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Thursday, June 27, 2013

Amrit Kalash baat do jag me - Anand Vishwas

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अमृत-कलश बाँट दो जग में
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अगर हौसला तुम में है तो,
कठिन नहीं है कोई काम।
पाँच - तत्व के शक्ति - पुंज,
तुम सृष्टी के अनुपम पैगाम।

तुम में जल है, तुम में थल है,
तुम में वायु और गगन है।
अग्नि-तत्व से ओत-प्रोत तुम,
और सुकोमल मानव मन है।

संघर्ष आज, कल फल देगा,
धरती की शक्ल बदल देगा।
तुम चाहो तो इस धरती पर,
सुबह सुनहरा कल होगा।

विकट समस्या जो भी हो,
वह उसका निश्चित हल देगा।
नीरस जीवन में भर उमंग,
जीवन जीने का बल देगा।

सागर की लहरों से ऊँचा,
लिये हौसला बढ़ जाना है।
हो कितना भी घोर अँधेरा,
दीप ज्ञान का प्रकटाना है।

उथल-पुथल हो भले सृष्टि में,
झंझावाती तेज पवन हो।
चाहे बरसे अगन गगन से,
विचलित नहीं तुम्हारा मन हो।

पतझड़ आता है आने दो,
स्वर्णिम काया तप जाने दो।
सोना तप कुन्दन बन जाता,
वासन्ती रंग छा जाने दो।

संधर्षहीन जीवन क्या जीवन,
इससे तो बेहतर मर जाना।
फौलादी ले नेक इरादे,
जग को बेहतर कर जाना।

मानव-मन सागर से गहरा,
विष, अमृत दोनों हैं घट में।
विष पी लो विषपायी बन कर,
अमृत-कलश बाँट दो जग में।

~~ आनन्द विश्वास ~~ 

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Sunday, June 17, 2012

Piche mud kar kabhi naa dekho - Anand Vishwas

पीछे मुड़ कर कभी न देखो
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पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे  ही तुम बढ़ते जाना।
उज्ज्वल "कल" है तुम्हें बनाना,वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।

संघर्ष आज तुमको करना है,
मेहनत में तुमको खपना है।
दिन और रात तुम्हारे अपने,
कठिन परिश्रम में तपना है।
फौलादी आशाऐं ले कर, तुम  लक्ष्य प्राप्ति करते जाना।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते  जाना।

इक-इक पल है बहुत कीमती,
गया समय  वापस ना आता।
रहते समय न जागे तुम तो,
जीवन भर रोना रह  जाता।
सत्य-वचन सबको खलता है,मुश्किल है सच को सुन पाना।
पीछे मुड़  कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते  जाना।

बीहड़   बीयावान  डगर  पर,
कदम-कदम पर शूल मिलेंगे।
इस  छलिया  माया नगरी में,
अपने  ही  प्रतिकूल  मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों से मुश्किल बच पाना।
पीछे मुड़ कर कभी न  देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।

कैसे  ये  होते   हैं   अपने,
जो सपनों  को तोड़ा करते हैं।
मुश्किल में हों आप अगर तो,
झटपट   मुँह   मोड़ा करते हैं।
एक  ईश जो साथ तुम्हारे, उसके तुम हो कर रह जाना।
पीछे मुड़  कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
 
~~  आनन्द विश्वास ~~
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Saturday, December 24, 2011

Mere desh ki maati sona - Anand Vishwas

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मेरे देश की माटी सोना
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मेरे देश की माटी, सोना, सोने  का  कोई  काम  ना.
जागो  भैया   भारतवासी, मेरी  है   ये    कामना.
दिन तो दिन है, रातों  को  भी, थोडा-थोडा  जागना,
माता  के आँचल पर  भैय्या ,आने  पावे  आँच  ना.

अमर  धरा  के वीर सपूतो, भारत  माँ की शान  तुम,
माता के  नयनों  के तारे. सपनों  के   अरमान  तुम.
तुम  हो वीर शिवा के वंशज, आजादी  के  गान   हो,
पौरुष  की  हो खान, अरे तुम, हनुमत से अनजान हो.

तुमको  है आशीष   राम  का, रावण पास   ना आये,
अमर  प्रेम हो  उर में इतना, भागे  भय से  वासना.

आज  देश का वैभव रोता, मरु  के नयनों मे पानी  है,
मानवता रोती है  दर - दर,उसकी  भी  यही कहानी है.
उठ कर गले लगा लो तुम, विश्वास  स्वयं ही सम्हलेगा,
तुम  बदलो  भूगोल जरा,  इतिहास स्वयं ही  बदलेगा.

आड़ी - तिरछी   मेंट लकीरें , नक्शा   साफ  बनाओ,
एक  देश  हो, एक  वेश हो, धरती  कभी न  बाँटना.

गैरों   का  कंचन  माटी है, देश  की  माटी   सोना.
माटी  मिल  जाती   माटी  में, रह  जाता  है  रोना.
माटी की खातिर  मर मिटना, माँगों  को सूनी कर देना,
आँसू  पी - पी सीखा  हमने,  बीज शान्ति के  बोना.

कौन  रहा  धरती  पर भैय्या, किस  के साथ गई  है,
दो पल  का है  रेंन  बसेरा, फिर  हम सबको  भागना.

हम  धरती के लाल, और  यह हम सबका आवास  है.
हम  सबकी हरियाली   धरती, हम  सबका  आकाश है.
क्या हिन्दू,  क्या  रूसी चीनी, क्या इंग्लिश   अफगान,
एक  खून है सबका भैय्या , एक सभी की   साँस  है.

उर  को  बना  विशाल ,प्रेम का  पावन  दीप जलाओ,
सीमाओं  को  बना  असीमित,  अन्तःकरण   सँवारना.
मेरे  देश  की  माटी,  सोना ...........


 
~~ आनंद विश्वास ~~
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