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Sunday, October 15, 2017
Wednesday, June 11, 2014
Jise tum samajhte ho abhishaap - Mamta Sharma
जिसे तुम समझे हो अभिशाप
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जिसे तुम समझे हो अभिशाप
मृत्यु ही जीवन का संदेस।
अगर दुःख न होगा तो सुनो !
सुखों कि आग जलेगा गेह।
जहाँ पर भरी निराशा सुनो !
चलेगी आशा की गाड़ी ,
अगर है सुख ही सुख गर जो ,
बिछड़ जाएँगी वे सारी।
बनाया सुख -दुःख का संसार
बड़ा ही उच्च खिलाडी है ,
सुबह को धूप खिलाई जो,
रात्रि में चन्द्र की बारी है .
रचाया पूरा हमने स्वांग ,
पता न कब जाना हो दूर ,
कहीं जो रहें तकें हर पल,
सांसों की अर्जी ना मंज़ूर।
मृत्यु जीवन के बीच फंसे।,
लगे जादू - टोना सी सांस,
लगे सब कुछ अपना सा आज ,
बनेगा वह जीवन की फांस।
बने हम फूल पंछी पत्थर ,
बने हम ही हैं जीव हज़ार
चली चाकी पृथ्वी की है ,
पिसे हैं अन्न बने कई बार।
धरे नव रूप ,पात नव गात ,
नये से लिए वर्ण कई बार
चलाया उस ने यह व्यापार,
इसे न समझो तुम अभिशाप ,
यही तो जीवन है अभिराम
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ममता शर्मा
Friday, October 25, 2013
Dhanyawaad - Mamta Sharma
धन्यवाद
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पञ्च तत्वों को देहमें गढ़ कर,
उसमें देते प्राणको धर ,
लीला में हमकोरचते ।
धन्यवाद स्वीकार कीजिये ।
माटी के तनमें अपनी,
छवि कोदिखला- दिखला कर,
हम जैसों के मनको छलते ।
धन्यवाद स्वीकार कीजिये ।
कण कण मेंफैला ज्योति को,
अनहत - आहत मेंरमते ,
मंद - मंद उसपर हँसते ।
धन्यवाद स्वीकार कीजिये ।
ओर - छोर नपता किसी को,
राह सुगम याअगम रस्ते ,
कस्तूरी बन, मनबसते ।
धन्यवाद स्वीकार कीजिय ।
वाष्प में ढलमेघों में बदल,
हिम बन नदीझरनों में चल,
सागर वत हमकोधरते ।
धन्यवाद स्वीकार कीजिये ।
- ममता शर्मा
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Dhanyawaad,
hindi kavita,
Hindi literature,
Mamta Sharma
Woh nib wale pen - Mamta Sharma
''वो निब्वाले पेन''
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अचानक मुझे यादआये हैं वोदिन जब चलतेथे निब वालेपेन !
मैं रोज हीघिसती थी स्याहीसे लिखती थी,
पेन की स्याहीके धब्बे मैंगिनती थी।
वो झगडे जोछोटी सी निबसे ही होतेथे,
वो लम्हे जब हमएक निब कोभी रोते थे।
वो दिन जबपरीक्षा में स्याहीना होती थी,
वो दिन जबहमारी लड़ाई नाहोती थी।
वो बचपन केदिन जब थींदोपहर लम्बी,
वो दिन जबसहेली की चोटी हीलम्बी।
वो दिन जबकभी हम छीनके खाते थे,
झड बेरी केबेर या कटारेचुराते थे।
वो दिन जबसखी से जोबातें थीं होती,
कभी भी समयकम था, जोरातें भी होतीं।
हम संग हीबिताते ये पूरीही जिन्दगी,
कहाँ है वोमेरी पुरानी सीजिन्दगी।
जब कुछ हीरुपये मुझ कोलगते थे ज्यादा,
जब थोड़े में भीथा मस्ती सेगुजारा।
मुझे ला केदो ना एकबार कोई यारों,
निब वाले वोधब्बे फिर सेमुझ पे डालो।
- ममता शर्मा
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Woh nib wale pen
Thursday, June 27, 2013
Videsh - Mamta Sharma
बच्चे जब काम करने विदेश चले जाते हैं उनके माँ -बाबा पर क्या गुजरती है ........इसी के ऊपर है ये मेरी कविता। कुछ समय तो अपने घर वालों की याद आती है फिर सब कुछ सामान्य।
मगर माँ - पिता वे अपना मोह नहीं त्याग पाते हैं, और माँ की दशा तो सिर्फ महसूस करने योग्य ही होती है .......
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विदेश
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क्या गुजरती उन पे है ,तुम छोड़ जाते हो जब अकेला
टीस सी उठती है मन में ,ज्यों अकेला हो ये मेला
बूढी आँखें सुख- व् -दुःख में ,गीली हो -हो सूख गईं
पुत्र प्रेम की वो डोर जपते -जपते चूर हुई
टीस सी उठती है मन में ,ज्यों अकेला हो ये मेला
बूढी आँखें सुख- व् -दुःख में ,गीली हो -हो सूख गईं
पुत्र प्रेम की वो डोर जपते -जपते चूर हुई
कोई आता अपने मन के भाव भर वो थैलियों में
भेजते हैं दूर देश प्रेम मन का थैलियों में
अश्रु पूर्ण आँखों से चुन - चुन कर तेरी रुचियाँ
माँ भरती मुट्ठी में भेजती तुझको है खुशियाँ
फ़ोन पर सुन तेरी बातें ,चाहती छिपाना भाव
शक ना हो तुझे कोई झेल जाती है वो घाव
यूँ ही लड़ झगड़ के वो काटते हैं अपनी शाम
क्यों हमने सींचे बाग़ क्यों हमने रोपे आम
बेटा तू छोड़ - छाड़ आ जा अब यहाँ ही
हमें क्यों बुला है रहा घर अपना यहाँ ही
पर बेटा गया जो है आएगा कहाँ वापिस
वह तो सुख की दुनियाँ,दुःख से हो क्या हासिल
अपने बच्चे अपनी बीवी ,माँ की जगह टीवी
सुख -सुविधा धन - माया ,सब की तो यहीं वीथी
पलक पांवड़े बिछाये ,दिन बीते रात जाएँ
बेटा - बहू गए जो हैं लौट के शायद वो आयें ................
~~ ममता शर्मा ~~
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Videsh
Monday, January 7, 2013
Kuch desh ki bhi sudh le - Mamta Sharma
" कुछ देश की भी सुध लें "
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हे विघ्न विनाशक गणपति मुझको कुछ ऐसी दो मति
इतना तो में भी कर सकूं इस देश में सुख को भर सकूं
हाँ है मुझे इतना पता संकल्प मेरा है बड़ा
पर क्या करूँ जो है जमीं , उसमें ही पनपी है कमी
कैसे इसे मैं दूँ ईमान, दूँ धर्म का इतना सा दान
के आदमी हो आदमी, पशुता हटे इंसान की
कैसे हो हम में एकता संचार हो बस प्रेम का
क्यों ना हो हम में चेतना ,मानव में हो संवेदना
क्यूँकर हमारी ये धरा फैलाए जग में वो नशा
जो नशा हो बस प्रेम का आधार में हो बल खड़ा
ले आयें हम वो फिर से पल , हो इस जहाँ में हम ही हम
हम हर तरफ हों उड़ रहे , सोने की चिड़िया फिर बने
इंसानियत की शान हों , ब्रह्माण्ड की हम आन हों
कम कर सकें हम वेदना , हों हम जगत की प्रेरणा
ममता शर्मा
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Tuesday, September 18, 2012
Kuch lamhe chura le raaton se - Mamta Sharma
" कुछ लम्हे चुरा लें रातों से "
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कुछ लम्हे चुरा लें रातों से
छिप छिप कर चलो उड़ जाएँ हम
इस राग रंग के झंझट से ,
कुछ देर किनारा पायें हम .
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से
कुछ देर करें बातें अपनी
कुछ देर सुनें उनकी बातें .
कुछ दर्द के लम्हे हों लब पर
कुछ हों खुशियों की सौगातें
कुछ भी ना छिपायें मन में हम
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से .
कभी करें पुरानी याद नई
कभी लें आहट आगत की भी
कभी बुनें नए से स्वप्न ढेर
कभी ले का आयें सुबह नई
इन सारी बातों की खातिर
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से
ओ मेरे बेकल मन तू भी
कुछ ठौर तो पा ले एक घडी
यूँ दौड़ता ही जो जाएगा
एसे तो तू थक जाएगा
रुक सुन ले इनकी बात अभी
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से
~~ ममता शर्मा ~~
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Saavan Geet - Mamta Sharma
सावन
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लो सावन आया ,लो सावन आया
जो बारिश पड़ी झड़ी झड पड़ी ,
जो सिमटी पड़ी कली खिल पड़ी.
लो सावन आया हाँ सावन आया
में सोई पड़ी जो उठ हुई खडी
अचानक जोरों की बरखा पड़ी
ये मन घबराया जी मन घबराया
लो सावन आया हाँ सावन आया
जो दृष्टि पड़ी कहीं पर खडी
कोई चुलबुली सी डाली अड़ी
जो गीत सुनाया जी गीत सुनाया
लो सावन आया हाँ सावन आया
अचानक कहीं जो बिजली पड़ी
कड़कती बड़ी ना रूकती झड़ी
ये तेरी है माया जी तेरी है माया
लो सावन आया हाँ सावन आया
~~ ममता शर्मा ~~
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Friday, August 17, 2012
Bhikari - Mamta Sharma
भिखारी
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हाथ उठा निरीह सी आँखें ,पर अन्दर हैं कोमल पांखें
खोल पंख ये उड़ना चाहें , लेकिन पंख बिखर हैं जाते
हंसी भी है पर खोई - खोई ,सांसें भी पर सोई - सोई
कहाँ गया वह बचपन भोला ,कैसे मिले स्कूल का झोला .
सीखे सब गुर चाल ढिटाई, कौन है मीठा कौन मिठाई
जब देखे वे बहन व् भाई ,आँखें मेरी यूँ भर आईं
क्यों ये जीवन जीने आये ,क्यों इच्छाएं मारते जाएँ
क्या अपराध हुआ है इनसे , सुख सारे क्यों छीने इनसे
कैसे दूर करूँ ये सब दुःख ,कैसे हांसिल हों इनको सुख
या रब दिखला कोई आशा ,मेरे मन कि ये अभिलाषा
रख अपने ही पास ये सब कुछ ,भेज न पृथ्वी पर सब ये दुःख
तू ही खेल वहीँ ये खेला,ले जा दुखों का अब ये रेला
वर्ना धरती फट जायेगी तब भी समझ तुझे आएगी
काश तू इसको समझ भी पाता, दुःख का अर्थ तुझे भी आता
- ममता शर्मा
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Hamare Babuji - Mamta Sharma
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हमारे बाबूजी
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मौन स्वयं में डूबे - डूबे
खड़े पर्वत से ऊंचे
सागर से गंभीर दिखें और
लगते भीषण रूखे
पर फिर भी आते ही घर में
आ जाती है हंसी
और लिए आते हैं संग वे
खूब ही सारी ख़ुशी
चुन्नू कभी- कभी ये मुन्नू
आगे पीछे डोलें
डोलती राधा और अनुराधा
माँ भी संग ही डोलें
पिता जी फिर भी अडिग पड़ी
चट्टान की भाँति बोलें
पूँछें दिन भर की बातें और
किया है क्या हम सबने
गर जो पढ़ाई ना की हो तो
कान पकड़ लें सबके
और दिखा दें तारे दिन में
जबाँ अगर हम खोलें
पर इस पर भी हम सबको ही
मान बड़ा है उन पर
बाहर जब जाते हैं उन संग
झुकें सलाम करें सब
ऐसे अपने बाबूजी पर
गर्व हमें है होता
______________________________
Wednesday, July 25, 2012
Barish - Mamta Sharma
बारिश
______________________
बारिश की बूंदों ने मिल कर छेड़ा राग टपा - टप का
जोर - जोर कभी धीरे - धीरे लगा रहा ताँता उनका
जब कुछ तेज कड़क कर बिजली बोली बादल राजा को ,
कर दो वृष्टि तेज - तेज व् दे दो नीर रियाया को !
होने दो कुछ सृजन पृथ्वी पर आने दो कुछ माया को
सुन झट उसने मेघ - मल्हार सुनाया बिजली को
अब उसने सुनी बात रानी की और बरसाया जल फिर खूब
पानी पा अपनी धरती माँ फिर देने लगी यूं फसलें खूब
चारो ऑर हरियाली फैली और खूब फले फूले सब लोग
बारिश की बोछार ने सबको किया अचानक फिर सराबोर
बारिश रानी तेरे कारण मिला है सुख फिर सबको फिर आज
तेरे आने से ही मंगल , हुआ है फिर खेतों का राज
जोर - जोर कभी धीरे - धीरे लगा रहा ताँता उनका
जब कुछ तेज कड़क कर बिजली बोली बादल राजा को ,
कर दो वृष्टि तेज - तेज व् दे दो नीर रियाया को !
होने दो कुछ सृजन पृथ्वी पर आने दो कुछ माया को
सुन झट उसने मेघ - मल्हार सुनाया बिजली को
अब उसने सुनी बात रानी की और बरसाया जल फिर खूब
पानी पा अपनी धरती माँ फिर देने लगी यूं फसलें खूब
चारो ऑर हरियाली फैली और खूब फले फूले सब लोग
बारिश की बोछार ने सबको किया अचानक फिर सराबोर
बारिश रानी तेरे कारण मिला है सुख फिर सबको फिर आज
तेरे आने से ही मंगल , हुआ है फिर खेतों का राज
मिलता सुख सब और सभी को ,मिलती रहती फिर से आस
बारिश रानी आती रहना , बुझाती रहना सबकी प्यास.
पेड़ व् पौधे सड़कें खेत, प्यासे मन या फिर त्यौहार
हम धरती के वासी चाहें भीगना तुझ मैं सौ सौ बार !
बारिश रानी आती रहना , बुझाती रहना सबकी प्यास.
पेड़ व् पौधे सड़कें खेत, प्यासे मन या फिर त्यौहार
हम धरती के वासी चाहें भीगना तुझ मैं सौ सौ बार !
ममता शर्मा
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Wednesday, June 20, 2012
Mera anokha ghoda - Mamta Sharma
मेरा अनोखा घोड़ा
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मैं चढ़ी किताब के घोड़े पे ,
तब पंख फैलाए भगोड़े ने
ले चली मुझे एक नई तरफ ,
जिसमें थे सत्य के छिपे हरफ
कहीं शून्य कहीं प्राचीन इतिहास ,
कहीं काव्य कहीं साहित्य के साज़
कहीं उड़े पंछी ,कहीं भागे हिरन
कहीं दूर आकाश से झरी किरण ,
कभी सूर्य चन्द्र उल्काएं मिलीं ,
कभी तेज पवन हो मस्त चली ,
कभी बच्चे शोर मचाते मिले ,
तो बूढ़े सस्वर गाते चले ,
कभी मिली प्रजातियों की पहचान ,
कभी जल कभी हिम कभी मिले प्रपात,
कभी उद्गम किसी नदिया का मिला ,
कभी संगम किसी सागर से मिला ,
कभी मिले महर्षि बड़े बड़े ,
हुए शिष्य भी जिनके बहुत बड़े,
मुझे मिले कई प्रेरक प्रसंग ,
जिनमें बसते थे आज के रंग,
एक जगह मिले बापू थे खड़े ,
और पास मैं ही डाकू थे खड़े ,
मिला ज्ञान जिसे समझी ही नहीं,
मिल भान जिसे भूली ही नहीं ,
कभी मिले कई अपने से लोग ,
लिए मानवता के गुण हर प्रति और ,
कभी कडवी कुछ सच्चाई थी ,
हर सूं फैली सी लड़ाई थी
किसी युद्धकी भीषण आग मिली
कहीं शांति की सेन्यअपार मिली
कभी दुःख सुख की ललकार भी थी ,
कल आज की कहीं तकरार भी थी ,
उत्तर दक्षिण पश्चिम पूरब ,
मुझे प्यारा ये घोडा हरदम ,
सब मिल सकता इस घोड़े संग
मैं हर पल चाहूँ इसका संग
मैं चढ़ी किताब के घोड़े पे ,
तब पंख फैलाए भगोड़े ने
ले चली मुझे एक नई तरफ ,
जिसमें थे सत्य के छिपे हरफ
कहीं शून्य कहीं प्राचीन इतिहास ,
कहीं काव्य कहीं साहित्य के साज़
कहीं उड़े पंछी ,कहीं भागे हिरन
कहीं दूर आकाश से झरी किरण ,
कभी सूर्य चन्द्र उल्काएं मिलीं ,
कभी तेज पवन हो मस्त चली ,
कभी बच्चे शोर मचाते मिले ,
तो बूढ़े सस्वर गाते चले ,
कभी मिली प्रजातियों की पहचान ,
कभी जल कभी हिम कभी मिले प्रपात,
कभी उद्गम किसी नदिया का मिला ,
कभी संगम किसी सागर से मिला ,
कभी मिले महर्षि बड़े बड़े ,
हुए शिष्य भी जिनके बहुत बड़े,
मुझे मिले कई प्रेरक प्रसंग ,
जिनमें बसते थे आज के रंग,
एक जगह मिले बापू थे खड़े ,
और पास मैं ही डाकू थे खड़े ,
मिला ज्ञान जिसे समझी ही नहीं,
मिल भान जिसे भूली ही नहीं ,
कभी मिले कई अपने से लोग ,
लिए मानवता के गुण हर प्रति और ,
कभी कडवी कुछ सच्चाई थी ,
हर सूं फैली सी लड़ाई थी
किसी युद्धकी भीषण आग मिली
कहीं शांति की सेन्यअपार मिली
कभी दुःख सुख की ललकार भी थी ,
कल आज की कहीं तकरार भी थी ,
उत्तर दक्षिण पश्चिम पूरब ,
मुझे प्यारा ये घोडा हरदम ,
सब मिल सकता इस घोड़े संग
मैं हर पल चाहूँ इसका संग
~~ ममता शर्मा ~~
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कवियित्री :- सुभद्रा कुमारी चौहान यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे , मैं भी उस पर बैठ कन्हिया बनता धीरे,धीरे... ले देती यदि बांसुरी...
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उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति ...