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Saturday, December 24, 2011

Nigah dhundata hoon - Ankita Jain

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निगाह ढूँढता हूँ 
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अब भी तेरी नज़र में मेरा गुनाह ढूँढता हूँ,
बेदर्द हर पहर में, मौत की पनाह ढूँढता हूँ !
तूने तो सरे आम मुझे गुनेहगार करार दिया,
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

बंजर हुई ये आँखे मेरी, छू सके वो गागर अश्क भरा,
थाम सके जो सांसे मेरी, मिल जाये मुझे वो शख्स मेरा !
कर सके मेरी ये फरियाद पूरी वो अल्लाह ढूँढता हूँ
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

बीच समंदर मुझे बुलाकर, जब छोड़ा था तूने साथ मेरा,
आया भी वापस कुछ पल को, तो थामा न तूने हाथ मेरा !
क्यूँ गैरत बनी फिर चाहत तेरी, खुद में वो गुनाह ढूँढता हूँ
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

~~ अंकिता जैन " भण्डारी " ~~

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Friday, July 1, 2011

Sapna sa lage - Ankita Jain "Bhandari"

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सपना सा लगे
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गरजते बदरा की धुन सा लगे,
तो कभी बारिश की फुहार की छुवन सा लगे !
क्यूँ वो अनजान चेहरा मुझे अपना सा लगे,
पर जब पाने को हाथ बढाऊं तो सपना सा लगे !!
 
कभी सितार की मधुर सरगम सा लगे,
तो कभी तेज़ बारिश की छनछन सा लगे !
क्यूँ उसके अहसास से तनहा राहों पर दिया सा जले,
पर जब पाने को हाथ बढाऊं तो सपना सा लगे !!

जाने कबसे वो संगसंग मेरी धड़कन के चले,
जाने कबसे वो आकर इन ख्यालों में बसे !
है इंतज़ार उस लम्हे का जब वो इन ख्वाबों से निकले,
और जब पाने को हाथ बढाऊं तो इक सच सा लगे !!

~~ अंकिता जैन "भंडारी" ~~
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Wednesday, April 27, 2011

Chahat Sukoon Ki - Ankita Jain



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चाहत सुकून की
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हम बेठे थे उस कश्ती में,
               जिस कश्ती में पतवार ना थी !
देखी मंजिल उस खंज़र में,
                जिस खंज़र में भी धार ना थी !!


सपने तो बहुत सजाने थे,
                पर पलकों ने नामंज़ूर किया !
ये उन लम्हों के मंसूबे थे,
                        कि ख़्वाबों को ताला लगा दिया   !!
चाबी टांगी उस खूँटी पर,
                जो खूँटी बिन दीवार क़ी थी !
पाने भी चढ़े उस सीढ़ी पर,
                        जिस सीढ़ी में कोई लकार ना थी !!


माना अब तक कुछ मिला नहीं,
            पर संतुष्टि ऐसा शब्द  मिला !
जो खुदमे ही सम्पूर्ण नहीं,   
                          जिसने चाहा उसे न कभी आराम मिला !
हमने भी पाने वो राह चुनी,
                 जहाँ हर कदम पे दूरी बढ़ती थी !
मंजिल बस होती थी दुगनी,
                     पर हर साँस पे  उम्र तो  घटती थी !!

अब फिर पाना चाहूँ वो जीवन,
                     जहाँ थोक में परियाँ मिलती थीं !
कागज़ के फूल भले ही थे,
                  पर खुशबु असल महकती थी !
पर अब हम बैठ चुके उस कश्ती पर,
                  जिस कश्ती में पतवार ना थी !
देखी मंजिल उस खंज़र में,
                   जिस खंज़र में भी धार ना थी !!

~~ अंकिता जैन~~

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Chahat Ki Tapish - Ankita Jain (Bhandari)


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चाहत की तपिश - अंकिता जैन
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निकलता है लेकर चाहत-की-तपिश,
कि कभी तो उसका दीदार होगा !
पूरी होगी इन निगाहों की ख्वाहिश,
और पलकों को आराम होगा !

गुज़रता है वक़्त पर जब,ना मिलती कोई आहट !
तो बेसब्र किरणों में भी ,बड़ती है गर्माहट !!
सुलझा सा मन अब बसेरा उलझे ख़यालों का होगा,
मिलेगा दीदार या फिर आलम बेवफ़ाई का होगा !
पूरी होगी आखों की ख्वाहिश और पलकों को आराम होगा !!

अब तक ना आई, कोई खबर !
सिमटने लगी है अब, हर तरफ बिखरी नज़र !!
पर वो दीवाना आज फिर यही कहकर आख़िरी साँस लेगा -
मेरे इंतज़ार का सिलसिला ना कभी ख़तम होगा!
कल आऊंगा फिर इसी उम्मीद में उसका दीदार होगा !!
पूरी होगी आँखों की ख्वाहिश और पलकों को आराम होगा !!

~~ अंकिता जैन~~
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Tuesday, April 12, 2011

Anna hazare ki awaaz - Ankita Jain (Bhandari)


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एक आवाज़ -  अंकिता जैन (भंडारी)

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अन्ना हज़ारे की उठती आवाज़,
सत्ता पर जैसे गिरी हो गाज़ !
बुना उन्होंने ने एसा फंदा,
सरकार को जिसने कर दिया नंगा !!

पर हम भी सरकार से कम नहीं,
बिन  अलार्म जगते नहीं !
कभी गाँधी जी तो कभी अन्ना हज़ारे,
चलते नहीं कभी हम बिना सहारे !!

देर से ही सही मगर अब तो नींद से जागो,
खाना पानी छोड़कर अब बस अन्ना के पीछे भागो !
ना रखना डर मन में की नौकरी जाएगी ,
क्यूंकि घोटाले ऐसे ही बड़ते रहे, तो वो ऐसे भी नहीं बच पायेगी !!

जरुरत है अब स्वप्न निद्रा तोड़ने की,
आगे बढकर हाथ से हाथ जोड़ने की !
अन्ना हज़ारे को हमारी नहीं बल्कि हमे उनकी ज़रूरत है,
दिखाना है मिलकर सरकार को क्या लोकतंत्र है !!

~~ अंकिता जैन ~~
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Thursday, April 7, 2011

Abhi Tak Baaki Hai - Ankita Jain "Bhandari"

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अभी तक बाकी है - अंकिता जैन
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इन थकती आँखों में, अब भी सपने बाकी हैं,
ढलते सूरज की किरणों में, अब भी गर्माहट बाकी है |
लुट गया था वो, जब तेरा साथ छूटा,
पर उस हसीन साथ का अहसाह अभी तक बाकी है ||

तेरी मदहोश आँखों में जाने क्यूँ वो ऐसा खोया,
भुलाकर खुदको, था उसने हसीं ख्वाब संजोया |
डूब चूका था वो, जब तेरी आँखें मुंदी,
पर उन ख्वाबों के खंडर अभी तक बाकी हैं ||

तेरे लफ़्ज़ों में जाल में वो कुछ ऐसा फसा था,
अथपर था वो जाने ये केसे फंदा बुना था |
टूटकर मिट गया वो, जब वो जाल सुलझा,
पर उस जाल के चिपके रेशे अभी तक बाकी हैं ||

ढलने लगी है अब रात और थमने लगी हैं पलकें,
पर इन पलकों पर बिखरे मोती अभी तक बाकी हैं |
इन थकती आँखों में, अब भी सपने बाकी हैं,
ढलते सूरज की किरणों में अब भी गर्माहट बाकी है |

अंकिता जैन
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Thursday, March 24, 2011

Tutata Khwab - Ankita Jain


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टूटता ख्वाब - अंकिता जैन (भंडारी)
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आये  थे  वो   मेरी  ज़िन्दगी  में , एक  हसीं  सपने  की  तरह .
कुछ  पल  ठहरे  और  चले  गए ,
ओस  की  बूंदों  की  तरह .
क्या  गिला  करें  उनसे  ,
जब  हमे  किस्मत  ने  दगा  दिया .
और  समझकर  हसीं  ख्वाब
उसने  हमे  भुला  दिया .
था  वफाओं  का  जो  महल  ढहा ,
ताश  के  पत्तों  की  तरह .
आये  थे  वो  मेरी  ज़िन्दगी  में , एक  हसीं  सपने  की  तरह .

नादाँ  है  ये  दिल  कहता  है ,
वो  वापस  आयेंगे .
सीने  से  लगाकर  मुझे  अपने
हर  शिकवे  को  मिटायेंगे .
कैसे  यकीन  दिलों  इसे  की ,
उसने  तो  हमे  भुला  दिया .
और  एक  पल  में  अपने  से
बेगाना  बना  दिया .
बिखर  गयी  हर  उम्मीद  आज ,
रेट  के  टीले  की  तरह .
आये  थे  वो  मेरी  ज़िन्दगी  में , एक  हसीं  सपने  की  तरह .


~~ अंकिता जैन (भंडारी) ~~

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Friday, March 18, 2011

Kya Hai Holi - Ankita Jain

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क्या है होली  - अंकिता जैन (भंडारी)
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था एक सेवक कृष्ण का, अदभुत थी जिसकी भक्ति ,
जल गयी होलिका तेज़ से उसके, ऐसी थी भक्ति की शक्ति !



टूटा ना विश्वास जिसका, अचल था जो स्वाभिमान का,
और किया अंत फिर इक बार, उस झूठे अभिमान का !
ना मानी हार तो जीतोगे इक दिन,
इक छोटे से बालक ने, दिया पैगाम इस बात का !
कह गयी होलिका हुई मैं पावन, और मिली नरक से मुक्ति,
था एक सेवक कृष्ण का, अदभुत थी जिसकी भक्ति !!

फागुन के इस पावन माह में, जब चाँद पूर्ण हो जाता है,
नए पत्तों, फूलों के संग, तब रंगों का त्यौहार आता है !
त्योहारों के इस देश में, जहाँ जाति, भाषा का अंतर है ,
वहां होली का ये त्यौहार आता, बनकर इन सबका संगम है !
देकर इन रंगों को जिसने, की थी पावन मिट्टी,
था एक सेवक कृष्ण का, अदभुत थी जिसकी भक्ति !!



रंगों का ये त्यौहार, है दिन राधा कृष्ण के प्यार का,
फिर क्यूँ मानते हैं हम इसको करके अपमान प्रकृति का !
कट जाते हैं वृक्ष युहीं, और घट जाता है पानी,
गर हम ही ना समझे तो फिर, वो किसे कहे ये दुखद कहानी !
करके दूषित अनमोल देन, ना मिटाओ अपनी ही हस्ती,
था एक सेवक कृष्ण का, अदभुत थी जिसकी भक्ति !!

~~ अंकिता जैन ~~
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Mehfil - e - Mohobbat - Ankita Jain


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महफ़िल - ए - मोहब्बत - अंकिता जैन (भंडारी)

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आपकी महफिल मे आकर ही अब,

                         इस दिल को सुकून आता है ।

बिन आपके जीने के ख्याल से,

                    अब ये दिल डर जाता है ।


क्यू हर ख्याल मे अब सिर्फ्,
               आप नज़र आते है ।


मेरे सारे लफ्ज और दिल कि हर धडकन,

                                  सिर्फ आपका नाम गुनगुनाते है ।

अब तो ये दिल भी मुझे,

                       आपके नाम से सताता है ।

आपकी महफिल मै आकर ही अब,

                            इस दिल को सुकून आता है ।



थी जिस खुशी की बर्षो से चाह,

                                    अब अपनी होती नज़र आती है ।

अब आपके होने कि आहट ही,

                                मेरे बर्षो की प्यास बुझाती है ।

जाने क्यू अब ये दिल,

                              आपकी जुदाई से डरता है ।

ना देंगे कभी वो रुसवाई,

                                       अब हर पल मुझसे ये कहता है ।


वो कहते है मुझसे , क्यू-

                          इतना यकीन तू करती है,

क्या कहू मै जब ये दिल भी जब उन्ही के लिये धडकता है........

                      आपकी महफिल मे आकर ही अब इस दिल को सुकून मिलता है.................॥


~~ अंकिता जैन ~~

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Monday, March 14, 2011

Basant Ki Bhor - Ankita Jain

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 बसंत की भौर - अंकिता जैन (भंडारी )
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सूरज की उगती पहली किरण,
लहराती हुई  मदमस्त पवन !
गाते पंछी मीठी झंकार,
मौसम में घुली ये बसंत बहार !
जीवन रंगों से भरते हैं,
और ये पैगाम देते हैं !
पतझड़ के दिन अब बीत गए,
आये वृक्षों में पत्ते नए !
गर दुःख है कोई तो अब उसको भूलो,
खुशियों को जीवन में भरलो !
हैं इन्द्रधनुष में सात रंग,
पर काला-सफ़ेद न उसके संग !
फिर हम भी क्यूँ होकर बेरंग जियें,
क्यूँ न जीवन भरपूर जियें !
बस इक कोशिश की देर है,
फिर देख, तेरे जीवन में भी भौर है !!

~ अंकिता जैन ~
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Thursday, March 10, 2011

Aaj Ka Insaan - Ankita Jain

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आज का इंसान - अंकिता जैन
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दूर रहने पर इंसान की

अहमियत का पता चलता है,

पड़े जरुरत तब

वफ़ादारी का पता चलता है |



हर कोई यहाँ अपने तेरे में लगा है,

जो दूसरों के लिए सोचे

अब एसा इंसान कहाँ मिलता है |

लड़ने को सभी हर पल तैयार हैं,

हल और सुलह से हर कोई बचता है |


अपना अच्छा सोचें या न सोचें पर,

हर पल दूसरों की बुराई के सपने बुनता है |

शायद इसलिए हर इंसान आज,

अपनों के पास होकर भी अपनों के लिए तरसता है ||




~~ अंकिता जैन ~~

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Monday, March 7, 2011

Naari Shakti - Ankita Jain

नारी शक्ति
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कभी हारती हूँ, कभी गिरकर संभालती हूँ,
डरती भी हूँ पर मुश्किलों से निकलती भी हूँ !
बस करो अब और न दो नाम कमजोरी का ,
मानो या न मानो पर तेरे इस जीवन की दायनी हूँ !!


कभी जो हो शक मेरी शक्ति का ,
तो पलट लेना इक बार पन्ने इतिहास के !
संघार किया है दुष्ट दानवो का ,
कभी मैं दुर्गा तो कभी काली भी हूँ !!


ना करना बात अब रुकने की मुझसे,
छूना है मुझे भी अब उस आसमा को !
शक हो इस पर भी तो पूछ लो अन्तरिक्ष से,
मिली थी उससे रूबरू मैं इसी कल्पना हूँ !!


है विनती आज मेरी बस इतनी सी,
ना मारो मुझे और ले लेने दो सांसे !
रोक दो ये अनर्थ वरना देखोगे एसा कल भी,
जब तुम लेना चाहो जीवन और मैं ना रहूँ !!

~~ अंकिता जैन ~~

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Wednesday, March 2, 2011

Kahan Hai Rab - Ankita Jain

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कहाँ है रब - अंकिता जैन
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वो तुझमे ही समाया है, गर पहचान पाओ तो,
क्यूँ दर-दर यूँ भटकता है, इक बार तो देखले खुदको !
हजारों नाम देकर अब कर दिया विभाजन जिस रब का,
वो शिव है या है खिवैया तेरे भटके हुए अंतर्मन का !!
ना लड़ लेकर नाम अब उसका, जिसको पहचान भी ना पाया,
देखले इक बार सूरत फिर से अपनी ये, गर मिल जाये कोई दर्पण तो !
दावा है गर मन हुआ सच्चा तो नज़रें मिल ना पाएंगी,
बहाया है रक्त बेवज़ह ये सच पहचान जाएँगी !!
दुआ है मिट जाये सब पहले ही उसके हम सब समझ जाएँ,
अब भी बिगड़ा नहीं है कुछ, करदो ख़त्म झगड़े को !
तेरा शिव है किसी का अल्लाह फर्क इतना सा गर जानो,
मगर उसके लिए सब उसके अपने हैं, बात ये मान जाओ तो !!
रोता है वो इस बात पर आंसू बहाता है,
दर्द सबसे ज्यादा होता है जब कोई अपना मार दे किसी अपने को !
हजारों कर लिए व्रत उपवास जिससे मिलने की चाहत में ,
वो तुझमे ही समाया है , गर पहचान पाओ तो !!

~~~ अंकिता जैन ~~~

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