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Saturday, April 19, 2014

Chitran - Adarsh Tiwary

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चित्रण 
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चौकोर सफ़ेद पन्ने सा जीवन चरित्र था मेरा
कोई दाग नहीं, कुछ भी नहीं, अंत किनारा गहरा
जब बरस पड़े कुछ रंग, लाल हरे नीले से सारे
चित्र बना वो ऐसा , सुनहरे चमक मे इंद्रधनुष उखर पड़ा हो जैसे

कागज के कश्ती बन, दरिया मे मैं बह चला
कश्ती और पानी का, शुरू हुआ यूं सिलसिला
थपेड़ो को झेलता, तूफानों से खेलता
आगे बढ़ चला मैं काफिर सा फुहारो संग संभालता

तूफानो के आगाज से कायर सदैव घबराते हैं,
रंग भरी इस दुनिया मे, कोरे ही रह जाते हैं
जो सैलाब न आते तो ठहराव का जिक्र न होता
जो फुहारे समझ इन्हे पार न करते, उन्हे वीर कहा ना जाता

रास्ते आसान सभी को भाते है,
कुछ अपने रास्ते खुद लिख जाते है
जोखिम उठाना हर एक के बस का नहीं,
 चुने कल को गढ़ने के अपने माने होते हैं


रास्ता नया हर वक़्त सहारे को पुकारा करती है
हर शाम ढलने पर निशा सूरज को आवाज़ देती हैं
आत्म परिभाषित ये जीवन का मेरा यह एक अंश हैं
प्रीत संकल्प का चित्रण है, यह मेरे स्वेत लेखन मे।।

- आदर्श तिवारी
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Friday, October 25, 2013

Prasang - Adarsh Tiwary

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    प्रसंग
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लफ़्ज़ों में इज़हार करना चाह रहा था जिन बातों को,
उस जज़्बात के मायने मेरे लिए बड़े ख़ास थे,
इशारे काफी थे समझाने को,
पर सुनने वो लफ्ज़ तुम वही मेरे साथ थे।

धीमी धीमी बूंदों की बारिश,
बरश रही थी नन्ही बूंदे
कर रही थी श्रृंगार तेरा,
मृगनैनी पलकों के तेरे ।

चिन्हित करे सौंदर्य को ,ऐसी सकशियत तेरी,
मुख दर्शाती स्वप्नसुंदरी, रंग तेरा सुनेहरा
कमल पंखुड़ी से पवित्र तू, मन चुलबुल अति चंचल ,
हर बात में तेरी सोच सही, सलाह भाव अति गहरा ।


कैसे करू मैं पहल, बुनू शब्दों के जाल संग तेरे,
जानता हु तेरे दिल का राज़ पर  कैसे निकालू तुमसे वो बात
तेरे भी नज़रिए में अपने को तौलना बड़ा ज़रूरी था,
तुमने जो संकेत दिए, वो भाव नित नृत्य मयूरी था ।

स्वाभाविक विचार सामान, सम्मान था मेरे प्यार को
अत्यंत मतभेद के पार , मुझे मेरा नया संसार स्वीकार था ।।

 - आदर्श तिवारी
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Mera Raj dulara - Kusum Sharma

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मेरा राजदुलारा आँखों का तारा
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सो जा मेरे राजदुलारे, तुम हो मेरी आँखों के तारे
माना तेरे पास नहीं मै, पर तुझसे भी दूर नहीं मै
हरदम तेरे साथ रहूंगी, चारो पल में पास रहूंगी
निदिया रानी आएँगी, तुझको वो सुलायेंगी
चंदा मामा आएगा, झुला वो झुलायेगा
परियां रानी आएँगी, लोरी तुझे सुनाएंगी
मेरा राजा सो जायेंगा, निदिया में वो खो जायेंगा ।

उस समय मै तेरे सपने में आकर, तुझ पर प्यार लुटाओंगी
तेरे नन्हे हाथो को छु कर, तुझसे लड़ लड़ाऊँगी
तुझ पर प्यार लुटाऊगी, तुझ को ये समझाऊगी
माना तुम मुझको देख न पाओ, लेकिन ये एहसास कराऊगी
चलते हुए तुम गिर जाओ, तो आकर तुम्हे उठाऊँगी

टौमी तेरे साथ रहेगा, तुम सोओगे वो सोएंगा, तुम खेलोगे वो खेलेगा
तुम दोनों की मस्ती देख कर, मै भी मस्त हो जाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे, कल फिर मिलने आऊँगी
परियों के साथ मिलकर, तुझको तारो की सैर करवाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे तुम हो मेरी आँखों के तारे ।

- कुसुम 

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Woh chand lafz - Dinesh Gupta

वो चंद लफ्ज़ -----------------------------------

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….

उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी,  बेचैनी,  बेकरारी,  बेखुदी, बेहोशी,  ख़ामोशी……......
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं

इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं........
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................

                        - दिनेश गुप्ता -
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Thursday, June 27, 2013

Aasha aur dard - Milap Singh

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आशा और दर्द - मिलाप सिंह 
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उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
खुशियों की माला बनाने की कोशिस में
टूटे धागे के मनको सा बिखर जाता हूँ

बज्म में अपने जज्बात छुपाने की खातिर
उछलते पैमाने की तरह मैं छलक जाता हूँ
हाल ये है हिज्र-ए-मोहबत में मेरा कि
दीद के बस एक पल को मैं तरस जाता हूँ

दिल जलाती हुई अँधेरी रातों में 'अक्स'
गरीब के आंसूं की तरह मै बरस जाता हूँ
शव को देखता है कोई हसरत से मगर
सुबह नशे की तरह मै उतर जाता हूँ

दर्द, गम और तन्हाई ही दिखे मुझको बस
उठा के कदम खुदा मै जिधर भी जाता हूँ
उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
 
~~ मिलाप सिंह ~~ 
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Tuesday, September 18, 2012

Kuch lamhe chura le raaton se - Mamta Sharma

" कुछ लम्हे चुरा लें रातों से "
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कुछ लम्हे चुरा लें रातों से 
छिप छिप कर चलो उड़ जाएँ हम 
इस राग रंग के झंझट से ,
कुछ देर किनारा पायें हम . 
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से 

कुछ देर करें बातें अपनी 
कुछ देर सुनें उनकी बातें .
कुछ दर्द के लम्हे हों लब पर 
कुछ हों खुशियों की सौगातें 
कुछ भी ना छिपायें मन में हम 
 कुछ लम्हे चुरा लें रातों से .
कभी करें पुरानी याद नई 
कभी लें आहट आगत की भी 
कभी बुनें नए से स्वप्न ढेर 
कभी ले का आयें सुबह नई 
इन सारी बातों की खातिर 
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से 

ओ मेरे बेकल मन तू भी 
कुछ ठौर तो पा ले एक घडी 
यूँ दौड़ता ही जो जाएगा 
एसे तो तू थक जाएगा 
रुक सुन ले इनकी बात अभी 
कुछ लम्हे चुरा लें रातों से 
~~ ममता शर्मा ~~

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Monday, September 17, 2012

Naadan Khamoshi - Rishish Dubey

नादान खामोशी 
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जहाँ शोर है वहां तू ही तू 
तू मिले तो हो शुरू गुफ्तगू
तेरा घर कहाँ, क्या तेरा पता
सच सच बता, सच सच बता
कभी आके तू मुझसे भी मिल
ये आरज़ू करे मेरा दिल
की मुझको बता दे राज़ वो 
जो दबी सी है इक बात वो
तू चुप है मगर ये शोर क्यूँ
खीचें मुझे सब ओर क्यूँ 
सब ओर क्यूँ सब ओर क्यूँ
अब कैसे हो 'राही' बेखयाल 
ज़िन्दगी कई सवालों का जाल
सीने में है तूफ़ान सा
हर पल लगे बेईमान सा
सब मिट गया सब मिट गया
धोखा हुआ मैं लुट गया 
ये भाग दौड़ ये जुस्तजू 
कामयाबी का जूनून 
हार जीत की आरजू 
मुझको नहीं, मैं क्या करूँ
मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ
बस हुआ मैं थक गया
तू नहीं मिली मैं जहाँ गया
जवाब भी मुझको बता
अपने दिए सवालों का
क्यूँ चुप है इस तरह
असली क्या है चेहरा तेरा
मुझे यूँ तनहा न कर
ढूँढता तुझे फिर रहा
आ भी जा अब आ भी जा 
ऐ नादान ख़ामोशी 
ऐ नादान ख़ामोशी 
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Kaash wo taara mil Jata - Rishish Dubey "Raahi"

काश वो तारा मिल जाता
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एक किनारा ,एक लहर 
एक ही माझी मिल जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

दूर नहीं है वो मुझसे
मुझको अब भी दिखता है
पा लेता उसको मैं शायद
कोई बढ़ावा मिल जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

था खाली ही जब घर मेरा
खाली खाली हर मंजिल
एक नगर , और एक डगर
कैसे 'राही' थम जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

हूँ आवारा मैं तो क्या
वो तारा भी आवारा है
जिस शब्-ए-महफ़िल में मैं बैठूं
मुझपे हंसने आ जाता
हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता |

बचपन में थी बात सुनी
वो तारा हर शब् गिरता है
मिल जाता जो साथ तेरा
तेरे दामन में गिर जाता
वो तारा मुझको मिल जाता
तेरे दामन में गिर जाता
वो तारा मुझको मिल जाता

हाथ बढाया था मैंने
ऐ काश वो तारा मिल जाता ||

 ~~ ऋषीश   दुबे ~~
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Friday, August 17, 2012

Aaj kuch likhne ka dil kar raha - Kuldeep Sahoo


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आज कुछ लिखने का दिल कर रहा
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 आज कुछ लिखने का दिल कर रहा है...
आंखो मे छिपा है कोई सागर जो खुद ही बह रहा है...
अनचाहा दर्द जिसे दिल खुद ही सह रहा है...
आज फिर कुछ लिखने का दर्द कर रहा है...

हर गम के पीछे अब बहाना एक ही है...
दिल है एक तरफा रास्ता आना जाना एक ही है...
पर जो अंदर आज्ञा उसे बात बताना एक ही है...
इस रास्ते पर से लौट कर जाना एक ही है...

किसी के आने और जाने पर हक़ जाताना मुश्किल है...
किसी के आने की खुशी और जाने का गम जाताना भी मुश्किल है...
किसी के लौट जाने पर अफसोस जाताना मुश्किल है...
किसी के चले जाने के बाद उस रास्ते पीआर चल पाना मुश्किल है...

छोड़ वो पुराना रास्ता कोई नया देख अब हर कोई कह रहा है...
शायद कोई अपना उस रास्ते पर रहा है...
पुराना रास्ता है मुझको प्यारा ये मेरा दिल कह रहा है...
आज फिर कुछ लिखने का दिल कर रहा है...

" कुलदीप साहू "
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Mitti ki chitthi - Vivekanand Joshi

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"मिट्टी की चिट्ठी"
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मिट्टी से आई चिठ्ठी,बस यही मुझ से  कहती है,
कि कुछ नजरें आज भी तेरे इंतजार में, रास्ते पर टिकी रहती हैं,
फीके लगते हैं वो रोशनी,वो रंग, वो आसमान में,
बेमन ऊङती पतंग,टप टप करती, बारिश की बूंदे,
आज भी तुझे भिगोने आती हैं,

नाम न पता तेरा, वो अंजान यूँही बरस जाती हैं,
रात में तेरा ख्याल नींद उङा देता है,
अब तो अँखियाँ तेरे दीदार को तरस जाती हैं,
खुशबू वो सौँधी सौंधी पानी से भीगी मिट्टी की,
क्या वहाँ भी मन को भाती है,

यहाँ तो नजरंदाज करते थे ,क्या वहाँ इसकी याद सताती है,
मिट्टी से आई चिठ्ठि मुझे हर पल तेरी याद दिलाती है,
अगर दूरी है,समंदर भर की तो नजदीकी भी है पल भर की
पर एहसास वो छूने का,वो इतमिनान,साथ होने का
वो हवा नही देती है,जो तुझ से टकराकर मुझ तक बहती है,
मिट्टी से आई चिट्ठी......
.
    -विवेकानंद जोशी
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Kuch Log Masiha kehte hain - Ashish Pant


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कुछ लोग उसे मसीहा कहते हैं
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सरापा इश्क ही से भरपूर था वो,
कुछ लोग उसे मसीहा कहते हैं |



अंदाज़ उन के भी अजीब कम नहीं,
कभी निहां कभी नुमाया रहते हैं |



उनके दरमियाँ बस मोहब्बत ही थी,
बाकी कहें, कैसे इक दूजे को सहते हैं |



आखिर डूब गया, वो जो कहता था,
कि आ चल दोनों संग संग बहते हैं |



वक़्त धीमे धीमे रिसता ही जायेगा,
ऐसे बाँध यक-ब-यक नहीं ढहते हैं |

" आशीष पंत "
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Sunday, June 24, 2012

Yaadon Bhari Wo Library - Adarsh Tiwary

यादों भरी वो लाइब्ररी.. 
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 आज दिखी वो लाइब्ररी जहा हम तुम जाया करते थे,
ज़िन्दगी के पन्नो में बातें उखेरा करते थे |
आज उन यादो से जुड़ने का एक और द्वार मिल गया ,
और मिला वो आधा प्यार, जो कभी यादों में था दब गया |

किताबों से भरी हर वो तख़्त निहारा करती थी,
जब तुम  उस कोने से मुझे पुकारा करती थी |
सन्नाटे मे हसने का तुम्हारा,वो एहसास मुझे फिर मिल गया, 
हर उस नज़ारे का मुझे,फिर से नज़ारा मिल गया |

  याद आई वो मेज़ जहा हम तुम संग बैठा करते थे,
मिलती थी हमारी नज़रे ,घंटो बातें किया करते थे |
वहा जाना तो बस, जाना पहचाना सा एक बहाना था,
वक्त की खाई मे भी,तुमसे मिलने जो आना था |

रोज़ नए अध्याय हम अपने किस्से में जोड़ा करते थे, 
 तुम कहती थी, मैं सुनता था और ये दिन बीता करते थे |
 किताबों के पन्नो सा,जहां हम एक दूजे को पढ़ा करते थे ,
याद आ गयी वो लाइब्ररी जहा हम तुम जया करते थे।   
 
~~~ आदर्श तिवारी ~~~
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Sunday, June 17, 2012

Premi Ke Notes - Akhter Ali

प्रेमी के नोट्स
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नास्तिक है वो सब
जो खड़े है
प्रेम के विरोध में !
प्रेम से सहमत न होना
स्वय से असहमति है !
जो खुद का नहीं
वो खुदा का नहीं !
रोजे नमाज
पूजा अर्चना
सब दिखावा है
ढोंग है
उनके लिए जो खड़े है
प्रेम के खिलाफ !
कैसे हो स्वीकार की
किसी को प्रेम भी
अस्वीकार है !
सावधान
उनसे नजदीकी क्यों
जिनकी प्रेम से दूरी है !
वो टूट जायेगा
जो जुडा नहीं
जो भीगा नहीं
वो खिलेगा कैसे ?
छंद अलंकार अनुप्रास
न खोजियेगा
ये कवि के नहीं
प्रेमी के नोट्स है !

~~ अखतर  अली ~~
___________

Koi baat chale - Ashish Pant

कोई बात चले ...
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मद्धिम सूरज, संतरी आकाश, उजले बादल
उठती लहर, ढलती शाम, हल्का चाँद
शीतल पवन, शांत साहिल, ढीली रेत और मूंगफली - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले

काली रात, जगमगाता शहर, उजली राहें
भागते वाहन, गलियां रोशन, जर्रा रोशन,
ऊंची मीनार वीरान छत ढेर से तारे और चने के दाने - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले

पहली बारिश, सौंधी मिट्टी, टिन की छत
ठंडा फर्श, खुली खिड़की, हल्के छींटे
जलती अंगीठी, उठता धुआं और गरम भुट्टा - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले

भागती ट्रेन, लम्बा सफ़र, साफ़ आसमान,
झिलमिलाती नदी, लम्बा पुल, दूर पहाड़,
खेत खलिहान, पकती फसल और दाल मोठ - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले

चलती घडी, रुका लम्हा, गहरी सांस
कांपते हौंठ, बढती धड़कन, गूँजता सन्नाटा
खामोश जुबान, बोलती निगाह और.... तृप्ति - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले...

~~ आशीष पन्त ~~
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Tumhara chehra - Kusum


 तुम्हारा चेहरा 
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तुम्हारा चेहरा झील जैसा उसमे ये आँखे कमाल है
कभी ये चंचल हो जैसे झरना
इनकी गहराइयो में समुन्दर जैसे उसमे हो उतरना

तुम्हारी आँखे है या जादू की पुडिया
इशारों पे अपनी नाचती है दुनिया
उठती है पलके तो उगता है सूरज

विरानो को छू कर सिखा दे सवारना
सजदे में झुक जाऊ दिल मेरा चाहे
तुम्हारी ये आँखे खुदा की शक्ल है
हुम्हारा चेहरा झील जैसा उसमे ये आँखे कमाल है । 
~~ कुसुम ~~
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Kaanch ka dil hai mera - Bhupendar Kr Panchal

 काँच का दिल हैं घर मेरा
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 ~~ भूपेन्दर कुमार पांचाल ~~
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Wednesday, June 13, 2012

Yeh dil - Kusum


यह दिल
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बहुत सी बाते ऐसी है जो अनकही रह गई, सोचते ही रहे गए गर कह न सके

जो बात दिल की थी दिल में ही रह गई।

समय के चक्र से इस तरह बदली तस्वीर, कि न चाहते हुए भी वह बदल कर रह गई,

चाह जिसे अपने से भी ज्यादा, उसी ने दिल दुखाया बहुत ज्यादा

कह गए वह बात ऐसी, दिल में लगी आग जैसी, न चुभे सोचकर भी गर चुभ गई ।

आँखों में आये आंसू दिल में टीस उठी, आँखों कि नमी बस आँखों में रह गई ।

बहुत सी बाते ऐसी है जो अनकही रह गई।

अगर हम दूसरे थे तो दूसरे ही रह जाते, उस समय क्यों दिल लगाया था

क्यों उस में हमारे अरमानो का दिया जलाया था ।

क्या हम ही मिले तुम्हे दिल से खेलने के लिए जो तुम खेले और खेल कर चले गए ।

गर मालूम होता कि ऐसा होगा, न हम यह दिल लगाते न ही जख्म पाते

जिस तरह जी रहे थे उसी तरह जी जाते , अब तो यह आलम है न जीते है न मरते है ।

इस कदर हम अपनी खामोशियाँ हम से रूठ जाए,

खेले खूब हंसी के साथ, दिल में रहे न कोई आस ।


~~ कुसुम ~~
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Kuch Pal Ki Khusiya - Kuldeep Sahoo


Kuch Pal Ki Khusiya - Kuldeep Sahoo

Poet : Kuldeep Sahoo

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kuch pal ki khushiya thi wo jo unki ankho se jhalaki thi

kuch pal ki jhushiya thi eo jinse hui unki ankhe halki thi

kuch pal ki khushiya thi wo jin ke sahare hum ji rhe the

kuch pal ki khushiya thi wo jinke liye ham har gam pi rhe the

agle kuch pal me lag gayi un khushiyo ko kisi ki najar

agle kuch pal me hone lga un khushiyo pr asr

jo the dil k kareeb wo jane lage dur

jinke the dil majboot wo bhi padne lage kamjor

ankhe kar rhi thi baya jo unke dil ka haal tha

ladte jhagadte unse beet gya 1 sal tha

har ek anshu kar rha tha hale dil baya

har ek ulfat ko akele le kar use mila kya???


kuch pal ki khushiya thi wo jinka mujhe intjar tha

kuch pal ki khushiya thi wo jinse mjhe pyar tha

kuch pal ki khusiya thi wo jinhone cheena mera karar tha

kuch pal ki khushiya thi wo jinke liye mai bekrar tha

kuch pal beete akhiri din aya

kuch pal beete uski yado ne mjhe sataya

kuch pal beete to thi wo bhi presan

kuch pal beete use rota dekh tha mai bhi hairan

pahli bar the uski ankho me anshu mere liye...

judayi k dard se the uske chehre k rng ude hue

dil me tha drd pr dil me tha karar

wo ankho k samne thi par bhi thi takrar

kuch pal ki khushi thi wo jiske liye thi wo milne ko taiyar

kuch pal ki khushi thi wo jisse mjhe ho gya tha pyar

kuch pal ki khushi thi wo jisne mjhe moda har bar

kuch pal ki khushi thi wo jiske liye bhul gaye the ham apni takrar

Poet : Kuldeep Sahoo

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Woh Khwab meri - Avaneesh Gahoi


वो ख्वाब मेरी 
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कभी परी तो कभी अप्सरा है,

कभी दुआ तो कभी दवा है

कभी तपिश तो कभी सर्द हवा है.
कभी दिल में होती है तो कभी नजर में,
कभी यादों में तो कभी ख्वाबो मैं.
कभी जानी-पहचानी है तो कभी अनजानी सी
थोड़ी पगली सी है, थोड़ी दीवानी सी.
कभी पल्लवी सी है तो कभी पंखुड़ी सी,
थोड़ी नाजुक सी है बहुत प्यारी सी.
न जाने वो ऐसी है या सिर्फ मुझे लगती है,
मगर जो भी है बहुत अपनी सी लगती है.
न जाने ये सच है या सिर्फ एक ख्वाब है
वो दूर होकर भी मेरे बहुत पास है |
~~ अवनीश गहोई ~~
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Fasale - Avaneesh Gahoi

 
फासले 
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कल फिर आई थी तुम ख्वाब में,
 
कोहरे से ढकी किसी सुबह में,
 
ओस की बूंदों सी थी तुम या सूर्य की किरण सी,
 
पल्लवी सी थी तुम या किसी परी सी,
 
वही मुस्कान थी चेहरे पर आँखों में फिर चमक थी,
 
खामोश मैं था और तुम भी चुप थी,
 
बातें तो बहुत थी पर शब्द कम थे,
 
दूर हम नहीं थे पर फासले बहुत थे.
 
देख कर तुम्हे, मैं खुश भी बहुत था,
 
दिल में उमंग थी आँखों में फिर नशा था,
 
कुछ दूर मैं चला था पर साथ तुम नहीं थे,
 
दूर हम नहीं थे पर फासले बहुत थे.....
 
 
~~ अवनीश गहोई ~~
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