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Friday, August 17, 2012

Apna watan - Kusum

अपना वतन 
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अपनी जमीन अपना गगन , बहती सुगन्धित मोहक पवन

इसके नज़ारे चुराता है मन, सबसे प्यारा है अपना वतन
उत्तर में इसके हिमालय खड़ा, दक्षिण में सागर का पहरा अड़ा
पूरब में इसके खाड़ी बड़ी , पश्चिम में अर्णव करे चौकसी
हम तो सभी से इतना कहे हिन्दू मुसलमान मिल के रहे
नफरत की आंधी अब न चले प्रेम का दरिया दिल में बहे
अब वतन में रहे बस अमन हर बुलंदी पे चढ़ता रहे अब वतन
लक्ष्य से विचलित ना हो मन रखना सुरक्षित अपना वतन
शत्रु की चाल को करके विफल दिखला देगे हम अपना बाहुबल
बस लबो पे रहे हरदम सबसे प्यारा है अपना वतन
सबसे प्यारा है अपना वतन सबसे न्यारा है अपना वतन
इसके चरणों में मेरा नमन इसपे वारेगे हम जान ए तन
अपना वतन अपना वतन सबसे प्यारा है अपना वतन

जयहिंद जयभारत !!


-       कुसुम 

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Saturday, March 19, 2011

देश भक्ति कवितायें





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Desh Bhakti Kavitayien
POETS
01
Rabindranath Thakur
02
Girija Kumar Mathur
03
Md. Iqbal
04
Bankim Chandra Chattopadhayay
05
Kamlesh Kumar Deewan
06
P.K.Mishra
07
Shridhar Pathak
08
Snehlata (Sneh)
09
Atal Bihari Vajpayee
10
Som Thakur
11
Randhari Singh 'Dinkar'
12
Ramavtar Tyagi
13
Shyamlal Gupt Parshad
14
Rajendra Kishan
15
Narendra Sharma
16
Harivansha Rai Bacchan
17
Pradeep
18
Prem Dhawan
19
Ramprasad Bismil
20
Dwarika Prasdhad Maheshwari
21
Vanshi Dhar Shukla
22
Hariwansha Rai Bacchan
23
Sajeevan Mayank
24
Anibhav Shukla
25
Sumitranandan Pant
26
Girija Kumar Mathur
27
Maithili Sharan Gupt
28
Maithili Sharan Gupt
29
Bharatendu Harishchandra
30
Ram Prasad Bismil
31
Subhadra Kumari Chauhan
32
Atal Bihari Vajpayee

Sunday, June 20, 2010

15 august 1947 - Sumitra Nandan Pant


15 अगस्त 1947 - सुमित्रानंदन पन्त  15 august 1947 Sumitra Nandan Pant


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चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,
आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन!
नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण,
तरुण अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन!
सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन,
आज खुले भारत के संग भू के जड़ बंधन!
शांत हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण
मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण!
आम्र मौर जाओ हे, कदली स्तंभ बनाओ,
पावन गंगा जल भर मंगल-कलश सजाओ!
नव अशोक पल्लव के बंदनवार बँधाओ,
जय भारत गाओ, स्वतंत्र जय भारत गाओ!
उन्नत लगता चंद्रकला-स्मित आज हिमाचल,
चिर समाधि से जाग उठे हों शंभु तपोज्ज्वल!
लहर-लहर पर इंद्रधनुष-ध्वज फहरा चंचल
जय-निनाद करता, उठ सागर, सुख से विह्वल!
धन्य आज का मुक्ति-दिवस, गाओ जन-मंगल,
भारत-लक्ष्मी से शोभित फिर भारत-शतदल!
तुमुल जयध्वनि करो, महात्मा गांधी की जय,
नव भारत के सुज्ञ सारथी वह नि:संशय!
राष्ट्रनायकों का हे पुन: करो अभिवादन,
जीर्ण जाति में भरा जिन्होंने नूतन जीवन!
स्वर्ण शस्य बाँधों भू-वेणी में युवती जन,
बनो वज्र प्राचीर राष्ट्र की, वीर युवकगण!
लोह संगठित बने लोक भारत का जीवन,
हों शिक्षित संपन्न क्षुधातुर नग्न भग्न जन!
मुक्ति नहीं पलती दृग-जल से हो अभिसिंचित,
संयम तप के रक्त-स्वेद से होती पोषित!
मुक्ति माँगती कर्म-वचन-मन-प्राण-समर्पण,
वृद्ध राष्ट्र को, वीर युवकगण, दो निज यौवन!
नव स्वतंत्र भारत हो जगहित ज्योति-जागरण,
नवप्रभात में स्वर्ण-स्नात हो भू का प्रांगण!
नव-जीवन का वैभव जाग्रत हो जनगण में,
आत्मा का ऐश्वर्य अवतरित मानव-मन में!
रक्त-सिक्त धरणी का हो दु:स्वप्न-समापन,
शांति-प्रीति-सुख का भू स्वर्ण उठे सुर मोहन!
भारत का दासत्व दासता थी भू-मन की,
विकसित आज हुई सीमाएँ जन-जीवन की!
धन्य आज का स्वर्ण-दिवस, नव लोक जागरण,
नव संस्कृति आलोक करे जन भारत वितरण!
नव जीवन की ज्वाला से दीपित हों दिशि क्षण,
नव मानवता में मुकुलित धरती का जीवन!

 - सुमित्रानंदन पंत
15 अगस्त 2007

15 August 1947 - Girija Kumar Mathur

१५ अगस्त १९४७ - गिरिजा कुमार माथुर 
15 August 1947 - Girija Kumar Mathur


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आज जीत की रात
पहरुए! सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना
प्रथम चरण है नये स्वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जन-मंथन से उठ आई
पहली रत्न-हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता-डोर
क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की
विगत साँवली कोर
ले युग की पतवार
बने अंबुधि समान रहना।
विषम शृंखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्त दिशाएँ
आज प्रभंजन बनकर चलतीं
युग-बंदिनी हवाएँ
प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रही प्रतिमाएँ
उठता है तूफान, इंदु! तुम
दीप्तिमान रहना।
ऊंची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जन-गंगा में ज्वार,
लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए! सावधान रहना।।