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Thursday, July 4, 2013

Antim Vriksh - Devendra Sharma

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अंतिम वृक्ष 
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सहसा बोला वह एकांत,
सौंदर्यहीन तथा क्लेश-क्लांत,
वह शक्तिहीन, वह मानहीन,
वह दुखी दुखी अति दीन-हीन,

प्रकृति सुंदरी का वह श्रृंगार,
मानव-कर्मों से दुखी अपार.
हाँ तरु कहो या उसे पेड़,
मानव जीवन की वह है मेड़,

पर आज स्वयं यह रोता है,
जब मानव जन सोता है,
यह है धरती का अंतिम वृक्ष,
है मानवता को प्रश्न यक्ष,

क्यों कट गए इसके सब साथी,
लाशों पर चलते बाराती,
पर आज मशीने आई हैं,
संहार साथ वो लायी हैं,


बन गया तथापि क्रूर दानव,
कल  तक था जो कभी श्रेष्ठ मानव..

देवेन्द्र शर्मा 
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Thursday, June 27, 2013

Us chaukhat se - Devendra Sharma

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उस चौखट से 
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उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ,
कुछ ख्वाबो का दरिया , सपनीली रात थी ,
कहना बहुत था ,सुनाने थे किस्से ,
यादों ने रखे थे अनजाने हिस्से ,
बेबस सी रोती वो चौखट दुखी थी ,
बांटी थी खुशिया जो ,शायद छिपी थी ,
जो अरमाँ संजोते थे अक्सर इकठ्ठे ,
जो नज़्मे लिखी थी यूँ लड़ते झगड़ते ,
वो रूठे मनाते , वो किस्से सुनाते ,
बारिश में मिलकर वो बूंदे चुराते ,
वो सिसकी वो आंसू जो बहते से उसपे ,
वो आंगन के पौधों से तितली उड़ाते ,
वो ममता का आँचल वो अपनों सा रिश्ता ,
वो अश्को की ज्वाला में अरमाँ झुलसते ,
कुछ छूटी हुई सी अनकही बात थी ,
हाँ उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ...
~~ देवेन्द्र शर्मा ~~ 
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Monday, January 7, 2013

Chutki Bhar Aansu Aur Mutthi Bhar Khushi - Devendra Sharma


 चुटकी भर आंसू और मुठ्ठी भर ख़ुशी ;
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थोड़े से अरमाँ , ख्वाहिशें नयी ;
सितारों की चाहत है किसको यहाँ ;
लकीरों से ज्यादा है माँगा कहाँ ;
सुलगते मनुजमन के अरमाँ यही;
चुटकी भर आंसू और मुठ्ठी भर ख़ुशी॥
परश्तिश बुतों की हैं करते वही ;
लकीरों से नाखुश जो रहते सदा ;
वीरानी राहें डराती उन्हें ;
सरलतम सफ़र चाहे फूलों भरा ;
मगर उनको मिलता है अक्सर वही ;
चुटकी भर आंसू और मुठ्ठी भर ख़ुशी ॥

- देवेन्द्र शर्मा -
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