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Wednesday, December 31, 2014
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India
Friday, October 25, 2013
Andhakaar aur main - Sanjay Kirar
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अन्धकार और मैं
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मैं जब से अंधेरों में चलने लगा हूँ
उजालो से डरने लगा हूँ
जब अँधेरे ने मुझे पहली दफा छुआ
मैं डरा, सहमा
अरे ये ! क्या हुआ
मेरी आँखे चुप थी जुबा बेजुबा बन गई
रास्ते गुम थे,
मंजिल पर पहुंचना सज़ा बन गई
सन्नाटा एक दम सन्नाटा ...........
अचानक एक पल ने मुझे,
अपना मतलब सिखा दिया
जब मुझे रूबरू अपने दिल से करा दिया
रास्ते बीहड़ो से अपने आप खुल गए
उस दिन जाना,
मेरे कुछ बिछड़े पल मुझसे कैसे जुड़ गए
और सपनो की बागडोर उन अंधेरो के हवाले कर गए।
-संजय किरार
अन्धकार और मैं
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मैं जब से अंधेरों में चलने लगा हूँ
उजालो से डरने लगा हूँ
जब अँधेरे ने मुझे पहली दफा छुआ
मैं डरा, सहमा
अरे ये ! क्या हुआ
मेरी आँखे चुप थी जुबा बेजुबा बन गई
रास्ते गुम थे,
मंजिल पर पहुंचना सज़ा बन गई
सन्नाटा एक दम सन्नाटा ...........
अचानक एक पल ने मुझे,
अपना मतलब सिखा दिया
जब मुझे रूबरू अपने दिल से करा दिया
रास्ते बीहड़ो से अपने आप खुल गए
उस दिन जाना,
मेरे कुछ बिछड़े पल मुझसे कैसे जुड़ गए
और सपनो की बागडोर उन अंधेरो के हवाले कर गए।
-संजय किरार
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Sanjay Kirar
Bharat ka yuvak - Puneet Jain
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भारत का युवक
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युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .
ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .
हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .
खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .
बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .
बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,
युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती
बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .
उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .
लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,
हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।
- पुनीत जैन
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भारत का युवक
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युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .
ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .
हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .
खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .
बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .
बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,
युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती
बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .
उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .
लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,
हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।
- पुनीत जैन
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Dharm se shikayat - Niraj Kumar "Neer"
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धर्म से शिकायत
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क्या खाने कोचखा
खाने की शिकायतकरने से पहले?
क्या परखा उसकेगुण दोषों कोया
यूँ हींचाँद टेढ़ा करलिया ?
ये आदत हैतुम्हारी,
अबाध स्वतंत्रता से उपजी
एक बुरी आदत.
लंबी गुलामी का असरहो गया है
तुम्हारे मस्तिष्क पर.
तुम किनारे पर बैठ
समुन्दर को छिछलाबताते हो .
किनारे पर जमागन्दगी को देख
सागर की प्रकृतिबताते हो.
ये गन्दगी सागर कादोष नहीं
यह दोष हैतुम्हारा.
जो समझते हैं स्वयंको ज्ञानी
अपने सीमित ज्ञान केसाथ.
क्या पन्ने पलटे उपनिषद, गीता के कभी
कभी कोशिश की तत्वजानने की.
चार पन्ने की कोईकिताब पढ़ी और
सबको झूठा कहदिया.
तुम क्यों नहीं तलाशतेकोई और सागर,
लेकिन वहाँ आज़ादीनहीं ||
- नीरज कुमार "नीर "
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Woh chand lafz - Dinesh Gupta
वो चंद लफ्ज़ -----------------------------------
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................
शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………
उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….
उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी, बेचैनी, बेकरारी, बेखुदी, बेहोशी, ख़ामोशी……......
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं
इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं........
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................
शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………
उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….
उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी, बेचैनी, बेकरारी, बेखुदी, बेहोशी, ख़ामोशी……......
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं
इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं........
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................
- दिनेश गुप्ता -
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Thursday, October 24, 2013
Ek anjana dar - Pravin gola
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एक अनजाना डर
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एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
हर पल मुझे तिरस्कृत कर रहा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
क्या होगा जो तेरे पाँव के बिछ्वे को, वक़्त से पहले ही ऊँगली से जुदा होना पड़े ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
कन्खिओं से मेरी ओर देख कुटिल हँसी हँसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरी पायल की झंकार को, बजने से पीछे कोई करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
एक प्रश्नचिन्ह मेरी मुस्कुराहट पर रखने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे हाथों की चूड़ी को ,तोड़ने पर मजबूर समाज करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मेरे भोले-भाले मन पर कठोरता के व्यंग कसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे माथे की बिंदिया को, वक़्त से पहले कोई पोछने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मुझमें व्याभिचारिता का सबक भरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे कामुक लम्हों को, कोई और पूरा करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मेरी अंतरात्मा को पूरे जोर से झकझोरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो इस माँग में भरे लाल सिन्दूर का रंग ,मातम के खून में बदलने लगे ।
सुनकर मैं सिहर उठी ……
अपने अनचाहे भविष्य की टीस को सूनी आँखों से पढने लगी ,
जो कहना चाहता था…… वो अनजाना डर ,
उसके हर शब्द में ,अपने लिए की हुई हर एक “फ़िक्र ” को समझने लगी ।
“नशा ” करता है पुरुष रातों में ….
तकलीफ होती है उसके परिवार को ,जब साथ छूट जाए बीच राहों में ,
वक़्त उस वक़्त बहुत ज़ालिम सा हो जाता है ,
जब एक तरफ समाज और दूसरी तरफ परिवार का भविष्य नज़र आता है ।
स्त्री उस वक़्त भँवर में ऐसे गोते लगाती है ,
जहाँ पानी तो होता है पर नाव न नज़र आती है ,
वैधव्य की चिंता उसके कोमल मन को झकझोर जाती है ,
परन्तु पछतावा ही रह जाता है ,और चिड़िया खेत चुग जाती है ।
वही अनजाना डर मुझे यूँ सचेत करने आया था ,
कि सँभल जाओ पहले ही ……..ये सन्देश देने आया था ,
रोक लो उन्हें “नशे” से गर शक्ति है तुम्हारे सीने में ,
वरना निरर्थक ये साथ है , कोई मज़ा नहीं ऐसे जीने में ।
अचानक मैं भाग उठी इतने जोर से …. मानो समुद्र में तूफ़ान आया हो ,
उस अनजाने डर को भगाने …..”नशे” से लड़ने की तलवार लाया हो ,
क़दमों में उनके गिर पड़ी …..विनती करने की लगाकर गुहार ,
मत करो “नशा”….मत करो “नशा “…..सिर्फ एक बार सोच कर देखो ….मेरा उजड़ा हुआ संसार ।।
- प्रवीन गोला
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एक अनजाना डर
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एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
हर पल मुझे तिरस्कृत कर रहा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
क्या होगा जो तेरे पाँव के बिछ्वे को, वक़्त से पहले ही ऊँगली से जुदा होना पड़े ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
कन्खिओं से मेरी ओर देख कुटिल हँसी हँसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरी पायल की झंकार को, बजने से पीछे कोई करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
एक प्रश्नचिन्ह मेरी मुस्कुराहट पर रखने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे हाथों की चूड़ी को ,तोड़ने पर मजबूर समाज करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मेरे भोले-भाले मन पर कठोरता के व्यंग कसने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे माथे की बिंदिया को, वक़्त से पहले कोई पोछने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मुझमें व्याभिचारिता का सबक भरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो तेरे कामुक लम्हों को, कोई और पूरा करने लगे ।
एक अनजाना डर मुँह बाए खड़ा …..
मेरी अंतरात्मा को पूरे जोर से झकझोरने लगा ,
सोचा है क्या तुमने कभी?
जो इस माँग में भरे लाल सिन्दूर का रंग ,मातम के खून में बदलने लगे ।
सुनकर मैं सिहर उठी ……
अपने अनचाहे भविष्य की टीस को सूनी आँखों से पढने लगी ,
जो कहना चाहता था…… वो अनजाना डर ,
उसके हर शब्द में ,अपने लिए की हुई हर एक “फ़िक्र ” को समझने लगी ।
“नशा ” करता है पुरुष रातों में ….
तकलीफ होती है उसके परिवार को ,जब साथ छूट जाए बीच राहों में ,
वक़्त उस वक़्त बहुत ज़ालिम सा हो जाता है ,
जब एक तरफ समाज और दूसरी तरफ परिवार का भविष्य नज़र आता है ।
स्त्री उस वक़्त भँवर में ऐसे गोते लगाती है ,
जहाँ पानी तो होता है पर नाव न नज़र आती है ,
वैधव्य की चिंता उसके कोमल मन को झकझोर जाती है ,
परन्तु पछतावा ही रह जाता है ,और चिड़िया खेत चुग जाती है ।
वही अनजाना डर मुझे यूँ सचेत करने आया था ,
कि सँभल जाओ पहले ही ……..ये सन्देश देने आया था ,
रोक लो उन्हें “नशे” से गर शक्ति है तुम्हारे सीने में ,
वरना निरर्थक ये साथ है , कोई मज़ा नहीं ऐसे जीने में ।
अचानक मैं भाग उठी इतने जोर से …. मानो समुद्र में तूफ़ान आया हो ,
उस अनजाने डर को भगाने …..”नशे” से लड़ने की तलवार लाया हो ,
क़दमों में उनके गिर पड़ी …..विनती करने की लगाकर गुहार ,
मत करो “नशा”….मत करो “नशा “…..सिर्फ एक बार सोच कर देखो ….मेरा उजड़ा हुआ संसार ।।
- प्रवीन गोला
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Friday, September 6, 2013
Samanta - Milap Singh Bharmouri
========================
समानता
========================
या मै अनपढ़ हूँ
इसलिए मुझे बात समझ नही आती
या वो बडबोला है
बस वह बोलने का ही है आदि
वो कहता है यहाँ पर
हर आदमी समान है
मै कहता हूँ के वह
इस दुनिया से ही अनजान है
या वो अनजान है
या अनजानेपन का ढोंग करता है
या मानसिकता कलुषित है
या उसके मन में
कोई रोग पलता है
क्या वो अँधा है
रोज उसे अपने महल से निकलते
रास्ते में मेरी झुग्गी दिखाई नही देती
क्या वो बहरा है
उसे मेरे भूखे बच्चे की
रोने की आवाज सुनाई नही देती
वो अक्क्सर कहता है
कभी अखवारों में
कभी टी. वी. पे
कभी भूखों की भीड़ में
इन्ही बाजारों में
कि यहाँ पर सब इन्सान बराबर है
- मिलाप सिंह भरमौरी
========================
Thursday, June 27, 2013
Aasha aur dard - Milap Singh
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आशा और दर्द - मिलाप सिंह
======================================
उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
खुशियों की माला बनाने की कोशिस में
टूटे धागे के मनको सा बिखर जाता हूँ
बज्म में अपने जज्बात छुपाने की खातिर
उछलते पैमाने की तरह मैं छलक जाता हूँ
हाल ये है हिज्र-ए-मोहबत में मेरा कि
दीद के बस एक पल को मैं तरस जाता हूँ
दिल जलाती हुई अँधेरी रातों में 'अक्स'
गरीब के आंसूं की तरह मै बरस जाता हूँ
शव को देखता है कोई हसरत से मगर
सुबह नशे की तरह मै उतर जाता हूँ
दर्द, गम और तन्हाई ही दिखे मुझको बस
उठा के कदम खुदा मै जिधर भी जाता हूँ
उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
~~ मिलाप सिंह ~~
======================================
Saturday, May 11, 2013
Mujhko itni himmat dilwa de - Ajay Tiwary
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे – १ + २
______________________________________
कोलाहल से ऊपर उठती हो
ऐसी बुलंद आवाज़ दिलवा दे|
उल्टी धार में भी मुझको
पतवार चलाना सिखला दे|
रेंग रहा हूँ पृथ्वी पर कब से
मुक्त आकाश की पतंग बनवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|
आलोचनाओं के झंझावातों में भी
सिर ऊंचा रखना सिखला दे|
मुश्किलों के अंधड़ में भी
वक्ष खोल चलना सिखला दे|
अत्याचारों को सहने की
कायरता से मुक्ति दिलवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|
सच को सच कह पाऊँ जो
ऐसी अद्भुत शक्ति दिलवा दे|
रिपु को गले लगा लूँ जो
ऐसी चमत्कारिक युक्ति बतला दे|
तुझसे विश्वास न हटे कभी
ऐसी अविराम भक्ति दिलवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|
दुर्गम पथरीली राहों पर निर्भय
आगे बढ़ने के गुर बतला दे|
प्यार की खातिर ग़म सहने का
पर्वतसम सम्बल दिलवा दे|
उगते सूर्य की प्रथम रश्मि का
एक अग्रणी अश्वारोही बनवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|
दुखियारों के दुख में हमदम हो
आँसू दो बहाना सिखला दे|
कृत्रिमता में जकड़े जग में
पुनः बाल्यसम किलक बँटवा दे|
अपनी कमियों पर हँस कर
अपनाने का रज सिखला दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|
~~ अजय तिवारी ~~
______________________________________
Saturday, March 16, 2013
Manali - Dharam Singh Thakur
________________________
मनाली
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तुँग-श्रृँग से घिरी
शस्य-श्यामला भरी,
दिव्य,अलौकि धाम यह
पावन’मनु’ की स्थली।
नैसर्गिक हिम श्रृंखलायें धवल
निस्तब्ध अंजुल सुर भू तल,
शिखरों पर हिम रूप निरन्तर
संचित विशाल जलधि जल।
मूल मनुष्य का जगती के
मनाली पौराणिक ऋषि संगम,
व्यास की गूँजे ऋगवेद वाणी
प्रथम विधि ज्ञान का उद्दगम।
विश्व पर्यटन व्योम में
यह चमचमाती चन्द्रिका,
मनु और व्यास की
विश्व कीर्ति पताका यहाँ।।
ऋगवेद दात्री तपोभूमि का
गौरव इतिहास दबा पड़ा,
विश्व गौरव का दिव्य पुञ्ज
अपेक्षित मनु मन्दिर खड़ा।
मनु की मनाली में
‘मनालसु’ की धवल धारा,
इस धारा के तट से उपजा
मानवता का जग सारा।
मनमोहक उपयोगी प्राणाधार
तट पर सुन्दर वन-उपवन,
देव-मानव-दानव सबको
अर्पित करता तन-मन-धन।
शस्य-श्यामला भरी,
दिव्य,अलौकि धाम यह
पावन’मनु’ की स्थली।
नैसर्गिक हिम श्रृंखलायें धवल
निस्तब्ध अंजुल सुर भू तल,
शिखरों पर हिम रूप निरन्तर
संचित विशाल जलधि जल।
मूल मनुष्य का जगती के
मनाली पौराणिक ऋषि संगम,
व्यास की गूँजे ऋगवेद वाणी
प्रथम विधि ज्ञान का उद्दगम।
विश्व पर्यटन व्योम में
यह चमचमाती चन्द्रिका,
मनु और व्यास की
विश्व कीर्ति पताका यहाँ।।
ऋगवेद दात्री तपोभूमि का
गौरव इतिहास दबा पड़ा,
विश्व गौरव का दिव्य पुञ्ज
अपेक्षित मनु मन्दिर खड़ा।
मनु की मनाली में
‘मनालसु’ की धवल धारा,
इस धारा के तट से उपजा
मानवता का जग सारा।
मनमोहक उपयोगी प्राणाधार
तट पर सुन्दर वन-उपवन,
देव-मानव-दानव सबको
अर्पित करता तन-मन-धन।
~~ धरम सिंह ठाकुर ~~
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Sunday, June 17, 2012
Sarhad - Ankita Jain
सरहद
_______________
सरहद की हर हद पर तुम हो,
दुश्मन की हर जिद पर तुम हो !
लेते हैं जो स्वतंत्र सांस हम,
उस हर सांस के रक्षक तुम हो !
कभी कारगिल में रखवाली,
या हो बम्बई की गोली-बारी !
इनसे जो बेफिक्र बनाये,
उस हर सोच के रक्षक तुम हो !
धरती कांपे या आये सुनामी,
हो जीवन की आँखों में पानी !
हर मुश्किल से राहत देकर,
उस राहत के रक्षक तुम हो !
करते हैं झुककर सलाम हम,
तुम हो तो न कभी गुलाम हम !
कभी जो खाए डर हम सब को,
उस ज़ालिम डर के भक्षक तुम हो !
दुश्मन की हर जिद पर तुम हो !
लेते हैं जो स्वतंत्र सांस हम,
उस हर सांस के रक्षक तुम हो !
कभी कारगिल में रखवाली,
या हो बम्बई की गोली-बारी !
इनसे जो बेफिक्र बनाये,
उस हर सोच के रक्षक तुम हो !
धरती कांपे या आये सुनामी,
हो जीवन की आँखों में पानी !
हर मुश्किल से राहत देकर,
उस राहत के रक्षक तुम हो !
करते हैं झुककर सलाम हम,
तुम हो तो न कभी गुलाम हम !
कभी जो खाए डर हम सब को,
उस ज़ालिम डर के भक्षक तुम हो !
~~ अंकिता जैन ~~
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Wednesday, June 13, 2012
Yeh dil - Kusum
यह दिल
___________
बहुत सी बाते ऐसी है जो अनकही रह गई, सोचते ही रहे गए गर कह न सके
जो बात दिल की थी दिल में ही रह गई।
समय के चक्र से इस तरह बदली तस्वीर, कि न चाहते हुए भी वह बदल कर रह गई,
चाह जिसे अपने से भी ज्यादा, उसी ने दिल दुखाया बहुत ज्यादा
कह गए वह बात ऐसी, दिल में लगी आग जैसी, न चुभे सोचकर भी गर चुभ गई ।
आँखों में आये आंसू दिल में टीस उठी, आँखों कि नमी बस आँखों में रह गई ।
बहुत सी बाते ऐसी है जो अनकही रह गई।
अगर हम दूसरे थे तो दूसरे ही रह जाते, उस समय क्यों दिल लगाया था
क्यों उस में हमारे अरमानो का दिया जलाया था ।
क्या हम ही मिले तुम्हे दिल से खेलने के लिए जो तुम खेले और खेल कर चले गए ।
गर मालूम होता कि ऐसा होगा, न हम यह दिल लगाते न ही जख्म पाते
जिस तरह जी रहे थे उसी तरह जी जाते , अब तो यह आलम है न जीते है न मरते है ।
इस कदर हम अपनी खामोशियाँ हम से रूठ जाए,
खेले खूब हंसी के साथ, दिल में रहे न कोई आस ।
जो बात दिल की थी दिल में ही रह गई।
समय के चक्र से इस तरह बदली तस्वीर, कि न चाहते हुए भी वह बदल कर रह गई,
चाह जिसे अपने से भी ज्यादा, उसी ने दिल दुखाया बहुत ज्यादा
कह गए वह बात ऐसी, दिल में लगी आग जैसी, न चुभे सोचकर भी गर चुभ गई ।
आँखों में आये आंसू दिल में टीस उठी, आँखों कि नमी बस आँखों में रह गई ।
बहुत सी बाते ऐसी है जो अनकही रह गई।
अगर हम दूसरे थे तो दूसरे ही रह जाते, उस समय क्यों दिल लगाया था
क्यों उस में हमारे अरमानो का दिया जलाया था ।
क्या हम ही मिले तुम्हे दिल से खेलने के लिए जो तुम खेले और खेल कर चले गए ।
गर मालूम होता कि ऐसा होगा, न हम यह दिल लगाते न ही जख्म पाते
जिस तरह जी रहे थे उसी तरह जी जाते , अब तो यह आलम है न जीते है न मरते है ।
इस कदर हम अपनी खामोशियाँ हम से रूठ जाए,
खेले खूब हंसी के साथ, दिल में रहे न कोई आस ।
~~ कुसुम ~~
___________
Woh Khwab meri - Avaneesh Gahoi
वो ख्वाब मेरी
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कभी परी तो कभी अप्सरा है,
कभी दुआ तो कभी दवा है
कभी तपिश तो कभी सर्द हवा है.
कभी दिल में होती है तो कभी नजर में,
कभी यादों में तो कभी ख्वाबो मैं.
कभी जानी-पहचानी है तो कभी अनजानी सी
थोड़ी पगली सी है, थोड़ी दीवानी सी.
कभी पल्लवी सी है तो कभी पंखुड़ी सी,
थोड़ी नाजुक सी है बहुत प्यारी सी.
न जाने वो ऐसी है या सिर्फ मुझे लगती है,
मगर जो भी है बहुत अपनी सी लगती है.
न जाने ये सच है या सिर्फ एक ख्वाब है
वो दूर होकर भी मेरे बहुत पास है |
~~ अवनीश गहोई ~~
______________________
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Meri Maa - Avaneesh Gahoi
मेरी माँ
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मेरे जन्म के साथ ही वो औरत से बनी थी माँ ,
और अपनी आँखों से देखा था मैंने उन्हें पहली बार.
जिनकी कोख मैं बिताए थे मैंने नौ महीने,
उनसे था ये मेरा पहला साक्षात्कार .
उन्होंने ही दिया था मुझे अच्छे बुरे का ज्ञान,
और कराई प्रकृति से मेरी पहचान
कभी गुस्से में जो मारा था मुझे थप्पड़,
तो गीला हो गया था तकिया उनका |
और थप्पड़ मारने का दर्द,बह रहा था आंसुओं में ,
मैंने सीखा था उस रोज एक नया सबक,
और जाना माँ के गुस्से में भी है ममता,बीमारी मैं दवा है माँ का स्पर्श,
मुश्किल मैं उनका साथ है मेरी सबसे बड़ी ताकत |
माँ की खूबियों को मैं शब्दों में पिरो नहीं सकता,
माँ के ऋण से मैं कभी मुक्त हो नहीं सकता |
वो धरती पर भगवन हैं मेरे लिये,
बिन मांगे जो देती हैं वरदान सदा |
उनके होंठों पर दुआ है मेरे लिये और आँखों में कामयाबी के सपने,
ईश्वर ने दी है उन्हें सृजन करने की अद्भुत क्षमता,और असीमित धैर्य भी
मैंने उने बहुत है जगाया और सताया,अब चाहता हूँ मैं बस इतना विधाता,
न बनूँ कारण कभी उनके कष्ट का, न हों आंसूं उन आँखों में मेरी वजह से.
कायम रहे उनके चेहरे की मुस्कान सदा,और न ही कभी कम हो उनके प्रति श्रद्धा.
अवनीश गहोई
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Sunday, June 26, 2011
Adhoori chahat - Ankita Jain
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अधूरी चाहत
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आज फिर वो मेरे ख्वाबों में आया,
आज फिर उसने मुझे नींद से जगाया !
जाने कब होंगे ख़तम ये सिलसिले उसकी आहट के,
जाने कब होंगे सपने पूरे उस अधूरी चाहत के !!
कायल था जो कभी मेरी मगरूम मोहब्बत का,
लफ्ज़-ए-बयां कराती थी उसे अहसास ज़न्नत का !
पर जाने कब बदले ये सिलसिले उस सुकून और राहत के,
जाने कब होंगे सपने पूरे उस अधूरी चाहत के !!
नहीं है नाता अब कोई, मेरा और उस परछाईं का,
फिर अब भी क्यूँ हैं वो शहज़ादा मेरे ख्वाबों और तन्हाई का !
जाने कब हटेंगे काले बदरा उस बेरहम शराफत के,
जाने कब होंगे सपने पूरे उस अधूरी चाहत के !!
अंकिता जैन "भंडारी"
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Wednesday, April 27, 2011
Saccha Pyaar - Omprakash Maandar
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सच्चा प्यार - ओमप्रकाश मांदर
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दौलत भी मिली हमे, शोहरत भी मिली हमे,
फिर भी इस दिल को करार नहीं मिला |
बहुत कुछ मिला तेरे जाने के बाद हमे,
पर कहीं भी तेरे जैसा प्यार नहीं मिला |
नकली सी हंसी मिली, झूठी सी ख़ुशी मिली,
पर पहले जैसा कहीं संसार नहीं मिला |
बहुत कुछ मिला तेरे जाने के बाद हमे,
पर कहीं भी तेरे जैसा प्यार नहीं मिला |
इस जहाँ में मित्र बनाए हमने बड़े,
बड़ी निभाई हमने यारियां |
क्या कहें कुछ ऐसे भी मिले हमे,
जो चलाते थे दिल पर आरियाँ |
बड़े इंसान भी मिले, कुछ बेईमान भी मिले,
पर तेरे जितना ऊँचा दिलदार नहीं मिला |
बहुत कुछ मिला तेरे जाने के बाद हमे,
पर कहीं भी तेरे जैसा प्यार नहीं मिला |
ए दिल - सच्चा प्यार नहीं मिला ||
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Thursday, March 24, 2011
Tere Bina Main tanha - Gaurav Mani Khanal
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तेरे बिन मे तनहा..
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फिर आई रात तनहा,
जगमगाते तारे अनेक पर शांत चद्रमा तनहा,
और उस दुध्लाती रौशनी मे,
तनहा चाँद तो निहारता मेरा मन तनहा,
तरो की टीम टीम की बीच,
भुझा भुझा मेरा दिल तनहा,
और इस जगमगाती महफ़िल मे,
तेरे हाथो का साथ खोजते मेरे हाथ तनहा,
ठंडी मधुर पुर्वा के साथ आई तेरी खुशबू,
तेरे ही ख्यालो मे डूबे मन को कर गयी तनहा,
और इस मनोरम बेला मे,
तेरा साथ खोजती मेरे दिल की धड़कन तनहा,
यु तो है सब संगी साथी मेरे साथ,
पर जैसे एक राधा के बिन गोपियों के बीच श्याम तनहा,
एसे ही तेरा ना होना प्राण प्रिये ,
कर देता है मुझको तनहा,
लौट आओ प्रियतम जल्दी,
तुम बिन हो गए है मेरे सपने भी तनहा,
नैनो मे तुम्हारी चाहत इस कदर बसी है,
दिन हो या रैन केवल तुम्हारी रहा तकते है ये तनहा...
--
~~गौरव मणि खनाल~~
Aadat si ho gayi hai - Asmita
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आदत सी हो गयी हैं
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दर्द सहने की आदत सी हो गयी हैं,
खामोश रहने की आदत सी हो गयी हैं!
अब बह भी जाने दो इन आंसूओ को,
इनको तो बहने की आदत सी हो गयी हैं!!
दर्द सहने की.............
रोज वही कहा-सुनी-शिकायतो के मेले ,
वो रोज के बेचैन मंझर झगडे ओ झमेले!
रोज के उन तानो की जरुरत सी हो गयी हैं,
अब तो ये झिल्लत भी शराफत सी हो गयी हैं!!
दर्द सहने की.............
दिल लगाना , प्यार करना, फिर उसी को तोडना !
पहले तो ठुकरा देना, फिर उसी के पीछे दौडना!!
जैसे मोह्ह्बत भी विरासत में मिल गयी हैं,
अब तो प्यार की बाते भी तिजारत सी हो गयी हैं!!
दर्द सहने की आदत सी हो गयी हैं,
खामोश रहने की आदत सी हो गयी हैं!
~~ अस्मिता ~~
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Tutata Khwab - Ankita Jain
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टूटता ख्वाब - अंकिता जैन (भंडारी)
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आये थे वो मेरी ज़िन्दगी में , एक हसीं सपने की तरह .
कुछ पल ठहरे और चले गए ,
ओस की बूंदों की तरह .
क्या गिला करें उनसे ,
जब हमे किस्मत ने दगा दिया .
और समझकर हसीं ख्वाब
उसने हमे भुला दिया .
था वफाओं का जो महल ढहा ,
ताश के पत्तों की तरह .
आये थे वो मेरी ज़िन्दगी में , एक हसीं सपने की तरह .
नादाँ है ये दिल कहता है ,
वो वापस आयेंगे .
सीने से लगाकर मुझे अपने
हर शिकवे को मिटायेंगे .
कैसे यकीन दिलों इसे की ,
उसने तो हमे भुला दिया .
और एक पल में अपने से
बेगाना बना दिया .
बिखर गयी हर उम्मीद आज ,
रेट के टीले की तरह .
आये थे वो मेरी ज़िन्दगी में , एक हसीं सपने की तरह .
~~ अंकिता जैन (भंडारी) ~~
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