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Friday, October 25, 2013

Prasang - Adarsh Tiwary

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    प्रसंग
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लफ़्ज़ों में इज़हार करना चाह रहा था जिन बातों को,
उस जज़्बात के मायने मेरे लिए बड़े ख़ास थे,
इशारे काफी थे समझाने को,
पर सुनने वो लफ्ज़ तुम वही मेरे साथ थे।

धीमी धीमी बूंदों की बारिश,
बरश रही थी नन्ही बूंदे
कर रही थी श्रृंगार तेरा,
मृगनैनी पलकों के तेरे ।

चिन्हित करे सौंदर्य को ,ऐसी सकशियत तेरी,
मुख दर्शाती स्वप्नसुंदरी, रंग तेरा सुनेहरा
कमल पंखुड़ी से पवित्र तू, मन चुलबुल अति चंचल ,
हर बात में तेरी सोच सही, सलाह भाव अति गहरा ।


कैसे करू मैं पहल, बुनू शब्दों के जाल संग तेरे,
जानता हु तेरे दिल का राज़ पर  कैसे निकालू तुमसे वो बात
तेरे भी नज़रिए में अपने को तौलना बड़ा ज़रूरी था,
तुमने जो संकेत दिए, वो भाव नित नृत्य मयूरी था ।

स्वाभाविक विचार सामान, सम्मान था मेरे प्यार को
अत्यंत मतभेद के पार , मुझे मेरा नया संसार स्वीकार था ।।

 - आदर्श तिवारी
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Sunday, June 24, 2012

Yaadon Bhari Wo Library - Adarsh Tiwary

यादों भरी वो लाइब्ररी.. 
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 आज दिखी वो लाइब्ररी जहा हम तुम जाया करते थे,
ज़िन्दगी के पन्नो में बातें उखेरा करते थे |
आज उन यादो से जुड़ने का एक और द्वार मिल गया ,
और मिला वो आधा प्यार, जो कभी यादों में था दब गया |

किताबों से भरी हर वो तख़्त निहारा करती थी,
जब तुम  उस कोने से मुझे पुकारा करती थी |
सन्नाटे मे हसने का तुम्हारा,वो एहसास मुझे फिर मिल गया, 
हर उस नज़ारे का मुझे,फिर से नज़ारा मिल गया |

  याद आई वो मेज़ जहा हम तुम संग बैठा करते थे,
मिलती थी हमारी नज़रे ,घंटो बातें किया करते थे |
वहा जाना तो बस, जाना पहचाना सा एक बहाना था,
वक्त की खाई मे भी,तुमसे मिलने जो आना था |

रोज़ नए अध्याय हम अपने किस्से में जोड़ा करते थे, 
 तुम कहती थी, मैं सुनता था और ये दिन बीता करते थे |
 किताबों के पन्नो सा,जहां हम एक दूजे को पढ़ा करते थे ,
याद आ गयी वो लाइब्ररी जहा हम तुम जया करते थे।   
 
~~~ आदर्श तिवारी ~~~
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