Friday, October 25, 2013

Mera Raj dulara - Kusum Sharma

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मेरा राजदुलारा आँखों का तारा
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सो जा मेरे राजदुलारे, तुम हो मेरी आँखों के तारे
माना तेरे पास नहीं मै, पर तुझसे भी दूर नहीं मै
हरदम तेरे साथ रहूंगी, चारो पल में पास रहूंगी
निदिया रानी आएँगी, तुझको वो सुलायेंगी
चंदा मामा आएगा, झुला वो झुलायेगा
परियां रानी आएँगी, लोरी तुझे सुनाएंगी
मेरा राजा सो जायेंगा, निदिया में वो खो जायेंगा ।

उस समय मै तेरे सपने में आकर, तुझ पर प्यार लुटाओंगी
तेरे नन्हे हाथो को छु कर, तुझसे लड़ लड़ाऊँगी
तुझ पर प्यार लुटाऊगी, तुझ को ये समझाऊगी
माना तुम मुझको देख न पाओ, लेकिन ये एहसास कराऊगी
चलते हुए तुम गिर जाओ, तो आकर तुम्हे उठाऊँगी

टौमी तेरे साथ रहेगा, तुम सोओगे वो सोएंगा, तुम खेलोगे वो खेलेगा
तुम दोनों की मस्ती देख कर, मै भी मस्त हो जाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे, कल फिर मिलने आऊँगी
परियों के साथ मिलकर, तुझको तारो की सैर करवाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे तुम हो मेरी आँखों के तारे ।

- कुसुम 

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Kaate - Amulya Bharti

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काटें
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रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
ओसो से नहाती देखी ।
पत्तियों के ओंठ से सरमाती देखी ॥
रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
                                          सज - धज मुस्कुराते देखी ।
                                          भ्वरो के लिए बैठी बेकरार सी देखी ॥
                                          हवा के संग खेलती सी  देखी।
                                          अपने के लिए इंतजार सी देखी ॥
                                          रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
                                           काँटो के संग हँसती देखी ॥
औरो के लिए अर्पण सी देखी ।
टूटना ही जीवन सी देखी ॥
देखी कर्म ही झुक जाना ।
कलियो के स्वागत मे देखी ॥
स्वय ही मिट जाना ।
जब -जब देखी ऐसी ही देखी ॥
रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
         
   - अमूल्या भारती

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Maa - Vivekanand Joshi

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  माँ
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तू उम्मीद है
 तू हि धूप है
 तेरा ही ये जहाँ
 "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"
                    तुझ से ही तो मैं हूँ माँ
                    तू ही है खुशी
                    तू ही है हँसी
                    एक पल को भी रूठे मुझसे
                   वो दिन अब तू कभी ना लाना
                   तू ही है मेरी दुनिया
                  "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"
 तू एह्सास है
 जिसके आगे शब्दों ने भी सर झुकाया
 और मैं बस इतना ही कह पाया
 कि तेरा साया रहे सदा
 आखिर "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"

- विवेकानन्द जोशी

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Kanya - Puneet Jain

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कन्या - पुनीत जैन
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सुनता आया हूँ बरसों से.. की बेटिया तो घर की शान होगी,
पर किसने सोचा था की .. आते ही उनकी जिंदगी मौत के नाम होगी !

यूँ तो देवी बना पूजा करते हो मंदिरों में,
फिर क्यूँ दिखाई देती है हमें वो कचरे के ढेरो में !

राहगीरों का मनन भी पसीज उठता हैं,
जब तुम्हारे अंश क टुकड़े को कुत्ता खाता हैं !

रे निर्लज मानव..कैसे तू ये खता कर लेता है,
अपने ही अंश के टुकड़े को जुदा कर लेता है ?

बेटी से अगर इतनी ही नफरत है तो फिर क्यूँ पूजा करता हैं,
क्यूँ औलाद की उम्मीद में देवी के दर दर तू भटकता हैं !!

अरे !! बेटे तो अपने हो कर भी पराये हैं,
पर बेटियों ने तो पराई हो कर भी दो दो घर बसाए हैं !

नारी न होती तो तुम दुनियां में कैसे आते,
कैसे अपनी माँ के आँचल से यु लिपट जाते !!

विनाशकाले विपरीत बुद्धि का कथन सत्य ही समझो,
आज देवी का कातिल इंसान ख़तम ही समझो !

एक बेटी का नहीं एक माँ का भी वध करते हो,
अपने स्वार्थ की खातिर उसका दिल भी नहीं समजते हो !

ज़रा खुद को कल्पित करो उन् कंटीले नुकीले झाडो में,
पता चलेगा, कैसा दर्द होता है उन् कांटो से हुए जख्मो में !!

रे पापियों अब तो तरस खाओ, कुछ तो रहम करो,
अपने स्वार्थ की खातिर उनको यु ना ख़त्म करो.

इसलिए कहता हूँ यारो बेटी को धरती पर आने दो,
उसके पावन कदमो से इस कलयुग को स्वर्ग बन जाने दो.


- पुनीत जैन

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Dahej ek ku-riti - Puneet Jain

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 दहेज़ ...
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आज फिर मेरा कलेजा चिर गया,
दहेज़ का दानव फिर किसी की जान लील गया.

एक लड़की.. शादी कर अनजाने घर वो आती है,
बहु नहीं, एक बेटी बनने की कोशिश करती है.

फिर ऐसा क्यूँ होता है, पैसो से क्यूँ उसका मोल आँका जाता है,
दहेज़ की खातिर क्यूँ उसे प्रताड़ित किया जाता है.

क्या होता होगा जब उसके माँ-बाप को पता चलता होगा,
देख बेटी की ये दशा… कलेजा मुह को आता होगा.

क्यूँ तुम्हे बहु से नहीं, पैसो से प्यार है,
पति का भी देखो कितना कठोर व्यवहार है.

जरा सोचो.. तुमने भी तो बेटी जनी है.
वो भी तो किसी घर की बहु बननी है.

कल को उसके साथ भी ऐसा होगा,
क्या  तुमसे वो सहन होगा ,

अरे .. अब तो संभलो !! इस दहेज़ के दानव को रोको.
अपने लालच की खातिर मत किसी को आग में झोंको.

तुम्हारी बहु भी तो किसी की बहिन, किसी की बेटी है,
अब भी न संभाले तो इस दहेज़ की आग में तुम्हारी बेटी है.


- पुनीत जैन
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Bharat ka yuvak - Puneet Jain

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भारत का युवक
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युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .

ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .

हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .

खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .

बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .

बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,

युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती

बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .

उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .

लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,

हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।

 - पुनीत जैन

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Dharm se shikayat - Niraj Kumar "Neer"

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धर्म से शिकायत
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क्या खाने कोचखा
खाने की शिकायतकरने से पहले?
क्या परखा उसकेगुण दोषों कोया
यूँ  हींचाँद टेढ़ा करलिया ?
ये आदत हैतुम्हारी,
अबाध स्वतंत्रता से उपजी
एक बुरी आदत.
लंबी गुलामी का असरहो गया है
तुम्हारे मस्तिष्क पर.
तुम किनारे पर बैठ
समुन्दर को छिछलाबताते हो .
किनारे पर जमागन्दगी को देख
सागर की प्रकृतिबताते हो.
ये गन्दगी सागर कादोष नहीं
यह दोष हैतुम्हारा.
जो समझते हैं स्वयंको ज्ञानी
अपने सीमित ज्ञान केसाथ.
क्या पन्ने पलटे उपनिषद, गीता के कभी
कभी कोशिश की तत्वजानने की.
चार पन्ने की कोईकिताब पढ़ी और
सबको झूठा कहदिया.
तुम क्यों नहीं तलाशतेकोई और सागर,
लेकिन वहाँ आज़ादीनहीं ||

- नीरज कुमार "नीर "
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Dhanyawaad - Mamta Sharma

धन्यवाद
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पञ्च तत्वों को देहमें गढ़ कर,
उसमें देते प्राणको धर ,
लीला में हमकोरचते
धन्यवाद स्वीकार कीजिये   

माटी के तनमें अपनी,
 छवि कोदिखला- दिखला कर,
हम जैसों के मनको छलते
धन्यवाद स्वीकार कीजिये

कण कण मेंफैला ज्योति को,
अनहत - आहत मेंरमते ,
मंद - मंद उसपर हँसते
धन्यवाद स्वीकार कीजिये


ओर - छोर पता किसी को,
राह सुगम याअगम रस्ते ,
कस्तूरी बन, मनबसते 
धन्यवाद स्वीकार कीजिय

वाष्प में ढलमेघों में बदल,
हिम बन नदीझरनों में चल,
सागर वत हमकोधरते  

धन्यवाद स्वीकार कीजिये

- ममता शर्मा 
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Woh nib wale pen - Mamta Sharma

''वो निब्वाले पेन''
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अचानक मुझे यादआये हैं वोदिन जब चलतेथे निब वालेपेन !


मैं रोज हीघिसती थी स्याहीसे लिखती थी,
पेन की स्याहीके धब्बे मैंगिनती थी।

वो झगडे जोछोटी सी निबसे ही होतेथे,
वो लम्हे जब हमएक निब कोभी रोते थे।

वो दिन जबपरीक्षा में स्याहीना होती थी,
वो दिन जबहमारी लड़ाई नाहोती थी।

वो बचपन केदिन जब थींदोपहर लम्बी,
वो दिन जबसहेली की चोटी  हीलम्बी।

वो दिन जबकभी हम छीनके खाते थे,
झड बेरी केबेर या कटारेचुराते थे।

वो दिन जबसखी से जोबातें थीं होती,
कभी भी समयकम था, जोरातें भी होतीं।

हम संग हीबिताते ये पूरीही जिन्दगी,
कहाँ है वोमेरी पुरानी सीजिन्दगी।

जब कुछ हीरुपये मुझ कोलगते थे ज्यादा,
जब थोड़े में भीथा मस्ती सेगुजारा।

मुझे ला केदो ना एकबार कोई यारों,

निब वाले वोधब्बे फिर सेमुझ पे डालो।

- ममता शर्मा

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Bechari Hawa - Mamta Sharma

"बेचारी  हवा"
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हवा सुहानी चली बेचारीतो घबराये पत्ते,
होते पीले, लाल, सुनहरीज्यों ज्यों दिनहैं चढते

जैसे ही तुमआयीं रानी हवाहमें यूं लागा,
जो था जीवनबचा - खुचा वोभी झोंका लेभागा

उधर खबर सुनमलय बसंती आतीहै इस ओर
छोटे पौधे घबराए डालियों केदिल चोर .

आती होगी अभीवो  भैया, हम होंगे बसतीर ,
ये जो पुरवामस्तानी है येदेती है पीड

चिड़िया रानी भीबोली उस अल्ल्हड़मस्तानी से,
जरा ठहर तोहवा , उड़ा घरतेरी शैतानी से

चली हवा तोबने कई मुँह, वो भी कहाँसुनती है
धूल की  चुनरी सर परओढ़े हवा तोबस उडती है.

मैं लाती हूँनयी बहारें , मैंलाती हूँ कोपल,
अगर नहीं सीखाहै तुमने, ठहरोसीखो दो पल।

छोटे पौधों अब तुमबनो सुदृढ़, रहो सुकुमार ,
शाखाओं तुम झुकनासीखो ,अकड़ो हर बार .

सुनो सुनो चिड़ियामहारानी, जब सेमैं हूँ आई,
वर्षा ,जाड़े ,पाले कीमुश्किल है दूरभगाई।  

अब भी गरतुम नहीं होखुश तो, जराकरो तुम गौर,
मेरे आने सेहर सूँ रंग, हो जाता हैकुछ और।

थोड़े दिन कोआती हूँ, मौसमकरती रंगीन ,
छोड़ो अपनी -अपनी ढपली, मेरी सुन लो बीन।

- - ममता शर्मा - -

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Woh chand lafz - Dinesh Gupta

वो चंद लफ्ज़ -----------------------------------

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................

शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….

उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी,  बेचैनी,  बेकरारी,  बेखुदी, बेहोशी,  ख़ामोशी……......
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं

इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं........
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................

                        - दिनेश गुप्ता -
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