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Saturday, May 21, 2011

Shabdo ki paribhasha - Vikas Chandra Pandey

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शब्दों की परिभाषा - विकाश चन्द्र पाण्डेय
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कुछ रिश्तो की परिभाषा अलग सी होती हैं ,
अधुरें ख्वाबो की अधूरी कहानी होती है .
चाहता हु इन्हें शब्दों में पिरोना ,
पर कुछ यादें रोकती है.

इस परिभाषा की भी एक अलग ही दिशा है ,
इन अनकही बातों की भी एक वजह है .
चाहता हूँ इन यादों को भुलाना,
पर कुछ बातें रोकती है.

सभी ख्वाब कभी पुरें नहीं होते ,
परछाइयों के कभी चेहरे नहीं होते.
चाहता हु इन खाव्बों को पूरा करना,
पर कुछ रातें रोकती है.

शायद इस परिभाषा में कुछ अधूरापन हो,
या फिर मेरी अशिमित सोच का प्रवाह हो.
पर वो बातें आज भी गूंजती है,
वो यादें आज भी याद आती है.
वो सपने आज भी जगातें है ,

वो अनकही बातें आज भी मेरी गलतियां याद दिलाती है.
चाहता हु इन्हें आज भी सुधारना,
पर अब उसकी खुशियाँ मुझे रोकती है.
उसकी दुनिया मुझे रोकती है....

'' विकास चन्द्र पाण्डेय ''
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Tuesday, April 12, 2011

Yatharth - Vikas Chandra Pandey

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यथार्थ
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कल मैंने चांदनी रात को येथार्थ में देखा..

उसकी प्रकाश को धरातल पर देखा...

इस छनिक प्रकाश में जो आवेग था...

उससे कई जयादा मेरे विचारो का वेग था..

उस प्रकाश का वास्तविक श्रोत तो कोई और था...

पर मेरे विचोरों का श्रोत मै खुद था ...

इस प्रकाश का अंत तो नजदीक था ...

पर मेरे विचारो का धरता ही अतीत था...

फिर एक नई रात का आगमन हुआ ...

पर यह निरीह प्रकाशविहीन  हुआ..

एक और इन्तजार का आगाज़ हुआ..

फिर चांदनी रात का आभास हुआ...

ये ही जीवन का यथार्थ है ...

हर अन्धकार के पश्चात प्रकाश हे प्रकाश है...

~~ विकास चन्द्र पाण्डेय ~~

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Monday, March 14, 2011

Aprtyashit Akaanchaayen - vikas chandra pandey

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अप्रत्याशित अकान्छायें - विकास चन्द्र पाण्डेय
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बंद आँखों से देखे सपने ,
जो खो दिए थे मैंने शायद .
कही मेरे मन के एक कोने में ,
जिसे छोड़ दिया था मैंने शायद .
अपनी अप्रत्याशित अकान्छायें सोचकर ,
जिन्हें भुला चूका था मै शायद .
वो सपने पूरे हो रहे थे आज ,
जैसे बंद किताबों के पन्ने खुल रहे थे आज.
इस आज में भी एक कल छुपा बैठा था,
हमेसा की तरह वो मेरी परछाई बना बैठा था.
पर एक कलाकार की सोच थी वो अधूरे सपने जैसे ,
जो हर पल एक अलग रंग पा रहे थे शायद.
पर फिर भी कही न कही वो अपना अश्तित्व चाह रहे थे,
और हम इन्हें सच समझ जिए ही जा रहे थे.
आज जब ये पूरे हो चुके तो कितने छोटे लगते है,
बिना रोशनी के धुप के मकान लगते है.
शायद इन्हें ही अप्रत्याशित अकान्छायें कहते है.

~~ विकास चन्द्र पाण्डेय ~~
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Sunday, February 27, 2011

Aaj Ke Daanav - Vikas Chandra Pandey

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 आज के दानव - विकास चन्द्र पाण्डेय   
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हमने सोचा हम मानव हैं, दानव सभी दिए हैं मार!
कभी न सोचा था, फिर होंगे कलउगी दानव से दो-चार!!

भ्रस्टाचार, दहेज, आतंकवाद, ग़रीबी, होंगे नये दानव प्रहार !
इनकी ताक़त हैं हम लोग, कौन इन्हे मारेगा आज!!

सोच रहे हैं सभी, फिर होगा राम-कृष्ण, गाँधी अवतार,
हम क्यों इतना सोचे जब, फिर आएगा तारनहार!

लेना-देना रीत आज की, इसको मत लो दिल पर आज,
भूख और बमो से मरना, अब तो छोटी- मोटी बात!

संस्कार की बात न करना, बची नही अब कोई बात ,
दौड़ रहें हैं सभी यहाँ, मद-माया के पीछे आज!

इक तिलिस्म मे फसे सभी हैं, सब को बस अपनी दरकार,
जब कुछ होगा उल्टा-सीधा, कोसेंगे अपनी सरकार!

~~ विकास चन्द्र पाण्डेय ~~

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Tuesday, February 22, 2011

प्रतिध्वनि - विकास चन्द्र पाण्डेय Pratidhwani - Vikas Chandra Pandey

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           आज अचानक मेरी परछाई से मुलाकात हुई ..
           धुंधली रौशनी में कुछ अनोखी सी बात हुई ..
           उसके साथ को पाकर एक अजीब सी अनुभूति हुई ..
           यादों के खोये हुए पन्नो से फिर मुलाकात हुई ..

                          तभी कुछ अप्रत्याशित से बात हुई ..
                          उस परछाई ने मुझे आवाज़ दी ..
                          प्रश्नों की अविरल धारा से ये मेरी पहली मुलाकात थी ..
                          ये और कुछ नहीं शयेद मेरे अंतर्मन की आवाज़ थी ..

           रात के अँधेरे में वो अजीब सी राह थी ..
           वो मेरी मेरे सच से पहली मुलाकात थी ..
           फिर भी मन में एक अजीब से हलचल है ..
           क्या ये सब सच है ..
           या बस आँखों का भ्रम है ...
                       पर उसकी आवाज़ में कुछ तो बात थी ..
                       क्या ये सभी मेरे अतीत की बात थी ?? ..
                       उन प्रश्नों ने मुझे एक नयी राह दी ..
                       मेरे भटके हुए वर्तमान को एक नयी पहचान दी ..
 
            ये मेरी परछाई से पहली मुलाकात थी ..
            नहीं ये मेरी खुद से पहली मुलाकात थी ..  

                               ~ विकास चन्द्र पाण्डेय ~
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