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Thursday, July 4, 2013

Antim Vriksh - Devendra Sharma

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अंतिम वृक्ष 
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सहसा बोला वह एकांत,
सौंदर्यहीन तथा क्लेश-क्लांत,
वह शक्तिहीन, वह मानहीन,
वह दुखी दुखी अति दीन-हीन,

प्रकृति सुंदरी का वह श्रृंगार,
मानव-कर्मों से दुखी अपार.
हाँ तरु कहो या उसे पेड़,
मानव जीवन की वह है मेड़,

पर आज स्वयं यह रोता है,
जब मानव जन सोता है,
यह है धरती का अंतिम वृक्ष,
है मानवता को प्रश्न यक्ष,

क्यों कट गए इसके सब साथी,
लाशों पर चलते बाराती,
पर आज मशीने आई हैं,
संहार साथ वो लायी हैं,


बन गया तथापि क्रूर दानव,
कल  तक था जो कभी श्रेष्ठ मानव..

देवेन्द्र शर्मा 
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Thursday, June 27, 2013

Videsh - Mamta Sharma

बच्चे जब काम करने विदेश चले जाते हैं उनके माँ -बाबा पर क्या गुजरती है ........इसी के ऊपर है ये मेरी कविता। कुछ समय तो अपने घर वालों की याद आती है फिर सब कुछ सामान्य।
मगर माँ - पिता वे अपना मोह नहीं त्याग पाते हैं, और माँ की दशा तो सिर्फ महसूस करने योग्य ही होती है .......
 
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विदेश 
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क्या गुजरती  उन पे है ,तुम छोड़ जाते हो जब अकेला

टीस सी उठती है मन में ,ज्यों अकेला हो ये मेला

बूढी आँखें सुख- व् -दुःख में ,गीली हो -हो सूख गईं

पुत्र  प्रेम की वो डोर जपते -जपते चूर हुई
 
 
 

कोई आता अपने मन के भाव भर वो थैलियों में

भेजते हैं दूर देश प्रेम मन का थैलियों में

अश्रु पूर्ण आँखों से चुन - चुन कर तेरी रुचियाँ

माँ भरती मुट्ठी में भेजती तुझको है खुशियाँ
 
 
 

फ़ोन  पर सुन तेरी बातें ,चाहती छिपाना भाव

शक ना हो तुझे कोई झेल जाती है वो घाव

यूँ ही लड़ झगड़ के वो काटते हैं अपनी शाम

क्यों हमने सींचे बाग़ क्यों हमने रोपे आम
 
 
 

बेटा तू छोड़ - छाड़ आ जा अब यहाँ ही

हमें क्यों बुला है रहा घर अपना यहाँ ही

पर   बेटा गया जो है आएगा कहाँ  वापिस

वह तो सुख की दुनियाँ,दुःख से हो क्या हासिल
 
 
 

अपने बच्चे अपनी बीवी ,माँ  की जगह टीवी

सुख -सुविधा धन - माया ,सब की तो यहीं वीथी
 
 
पलक पांवड़े बिछाये ,दिन बीते  रात जाएँ 
 
 
बेटा - बहू  गए  जो हैं  लौट के शायद वो आयें  ................
 
~~ ममता शर्मा ~~ 
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Sunday, June 17, 2012

Maa - Mukul Sharma

माँ
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जब कभी मैं..माँ के विषय में..
लिखने का विचार करता हूँ...तो जैसे...
शब्द भी डरने लगते है...
अक्षर सब क्षरने लगते है....
और कहते है मुझसे...कि...
अस्तित्व का वर्णन हो सकता है...
पर माँ को... कौन वर्णित कर सकता है...?
संतो-अरिहंतो की दुआ होती है...
बुद्धो की जैसे पनाह होती है....
पूछे जब कोई... मैं क्या उपमा दूं....?
माँ तो बस.....माँ होती है.....

याद है वो दिन...जब मेरे होश में...
माँ ने मुझे पहली बार चूमा था....
स्तब्ध थी धडकने....
विराम लगा था विचारों पे...जैसे...
बाकी बस तारो को छूना था....
मेरे थोड़े से दुःख पे.... वो पलके भिगो ले...
पर खुद के लिए... वो कहाँ रोती है.....?
माँ तो बस......

मौन का संगीत है.....माँ....
खुदा की जैसे प्रीत है...माँ...
बरसात में मिटटी की खुशबु है...माँ...
बस याद करो...हर सू है...माँ...
चैतन्य-मीरा का नृत्य है...माँ...
इस देह में जैसे...वो सत्य है...माँ...
हम पत्ते तो जैसे डाली है...माँ...
पीरो की कब्बाली है...माँ...
अस्तित्व में है उसीका..अनुसरण...
कुछ ऐसी ही ..निराली है...माँ...
जब रख दे वो हाथ सर पे....
जैसे जादू सा कर देती है....
माँ तो बस.........
होती ही ऐसी है ।।

~~ मुकुल शर्मा ~~ 
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Friday, April 8, 2011

Uljhe Uljhe Se Sawaal - Puneet Jain

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उलझे उलझे से सवाल - पुनीत जैन

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उलझे उलझे से कुछ अनकहे से सवाल है मेरे
बचपन से जो मेरे दिल में पलते रहते है
पहले भी अक्सर में खुदसे पूछा करती थी
जवाब कभी नहीं मुझे मगर मिल पाते थे ..??

माता पिता की में लाडली रही दिल की रानी बनी रही
हर पल उनके प्यार के छाव में ही तो में पली
भैया बड़ा शरारती था सताता रहता था सबको
लेकिन फिर भी क्यू उसको कभी किसी की डांट नहीं पड़ी .??

रात रात भर बहार घूमता दोस्तों संग बतियाता
मोबाइल के बिल से उसके पापा का सर घूम जाता
लेकिन मेरे सिर्फ महीने में एक बार पिक्चर चले जाने से
फ़िज़ूल खर्ची कैसे हो जाती… ये में कभी समझ नहीं पाती..??

भैया तो जो चाहे खाए उसकी पसंद का बने सब कुछ
मुझे सब्जी न भाये तो क्यू मुझे ससुराल में मुश्किल होगी
भैया तो था पढाई में दब्बू फिर भी उसको थे मिलते गिफ्ट
में तो हर बार ही अव्वल आती फिर भी क्यू कभी शाबाशी मिली नहीं .??

मेरा भी दिल करता में भी पढू और सिखु कुछ अलग
लेकिन कह दिया गया तेरी शादी में करेंगे सब खर्च
भैया की इच्छा न थी फिर भी उसे भेजा पढने लन्दन
उसकी इस नाकामी पे भी दोष मेरी कुंडली में ही आया नज़र..??

भाई पे भारी है ये कहके मुझे हमेशा ताना दिया
दादी ने न कभी मुझे भैया जितना एक बार भी स्नेह दिया
दादा जी ही थे जो मुझे चाहते थे, करते थे वो मेरी बड़ाई
लेकिन यहाँ भी दादी मेरी उनको कहती न बिगाड़ो इसे

आखिर तो ये अपनी नहीं, है ये तो हमेशा से पराई है ..!!
जाना है इसे दूजे घर और सिखने है उनके रीति रिवाज़
रहने दो इसे ऐसे ही न चढ़ाव इसे अपने सर पे सरकार
पर उस पल तो में थी न उनकी अपनी.. छोटी सी नन्ही सी जान
फिर क्यू शादी के पहले ही पराया कर दिया था तुमने मुझे माँ..??

ये ही कुछ सवाल है मेरे मन में जो कई सालो से उठते है
नहीं इनका मतलब कोइ पर फिर भी दिल में बहुत ये चुभते है
कोई न दे सकेगा इन् सवालों का मुझको जवाब ये जानती हु में
फिर भी माता - पिता से एक बार पूछना चाहती हु में....
क्यू हु में आपके लिए पराई जब आपके ही खून से बनी हु में …????

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Thursday, April 7, 2011

Darta hoon main - Gaurav Mani Khanal


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डरता हु मैं
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कहता नहीं किसी से,
डरता हु 
मैं
 आपने आप से,
नहीं बोलता हु 
मैं
 आपने ही दिल से,
डरता हु मैं इस दिल की चाहत से,

मन तो बहुत करता है बनाऊ कोई  दोस्त,
पर डरता हु 
मैं
 दोस्त की बेवफाई से,
नही बोलता हु 
मैं
 किसी अनजान से,
डरता हु किसी को आपना बनाने से,

प्यार नही करता किसी से,
डरता हु दिल टूटने के दर्द से,
नही जानता विश्वास का मतलब,
डरता हु इस दगाबाज़ ज़माने के चालो से,

नही चाहता मुस्कुराना है,
डरता हु हँसी के पीछे छुपे गम से,
नही जानता जीतना मै,
डरता हु हार के लम्बे हाथो से,

खुल के जीना भूल गया है,
डरता हु काल की मार से,
भूल गया जिंदगी के मायने मै,
डरता हु आने वाले कल के भार से,

भावहीन है चेहरा मेरा,
डरता हु कोई पढ़ ना ले डर को मेरे,
शब्द नही है मेरे मन के कोष मे,
डरता हु मन की वेदना किसी को कहने से,

डरता हु मै हार पल के बदलाव से,
जीवन परिवर्तन के सिधांत से.....

~ गौरव मणि खनाल~
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