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Wednesday, December 31, 2014
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India
Friday, October 25, 2013
Prasang - Adarsh Tiwary
________________________________________
लफ़्ज़ों में इज़हार करना चाह रहा था जिन बातों को,
उस जज़्बात के मायने मेरे लिए बड़े ख़ास थे,
इशारे काफी थे समझाने को,
पर सुनने वो लफ्ज़ तुम वही मेरे साथ थे।
धीमी धीमी बूंदों की बारिश,
बरश रही थी नन्ही बूंदे
कर रही थी श्रृंगार तेरा,
मृगनैनी पलकों के तेरे ।
चिन्हित करे सौंदर्य को ,ऐसी सकशियत तेरी,
मुख दर्शाती स्वप्नसुंदरी, रंग तेरा सुनेहरा
कमल पंखुड़ी से पवित्र तू, मन चुलबुल अति चंचल ,
हर बात में तेरी सोच सही, सलाह भाव अति गहरा ।
कैसे करू मैं पहल, बुनू शब्दों के जाल संग तेरे,
जानता हु तेरे दिल का राज़ पर कैसे निकालू तुमसे वो बात
तेरे भी नज़रिए में अपने को तौलना बड़ा ज़रूरी था,
तुमने जो संकेत दिए, वो भाव नित नृत्य मयूरी था ।
स्वाभाविक विचार सामान, सम्मान था मेरे प्यार को
अत्यंत मतभेद के पार , मुझे मेरा नया संसार स्वीकार था ।।
- आदर्श तिवारी
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प्रसंग
________________________________________लफ़्ज़ों में इज़हार करना चाह रहा था जिन बातों को,
उस जज़्बात के मायने मेरे लिए बड़े ख़ास थे,
इशारे काफी थे समझाने को,
पर सुनने वो लफ्ज़ तुम वही मेरे साथ थे।
धीमी धीमी बूंदों की बारिश,
बरश रही थी नन्ही बूंदे
कर रही थी श्रृंगार तेरा,
मृगनैनी पलकों के तेरे ।
चिन्हित करे सौंदर्य को ,ऐसी सकशियत तेरी,
मुख दर्शाती स्वप्नसुंदरी, रंग तेरा सुनेहरा
कमल पंखुड़ी से पवित्र तू, मन चुलबुल अति चंचल ,
हर बात में तेरी सोच सही, सलाह भाव अति गहरा ।
कैसे करू मैं पहल, बुनू शब्दों के जाल संग तेरे,
जानता हु तेरे दिल का राज़ पर कैसे निकालू तुमसे वो बात
तेरे भी नज़रिए में अपने को तौलना बड़ा ज़रूरी था,
तुमने जो संकेत दिए, वो भाव नित नृत्य मयूरी था ।
स्वाभाविक विचार सामान, सम्मान था मेरे प्यार को
अत्यंत मतभेद के पार , मुझे मेरा नया संसार स्वीकार था ।।
- आदर्श तिवारी
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Dahej ek ku-riti - Puneet Jain
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दहेज़ ...
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आज फिर मेरा कलेजा चिर गया,
दहेज़ का दानव फिर किसी की जान लील गया.
एक लड़की.. शादी कर अनजाने घर वो आती है,
बहु नहीं, एक बेटी बनने की कोशिश करती है.
फिर ऐसा क्यूँ होता है, पैसो से क्यूँ उसका मोल आँका जाता है,
दहेज़ की खातिर क्यूँ उसे प्रताड़ित किया जाता है.
क्या होता होगा जब उसके माँ-बाप को पता चलता होगा,
देख बेटी की ये दशा… कलेजा मुह को आता होगा.
क्यूँ तुम्हे बहु से नहीं, पैसो से प्यार है,
पति का भी देखो कितना कठोर व्यवहार है.
जरा सोचो.. तुमने भी तो बेटी जनी है.
वो भी तो किसी घर की बहु बननी है.
कल को उसके साथ भी ऐसा होगा,
क्या तुमसे वो सहन होगा ,
अरे .. अब तो संभलो !! इस दहेज़ के दानव को रोको.
अपने लालच की खातिर मत किसी को आग में झोंको.
तुम्हारी बहु भी तो किसी की बहिन, किसी की बेटी है,
अब भी न संभाले तो इस दहेज़ की आग में तुम्हारी बेटी है.
दहेज़ ...
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आज फिर मेरा कलेजा चिर गया,
दहेज़ का दानव फिर किसी की जान लील गया.
एक लड़की.. शादी कर अनजाने घर वो आती है,
बहु नहीं, एक बेटी बनने की कोशिश करती है.
फिर ऐसा क्यूँ होता है, पैसो से क्यूँ उसका मोल आँका जाता है,
दहेज़ की खातिर क्यूँ उसे प्रताड़ित किया जाता है.
क्या होता होगा जब उसके माँ-बाप को पता चलता होगा,
देख बेटी की ये दशा… कलेजा मुह को आता होगा.
क्यूँ तुम्हे बहु से नहीं, पैसो से प्यार है,
पति का भी देखो कितना कठोर व्यवहार है.
जरा सोचो.. तुमने भी तो बेटी जनी है.
वो भी तो किसी घर की बहु बननी है.
कल को उसके साथ भी ऐसा होगा,
क्या तुमसे वो सहन होगा ,
अरे .. अब तो संभलो !! इस दहेज़ के दानव को रोको.
अपने लालच की खातिर मत किसी को आग में झोंको.
तुम्हारी बहु भी तो किसी की बहिन, किसी की बेटी है,
अब भी न संभाले तो इस दहेज़ की आग में तुम्हारी बेटी है.
- पुनीत जैन
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Bechari Hawa - Mamta Sharma
"बेचारी हवा"
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हवा सुहानी चली बेचारीतो घबराये पत्ते,
होते पीले, लाल, सुनहरीज्यों ज्यों दिनहैं चढते
जैसे ही तुमआयीं रानी हवाहमें यूं लागा,
जो था जीवनबचा - खुचा वोभी झोंका लेभागा
उधर खबर सुनमलय बसंती आतीहै इस ओर
छोटे पौधे घबराएव डालियों केदिल चोर .
आती होगी अभीवो भैया, हम होंगे बसतीर ,
ये जो पुरवामस्तानी है येदेती है पीड
चिड़िया रानी भीबोली उस अल्ल्हड़मस्तानी से,
जरा ठहर तोहवा , उड़ा घरतेरी शैतानी से
चली हवा तोबने कई मुँह, वो भी कहाँसुनती है
धूल की चुनरी सर परओढ़े हवा तोबस उडती है.
मैं लाती हूँनयी बहारें , मैंलाती हूँ कोपल,
अगर नहीं सीखाहै तुमने, ठहरोसीखो दो पल।
छोटे पौधों अब तुमबनो सुदृढ़, नरहो सुकुमार ,
शाखाओं तुम झुकनासीखो ,अकड़ो नहर बार .
सुनो सुनो चिड़ियामहारानी, जब सेमैं हूँ आई,
वर्षा ,जाड़े ,पाले कीमुश्किल है दूरभगाई।
अब भी गरतुम नहीं होखुश तो, जराकरो तुम गौर,
मेरे आने सेहर सूँ रंग, हो जाता हैकुछ और।
थोड़े दिन कोआती हूँ, मौसमकरती रंगीन ,
छोड़ो अपनी -अपनी ढपली, मेरी सुन लो बीन।- - ममता शर्मा - -
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उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति ...

