Showing posts with label Rishish Dubey. Show all posts
Showing posts with label Rishish Dubey. Show all posts

Monday, September 17, 2012

Antardwand - Rishish Dubey


अंतर्द्वंद 

________________________________

इस छोर से, उस छोर से
हर ओर ने किसी डोर से
बाँध लिया है चंचल मन
इधर जाऊं की उधर जाऊं
जाने ये कैसा मकडजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है राम की या इस्लाम की
जाने किसके नाम की
है धरा और किसके हम
मंदिर जाऊं या मस्जिद जाऊं
जाने ये कैसा धरमजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

विज्ञानं में और ध्यान में
स्वाभिमान में और अपमान में
है अंतर क्या बड़ी उलझन
ये क्यूँ वो क्यूँ नहीं
जाने ये कैसा बवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है भूत क्या और भविष्य क्या
परोक्ष क्या, प्रत्यक्ष क्या
है नियति क्या, क्या जीवन
कल हो चूका या कल होगा
जाने काल की कैसी चाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

क्यूँ ख़ुशी और अश्रु में
जीवन में और म्रत्यु में
भेद करते हैं अपन
क्यूँ जियूं, क्यूँ ना मरुँ
जाने ये कैसा सवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

-- ऋषीश दुबे 'राही'
_______________________________________

Naadan Khamoshi - Rishish Dubey

नादान खामोशी 
______________________________
जहाँ शोर है वहां तू ही तू 
तू मिले तो हो शुरू गुफ्तगू
तेरा घर कहाँ, क्या तेरा पता
सच सच बता, सच सच बता
कभी आके तू मुझसे भी मिल
ये आरज़ू करे मेरा दिल
की मुझको बता दे राज़ वो 
जो दबी सी है इक बात वो
तू चुप है मगर ये शोर क्यूँ
खीचें मुझे सब ओर क्यूँ 
सब ओर क्यूँ सब ओर क्यूँ
अब कैसे हो 'राही' बेखयाल 
ज़िन्दगी कई सवालों का जाल
सीने में है तूफ़ान सा
हर पल लगे बेईमान सा
सब मिट गया सब मिट गया
धोखा हुआ मैं लुट गया 
ये भाग दौड़ ये जुस्तजू 
कामयाबी का जूनून 
हार जीत की आरजू 
मुझको नहीं, मैं क्या करूँ
मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ
बस हुआ मैं थक गया
तू नहीं मिली मैं जहाँ गया
जवाब भी मुझको बता
अपने दिए सवालों का
क्यूँ चुप है इस तरह
असली क्या है चेहरा तेरा
मुझे यूँ तनहा न कर
ढूँढता तुझे फिर रहा
आ भी जा अब आ भी जा 
ऐ नादान ख़ामोशी 
ऐ नादान ख़ामोशी 
______________________________

Kaash wo taara mil Jata - Rishish Dubey "Raahi"

काश वो तारा मिल जाता
_______________________

एक किनारा ,एक लहर 
एक ही माझी मिल जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

दूर नहीं है वो मुझसे
मुझको अब भी दिखता है
पा लेता उसको मैं शायद
कोई बढ़ावा मिल जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

था खाली ही जब घर मेरा
खाली खाली हर मंजिल
एक नगर , और एक डगर
कैसे 'राही' थम जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

हूँ आवारा मैं तो क्या
वो तारा भी आवारा है
जिस शब्-ए-महफ़िल में मैं बैठूं
मुझपे हंसने आ जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

बचपन में थी बात सुनी
वो तारा हर शब् गिरता है
मिल जाता जो साथ तेरा
तेरे दामन में गिर जाता
वो तारा मुझको मिल जाता
तेरे दामन में गिर जाता
वो तारा मुझको मिल जाता

हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता ||

 ~~ ऋषीश   दुबे ~~
_______________________