता है,मुश्किल है सच को सुन पाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
बीहड़ बीयावान डगर पर,
कदम-कदम पर शूल मिलेंगे।
इस छलिया माया नगरी में,
अपने ही प्रतिकूल मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों से मुश्किल बच पाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
कैसे ये होते हैं अपने,
जो सपनों को तोड़ा करते हैं।
मुश्किल में हों आप अगर तो,
झटपट मुँह मोड़ा करते हैं।
एक ईश जो साथ तुम्हारे, उसके तुम हो कर रह जाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
उज्ज्वल "कल" है तुम्हें बनाना,वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।
संघर्ष आज तुमको करना है,
मेहनत में तुमको खपना है।
दिन और रात तुम्हारे अपने,
कठिन परिश्रम में तपना है।
फौलादी आशाऐं ले कर, तुम लक्ष्य प्राप्ति करते जाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
इक-इक पल है बहुत कीमती,
गया समय वापस ना आता।
रहते समय न जागे तुम तो,
जीवन भर रोना रह जाता।
सत्य-वचन सबको खलता है,मुश्किल है सच को सुन पाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
बीहड़ बीयावान डगर पर,
कदम-कदम पर शूल मिलेंगे।
इस छलिया माया नगरी में,
अपने ही प्रतिकूल मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों से मुश्किल बच पाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
कैसे ये होते हैं अपने,
जो सपनों को तोड़ा करते हैं।
मुश्किल में हों आप अगर तो,
झटपट मुँह मोड़ा करते हैं।
एक ईश जो साथ तुम्हारे, उसके तुम हो कर रह जाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
~~ आनन्द विश्वास ~~
_____________________
Ek naya sehar - Ankit Jain
एक नया सहर
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जीवन में विफलताओं का दौर देख घबराना नहीं,
कर सफलता की ओर प्रस्थान, रुकना – थकना कहीं नहीं,
अपने मकसद में तू उत्साह का नया संचार कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
मन का विकास कर, रख सदा शुद्ध आचरण,
समाज राष्ट्र के कल्याण के लिए कर अपना जीवन समर्पण,
गुरुओं के चरणों में पड़ सद्गुणों को ग्रहण कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
अगर हो तेरी राहों में हजारों मुसीबतों का आगमन,
करना तू हर ऐसे शत्रुओं का अद्वितीय साहस से दमन,
होगा भविष्य सुनहरा राह को सुगम कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
ध्रितराष्ट्र जैसे अपाहिजों के लिए तू बन उनका संजय,
भला करेगा उनका तो न देखेगा कभी पराजय,
विजय पथ पर आगे बढ़ उद्धार वस्त्र पहनकर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
मुसीबतों को देख कम न पड़े कभी तेरा जोश,
किन्तु सफलता को नजदीक देख खो न देना होश,
सकारात्मक बन जी ले जीवन का हर एक प्रहर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर
कर सफलता की ओर प्रस्थान, रुकना – थकना कहीं नहीं,
अपने मकसद में तू उत्साह का नया संचार कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
मन का विकास कर, रख सदा शुद्ध आचरण,
समाज राष्ट्र के कल्याण के लिए कर अपना जीवन समर्पण,
गुरुओं के चरणों में पड़ सद्गुणों को ग्रहण कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
अगर हो तेरी राहों में हजारों मुसीबतों का आगमन,
करना तू हर ऐसे शत्रुओं का अद्वितीय साहस से दमन,
होगा भविष्य सुनहरा राह को सुगम कर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
ध्रितराष्ट्र जैसे अपाहिजों के लिए तू बन उनका संजय,
भला करेगा उनका तो न देखेगा कभी पराजय,
विजय पथ पर आगे बढ़ उद्धार वस्त्र पहनकर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर.
मुसीबतों को देख कम न पड़े कभी तेरा जोश,
किन्तु सफलता को नजदीक देख खो न देना होश,
सकारात्मक बन जी ले जीवन का हर एक प्रहर,
कि हर स्याह रात् के बाद आएगा एक नया सहर
~~ अंकित जैन ~~
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