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Friday, August 17, 2012

Hamare Babuji - Mamta Sharma

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हमारे बाबूजी 
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मौन स्वयं में डूबे - डूबे
             खड़े पर्वत से ऊंचे 
सागर से गंभीर दिखें और 
               लगते भीषण रूखे 

पर फिर भी आते ही घर में 
        आ जाती है हंसी 

और लिए आते हैं संग वे 
               खूब ही सारी ख़ुशी 




चुन्नू कभी- कभी ये मुन्नू 

           आगे पीछे डोलें 
डोलती राधा और अनुराधा
                माँ भी संग ही डोलें 

पिता जी फिर भी अडिग पड़ी
                   चट्टान की भाँति बोलें 

पूँछें दिन भर की बातें और 
                        किया है क्या हम सबने 

गर जो पढ़ाई ना की हो तो 
                     कान पकड़ लें सबके 

और दिखा दें तारे दिन में
                      जबाँ अगर हम खोलें 




पर इस पर भी हम सबको ही

                     मान बड़ा है उन पर 

बाहर जब जाते हैं उन संग 

                         झुकें सलाम करें सब 

ऐसे अपने बाबूजी पर  
                   गर्व हमें है होता 

" ममता शर्मा "
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Friday, July 22, 2011

Adhunik Sanskar - Kusum

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Sun आधुनिक संस्कार Fingers crossed

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न जाने क्यों मेरी आखें नम थी ।
न जाने किस दर्द में गुम थी ।
किसी भ्रम में या किसी स्वपन में गुम थी।
देख रही थी शायद आधुनिकता को ,
या फिर ढूढ़ रही थी पुराने संस्कारो को
न जाने किस चीज़ की उसको तलाश थी ।
आज अचानक देखे गए दृश्यों से दंग
थी ।
या हो रहे अत्याचार से तंग थी ।
कल तक जिसने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था
अपने मुह का निवाला भी तुमको खिलाया था
आज उसी के लिए अपने घर पर जगह नहीं ,
आज उसकी कोई कीमत या कदर नहीं,

क्यों छोड़ देते है अकेला उनको ,
जिन्होंने स्वपन देखने सिखाये हो तुमको ।

राहो मे चलना सिखाया हो तुमको ।।

Red rose कुसुम  

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Friday, July 1, 2011

Pita - Gaurav Mani Khanal

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पिता
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जिनकी उंगली पकड़ सिखा चलना,

जिनके सहारे से सिखा मुसीबतों से लड़ना,

जिन्होंने कर दिया त्याग आपने अरमानो का मेरे लिए,

दिन रात बिना आराम किया काम मेरी इच्छा पूर्ति लिए,



बनकर सच्चा दोस्त सदा मेरा साथ निभाया,

बनकर गुरु दुराहे पर सही मार्ग दिखाया,

बनकर भाई दुःख सुख मे गले लगाया,

बनकर योध्या जीवन संघर्ष का पाठ पढाया,



भूल गए आपने दर्द मेरी हँसी के लिए,

रोये अकेले मे मेरी उदासी के लिए,

थके नहीं कभी मेरे संग संग चले,

कैसे हो हालात हाथ कभी नही छोड़े,



माँगा नही रब से कभी कुछ आपने लिए,

मेरी ही ख़ुशी बस एक चाहत उनकी,

त्याग समर्पण नि:स्वार्थ प्रेम,

पिता और ईश्वर मे नही कोई भेद,



नहीं हो सकता है वर्णन पिता के उपकारो का,

नहीं हो सकता है वर्णन पिता के बलिदानों का,

करू जितनी भी वंदना पिता के पावन चरणों की,

नहीं गा सकता हु महिमा भगवान स्वरूप पिता की,



बस इतनी विनती करता हु परम दयालु भगवान से,

दुःख ना आये कभी मेरे पिता के भाग्य मे,

बना देना लायक इतना है परमेश्वर,

की दे सकु सारी खुशिया और सुख आपने पिता भगवान को..



~~ गौरव मणि खनाल ~~
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