Showing posts with label relation. Show all posts
Showing posts with label relation. Show all posts

Sunday, June 17, 2012

Maa - Mukul Sharma

माँ
__________________

जब कभी मैं..माँ के विषय में..
लिखने का विचार करता हूँ...तो जैसे...
शब्द भी डरने लगते है...
अक्षर सब क्षरने लगते है....
और कहते है मुझसे...कि...
अस्तित्व का वर्णन हो सकता है...
पर माँ को... कौन वर्णित कर सकता है...?
संतो-अरिहंतो की दुआ होती है...
बुद्धो की जैसे पनाह होती है....
पूछे जब कोई... मैं क्या उपमा दूं....?
माँ तो बस.....माँ होती है.....

याद है वो दिन...जब मेरे होश में...
माँ ने मुझे पहली बार चूमा था....
स्तब्ध थी धडकने....
विराम लगा था विचारों पे...जैसे...
बाकी बस तारो को छूना था....
मेरे थोड़े से दुःख पे.... वो पलके भिगो ले...
पर खुद के लिए... वो कहाँ रोती है.....?
माँ तो बस......

मौन का संगीत है.....माँ....
खुदा की जैसे प्रीत है...माँ...
बरसात में मिटटी की खुशबु है...माँ...
बस याद करो...हर सू है...माँ...
चैतन्य-मीरा का नृत्य है...माँ...
इस देह में जैसे...वो सत्य है...माँ...
हम पत्ते तो जैसे डाली है...माँ...
पीरो की कब्बाली है...माँ...
अस्तित्व में है उसीका..अनुसरण...
कुछ ऐसी ही ..निराली है...माँ...
जब रख दे वो हाथ सर पे....
जैसे जादू सा कर देती है....
माँ तो बस.........
होती ही ऐसी है ।।

~~ मुकुल शर्मा ~~ 
__________________

Friday, July 22, 2011

Adhunik Sanskar - Kusum

_____________________________________

Sun आधुनिक संस्कार Fingers crossed

_____________________________________

न जाने क्यों मेरी आखें नम थी ।
न जाने किस दर्द में गुम थी ।
किसी भ्रम में या किसी स्वपन में गुम थी।
देख रही थी शायद आधुनिकता को ,
या फिर ढूढ़ रही थी पुराने संस्कारो को
न जाने किस चीज़ की उसको तलाश थी ।
आज अचानक देखे गए दृश्यों से दंग
थी ।
या हो रहे अत्याचार से तंग थी ।
कल तक जिसने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था
अपने मुह का निवाला भी तुमको खिलाया था
आज उसी के लिए अपने घर पर जगह नहीं ,
आज उसकी कोई कीमत या कदर नहीं,

क्यों छोड़ देते है अकेला उनको ,
जिन्होंने स्वपन देखने सिखाये हो तुमको ।

राहो मे चलना सिखाया हो तुमको ।।

Red rose कुसुम  

___________________________________

Saturday, May 21, 2011

Maa ki aas - Ankesh Jain

  ______________________________                         
माँ की आस 
______________________________

                                                खो रही है श्वास भी,

                                                            जो बस इसी विश्वास में
                                                कर सकू में कुछ बड़ा,


                                                            है वो सदा इस आस में

                                                सेकड़ो दुविधा रही,


                                                            फिर भी सदा हँस कर सहा
                                                माँ तेरी हिम्मत से ही 


                                                            मुझको मिली दुनिया यहाँ

                                                दूर तुझसे हूँ तो क्या,


                                                            साँसे मुझे तुझसे मिली
                                                दिख रही है जो छवि ,


                                                            थी तेरी ही काया कभी


                                                आपसे, पापा से ही, 

                                                            सीखा था चलना बोलना
                                                आज रचता हूँ स्वरों को,


                                                             जो कभी सिखला दिया

                                                  तेरी आँखों की नमी में है छिपी ममता सदा
                                     तेरे चरणों से मिली आशीष की धारा सदा
                                                   आज में जो हूँ जहा हूँ तेरा ही में अंश हूँ
                                    माँ तेरे इस अंश में रखना छवि अपनी सदा


                                                                             कृते अंकेश

_________________________________________

Friday, April 8, 2011

Uljhe Uljhe Se Sawaal - Puneet Jain

_______________________________

उलझे उलझे से सवाल - पुनीत जैन

_______________________________


उलझे उलझे से कुछ अनकहे से सवाल है मेरे
बचपन से जो मेरे दिल में पलते रहते है
पहले भी अक्सर में खुदसे पूछा करती थी
जवाब कभी नहीं मुझे मगर मिल पाते थे ..??

माता पिता की में लाडली रही दिल की रानी बनी रही
हर पल उनके प्यार के छाव में ही तो में पली
भैया बड़ा शरारती था सताता रहता था सबको
लेकिन फिर भी क्यू उसको कभी किसी की डांट नहीं पड़ी .??

रात रात भर बहार घूमता दोस्तों संग बतियाता
मोबाइल के बिल से उसके पापा का सर घूम जाता
लेकिन मेरे सिर्फ महीने में एक बार पिक्चर चले जाने से
फ़िज़ूल खर्ची कैसे हो जाती… ये में कभी समझ नहीं पाती..??

भैया तो जो चाहे खाए उसकी पसंद का बने सब कुछ
मुझे सब्जी न भाये तो क्यू मुझे ससुराल में मुश्किल होगी
भैया तो था पढाई में दब्बू फिर भी उसको थे मिलते गिफ्ट
में तो हर बार ही अव्वल आती फिर भी क्यू कभी शाबाशी मिली नहीं .??

मेरा भी दिल करता में भी पढू और सिखु कुछ अलग
लेकिन कह दिया गया तेरी शादी में करेंगे सब खर्च
भैया की इच्छा न थी फिर भी उसे भेजा पढने लन्दन
उसकी इस नाकामी पे भी दोष मेरी कुंडली में ही आया नज़र..??

भाई पे भारी है ये कहके मुझे हमेशा ताना दिया
दादी ने न कभी मुझे भैया जितना एक बार भी स्नेह दिया
दादा जी ही थे जो मुझे चाहते थे, करते थे वो मेरी बड़ाई
लेकिन यहाँ भी दादी मेरी उनको कहती न बिगाड़ो इसे

आखिर तो ये अपनी नहीं, है ये तो हमेशा से पराई है ..!!
जाना है इसे दूजे घर और सिखने है उनके रीति रिवाज़
रहने दो इसे ऐसे ही न चढ़ाव इसे अपने सर पे सरकार
पर उस पल तो में थी न उनकी अपनी.. छोटी सी नन्ही सी जान
फिर क्यू शादी के पहले ही पराया कर दिया था तुमने मुझे माँ..??

ये ही कुछ सवाल है मेरे मन में जो कई सालो से उठते है
नहीं इनका मतलब कोइ पर फिर भी दिल में बहुत ये चुभते है
कोई न दे सकेगा इन् सवालों का मुझको जवाब ये जानती हु में
फिर भी माता - पिता से एक बार पूछना चाहती हु में....
क्यू हु में आपके लिए पराई जब आपके ही खून से बनी हु में …????

_______________________________

Thursday, April 7, 2011

Maa - Gaurav Mani Khanal

________________________________

माँ
________________________________

पल पल बदलते इस संसार मे,
हर रिश्ते को बदलते देखा,

प्यार को तकरार मे,
अपनो को अंजानो मे बदलते देखा,
दूप को छाव मे,
छाव को दूप मे बदलते देखा,
बचपन को जवानी मे, और अब
जवानी को भी ढलते देख रहा हु,
पर इन सब बदलाव एक बिच,
एक साथ कभी ना बदला,
मेरी माँ का साथ कभी ना बदला,
छोड़ गए जब सब तनहा,
दोस्त बनकर माँ साथ आई,
टुटा जब मन कोई सपना,
हमदर्द बनकर माँ मेरे साथ रोई,
खाया धोखा इस दिल ने जब,
प्यार लेकर सारे संसार का माँ आई,
कभी जब मन अशांत अधीर हुआ,
धीरज ले आँचल मे माँ आई,
हर मुश्किल हार परेशानी मे,
होसला नया लेकर माँ आई,
डगमगाए कदम जब भी मेरे इस जीवन दौड़ मे,
साहरा बनकर साथ मेरी माँ आई,
लगने लगी जब जिंदगी एक बोझ,
उम्मीद नयी लेकर माँ आई,
कब जब हार से टुटा दिल,
प्रेणना नयी बनकर माँ आई,
कभी जब रोया सोच जीवन की आप धापी,
शांति लेकर गोद मे मेरी माँ आई,
नहीं ऐसा कोई पल इस जीवन मे,
जब माँ का साथ ना मिला हो,
कैसी भी परिस्तिथि  हो,
हर  परिस्तिथि मे रूप बदल बदल साथ मेरी माँ आई,
बेमानी होगा माँ के उपकारो को शब्दों मे ढालना,
नहीं कोई शब्द इस दुनिया मे जो दे माँ को कोई उपमा,
नहीं होगा मुमकिन जीना,
कभी माँ मेरी जो रूठ गयी,
पर जानता हु मे ये भी सच है,
जाना है हम सबको एक दिन,
नियम कठोर विधाता ने बनाया है,
बस मांगता हु इतना ही उस भगवन से,
गर दे जन्म आगे फिर कभी मुझे,
मिले जन्म इस्सी माँ की कोख से मुझे..

~~ गौरव मणि खनाल ~~
________________________________

Tuesday, March 1, 2011

Maa - Ankita Jain

____________________________________________
माँ - अंकिता जैन
____________________________________________ 

उसकी हर धड़कन में होता है सिर्फ तुम्हारा नाम ,
शायद ही कोई लम्हा ना लिया हो तेरा नाम !

अपने आंसुओं को छुपाकर तुम्हारी खुशियों को महकाया है उसने ,
उसकी दुनिया में होते हैं सिर्फ तुम्हारी आँखों के सपने !
तुम्हारी हंसी की किलकारियां महकाती हैं उसका आँगन ,
तुम्हारी आँखों के आंसू भिगो देते हैं उसका मन !

वो तो होती है ममता की मूरत ,
जिसकी आँखों में होती है सिर्फ तुम्हारी सूरत !
तुम्हारी फर्मायिशों से बढ़कर ना समझा कभी कोई दूसरा काम ,
उसकी हर धड़कन में होता है सिर्फ तुम्हारा नाम !!

तुम्हारी गल्तियों पर वो नाराज़ भी होती है ,
पर तुम्हे रुलाकर चुपके से खुद भी रोती है !
जाते ही तुम्हारे नज़र उसकी द्वार पर होती है ,
और वापसी की खबर से उसकी खुशियाँ दुगनी होती हैं !

हर दुःख से परे होता है माँ का आँचल ,
तुम्हारी आँखों की चमक होती है उसकी आँखों का काजल !
तुम्हारी एक मुस्कराहट होती है उसका मुकाम ,
उसकी हर धड़कन में होता है सिर्फ तुम्हारा नाम !!

~~ अंकिता जैन ~~

____________________________________________ 


Saturday, February 26, 2011

Priya Pitaji - Ankita Jain

________________________________

प्रिय पिताजी - अंकिता जैन

________________________________

                           आपसे हमने सीखा कि होती क्या है जिंदगी,
                           आपने हाथ जो थामा तो पूरी हुई हर ख़ुशी !
                           कोशिश भी करूँ तो आपसा बनना मुश्किल है,
                           बिन आपके मंजिल पाना नामुमकिन है !

                                         दी जो हर ख़ुशी आपने जब भी वो याद आती है,
                                         ना चाहूँ रोना तो भी आँखे भर आती हैं !
                                         मेरी हर मंजिल हर ख़ुशी पूरी थी आपके साथ,
                                         आप ना हो तो सब कुछ होकर भी लगते खाली हैं मेरे हाथ !!

                           कभी जो था आपका साया हर लम्हा मुझ पर,
                           आज भी नहीं हूँ अकेली फिर भी जाने क्यूँ लगता है डर !
                           गिरकर संभालना और संभलकर चलना आपने सिखाया है,
                           रहें हैं आप मेरी ज़िन्दगी में हर दम मेरी प्रेरणा बनकर !

                                        मेरी गलतियों पर नाराज़गी जो मुझे दुःख देती थी,
                                        पर उस दुःख को मिटाया भी आपने मुझे सीने से लगाकर !
                                        मेरा हर सपना और मेरी हर राह पूरी थी आपके साथ,
                                        आप ना हो तो सब कुछ होकर भी लगते खाली हैं मेरे हाथ !!

~~ अंकिता जैन ~~

Meri Ma - Gaurav Mani Khanal

________________________________

मेरी माँ: गौरव मणि खनाल
________________________________


                           कहने को बहुत है आपने,
                           पर तेरे जैसा कोई नही यहाँ,
                           प्यार तो मुझसे सब करते है,
                           पर तेरे जैसा दुलार नही यहाँ,
                           मेरी माँ..

                           है सब कुछ इस शहर मे,
                           पर बिन तेरे लगता है सब सुना यहाँ,
                           घर तो बसा लिया मैंने,
                           पर तेरे बिन सब अधुरा यहाँ,
                           मेरी माँ..

                            हार तरह स्वाद का खाना मिलता शहर मे,
                            पर तेरे हाथो से बनी रोटी सा स्वाद नही यहाँ,
                            सोने के लिए मखमली बिस्तर है,
                            पर तेरी थाप्लियो के बिना नीद नही यहाँ,
                            मेरी माँ..

                            हौसला देने वाले बहुत है,
                            पर सच मे आंसू पोछे ऐसा कोई नही यहाँ,
                            चेहरे के भावों को सब पढ़ते,
                            पर तेरी तरह मेरे मन को पढ़े ऐसा कोई नही यहाँ,
                            मेरी माँ..

                            आराम करने के लिए सब सुविधा है,
                            पर तेरे अंचल की ठंडक नही यहाँ,
                            दोस्तों की गपसप है,
                            पर तेरी कहानियो वाली बात नही यहाँ,
                            मेरी माँ..

                            सब ख़ुशी चाहते है,
                            पर कोई ख़ुशी नहीं देता यहाँ,
                            खुदगर्जो के शहर मे,
                            तेरे बिन बहुत अकेला हु मै यहाँ,
                            मेरी माँ..

                           क्यों दूर कर दिया किस्मत ने मुझे तुझसे,
                           तेरे बिन बहुत तनहा हु मै यहाँ,
                           आती है हार पल याद तेरी,
                           तेरे बिन दिल नहीं लगता अब मेरा यहाँ,
                           मेरी माँ..

                           बहुत आराम की जिंदगी है इस बड़े शहर मै,
                           पर सच ये है रोता हु रात को अकेले मै यहाँ,
                           तेरी यादो का सहारे कट रही है जिंदगी है,
                           वरना नहीं देता मेरा मन भी मेरा साथ यहाँ,
                           मेरी माँ..

                           तुझे देखने को दिल मेरा धड़कता है,
                           तुझसे लिपटने को मन मेरा तड़पता यहाँ,
                           तेरे कोमल हाथो का स्पर्श खोजते है सूखे हुए गाल मेरे,
                           तेरी गोद मै सर रख कर सोने को तरसता हु मै यहाँ,
                           मेरी माँ..

                           पता है मुझे रोती है तू भी अकेले मै,
                           जैसे सिसकता है दिल मेरा अकेले मै यहाँ,
                           जनता हु तसरती है तू मिलने को मुझे,
                           जैसे तडपता हु मै मिलने को तुझे मै यहाँ,
                           मेरी माँ..

                           सोचता हु कैसे कर दी मैंने इतनी बड़ी भूल,
                           कुछ सुखो के लिए चला आया इतनी दूर,
                           अब जब अकेला और तनहा हु यहाँ,
                           समझा मै जिंदगी की बात यहाँ,
                           सुख वही है जहा है मेरी माँ,


~~ गौरव मणि खनाल ~~

________________________________ 

Friday, August 20, 2010

बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है




बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |
रेशम की डोरी से -
रेशम की डोरी से संसार बंधा है |

सुन्दरता में जो कन्हैया है ,
ममता में यशोदा मैय्याँ है ,
वो और नहीं दूजा कोई वो तो मेरा राजा भैया है ,
बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |

मेरा फूल है तू, तलवार है तू
मेरी लाज का पेहेरेदार है तू
मैं अकेली कहाँ इस दुनियां में
मेरा तो सारा संसार है तू
बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |

हमें दूर भले किस्मत कर दे
अपने मन से जुदा करना
सावन के पावन दिन भैया
बहेना को याद किया करना

बहेना ने भाई के कलाई से प्यार बाँधा है,
प्यार के दो तार से,संसार बंधा है |


फिल्म - रेशम की डोरी (१९७६),
सुमन कल्यानपुर द्वारा गाया गया था |