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Friday, April 8, 2011

Hum Teri Aulaad - Puneet Jain


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हम तेरी औलाद - पुनीत जैन
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 हम तेरी औलाद
करते है फ़रियाद
सब परिवार के साथ है 
हम क्यू है अनाथ?

कभी कुदरत ने तो कभी इंसाने ने 
हर और तबाही मचाई है 
कही पर भूकंप आया 
तो कही पर नदियों में बाद आई है 
किसी ने सम्प्रदैक उन्माद बढाया 
तो किसी ने बारूदी अन्ताख फैलाया |

धरती फटी घर टूटे अपनों से अपने छुते 
बचा न कोई साथ हम हो गये अनाथ
हम भी पढना कहते है 
डॉक्टर,वकील या इंजिनियर बनना चाहते  है
रोटी कपडे और छत की हमारी भी है इच्छा 
फिर क्यू लेते हो हमारी कठिन परीक्षा 

किसके आगे फैलाई हाथ किससे करे फ़रियाद 
किसको झुकाए माथा कौन है जो रखेगा सर पर हाथ
माँ की ममता बाबा का दुलार
भाई बहिन का प्यार पाने को हम है बेकरार |

भेड़ों की तरह है हमारा हाल 
सब करते है किनारा, नहीं देता कोई सहारा
मेले और फटे कपड़ो से ढकते है तन्न
सहते है गर्मी और ठिठुरन 
हम नहीं रह पाते कभी सुकून से
क्यू आज महंगा है पानी भी खून से 

सहकर सूरज की धुप और पेट की भूक
शारीर गया है सुख, मत करो दिल पर आघात
हम नहीं फौलाद हम तेरी औलाद
करते है फ़रियाद !!!

~~ पुनीत जैन ~~
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Uljhe Uljhe Se Sawaal - Puneet Jain

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उलझे उलझे से सवाल - पुनीत जैन

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उलझे उलझे से कुछ अनकहे से सवाल है मेरे
बचपन से जो मेरे दिल में पलते रहते है
पहले भी अक्सर में खुदसे पूछा करती थी
जवाब कभी नहीं मुझे मगर मिल पाते थे ..??

माता पिता की में लाडली रही दिल की रानी बनी रही
हर पल उनके प्यार के छाव में ही तो में पली
भैया बड़ा शरारती था सताता रहता था सबको
लेकिन फिर भी क्यू उसको कभी किसी की डांट नहीं पड़ी .??

रात रात भर बहार घूमता दोस्तों संग बतियाता
मोबाइल के बिल से उसके पापा का सर घूम जाता
लेकिन मेरे सिर्फ महीने में एक बार पिक्चर चले जाने से
फ़िज़ूल खर्ची कैसे हो जाती… ये में कभी समझ नहीं पाती..??

भैया तो जो चाहे खाए उसकी पसंद का बने सब कुछ
मुझे सब्जी न भाये तो क्यू मुझे ससुराल में मुश्किल होगी
भैया तो था पढाई में दब्बू फिर भी उसको थे मिलते गिफ्ट
में तो हर बार ही अव्वल आती फिर भी क्यू कभी शाबाशी मिली नहीं .??

मेरा भी दिल करता में भी पढू और सिखु कुछ अलग
लेकिन कह दिया गया तेरी शादी में करेंगे सब खर्च
भैया की इच्छा न थी फिर भी उसे भेजा पढने लन्दन
उसकी इस नाकामी पे भी दोष मेरी कुंडली में ही आया नज़र..??

भाई पे भारी है ये कहके मुझे हमेशा ताना दिया
दादी ने न कभी मुझे भैया जितना एक बार भी स्नेह दिया
दादा जी ही थे जो मुझे चाहते थे, करते थे वो मेरी बड़ाई
लेकिन यहाँ भी दादी मेरी उनको कहती न बिगाड़ो इसे

आखिर तो ये अपनी नहीं, है ये तो हमेशा से पराई है ..!!
जाना है इसे दूजे घर और सिखने है उनके रीति रिवाज़
रहने दो इसे ऐसे ही न चढ़ाव इसे अपने सर पे सरकार
पर उस पल तो में थी न उनकी अपनी.. छोटी सी नन्ही सी जान
फिर क्यू शादी के पहले ही पराया कर दिया था तुमने मुझे माँ..??

ये ही कुछ सवाल है मेरे मन में जो कई सालो से उठते है
नहीं इनका मतलब कोइ पर फिर भी दिल में बहुत ये चुभते है
कोई न दे सकेगा इन् सवालों का मुझको जवाब ये जानती हु में
फिर भी माता - पिता से एक बार पूछना चाहती हु में....
क्यू हु में आपके लिए पराई जब आपके ही खून से बनी हु में …????

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Thursday, March 24, 2011

Beti maa ki parchai hoti hai - Puneet Jain "Chinu"

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बेटी माँ की परछाई होती है - पुनीत जैन "चिनू"
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माँ ही जनम देती है, फिर ऐसे क्यू रोटी है,
बेटी ही तो माँ की, परछाई होती है|
आंगन में हलके हलके पाँव जब चलती है,

पायल गूंज उठती है,
एक सुकून सा देती है,
बेटी माँ की परछाई होती है |


बचपन बढ़ते बढ़ते,
जवानी की सीढिय चढ़ते चढ़ते ,
आंगन समेटने को जी करता है,
मनो कभी ये भी छुट जायेगा,
मनन क्यू डरता है |

में जब भी गोलमटोल होकर सोती ,
माँ चुपके से माथे पर हाथ लगा रोटी,
की में भी जाउंगी परदेश,
में धुन्दती सपनो में पिया का देश |

आँख खुलती तो सामने होता मेरा ही घर ,
मुझको लगता है फिर कैसा ये दर, 
कौन मुझको करेगा दूर ,
क्यू है माँ बाप ऐसे मजबूर|

ये जरुरी है में छोड़ दू अपना घर,
जिसमे जीती रही साँस हाथो में भर,
प्यार कण कण से करती हु में इस कदर,
हो गयी जो जुदा सच में जाउंगी मर |

कोई बन के सजन आ भी जाये इस कदर,
जान लेले मगर छीने न मेरा घर ,
में तेरे वास्ते पि भी लुंगी ज़हर,
बस मुझे बक्श दे मेरे बाबुल का घर !!!

~~ पुनीत जैन "चिनू" ~~

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