Thursday, June 27, 2013

Us Raat - Mamta Sharma

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उस रात
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कुछ रात हुआ भीषण निकृष्ट,सब ने पढ़ लिया पत्र में भोर।
खूब बातें झाड़ीं हर मुँह ने ,गाल बजे हुआ था शोर।
शर्मसार परिवार था रोया , दर्द से टूटा था हर पोर।
आज दिवस व् रात्रि वही हैं , घर से उनके रूठी भोर।
 
 
भूली दुनिया, रूठी खुशियाँ , उनका आज न ओर न छोर।
कहाँ गईं वे सहानुभूतियाँ , कवि ,टी वी वालों का जोर।
खा गए बीच -बिचौली वाले , रूपये लूटे ताबड़ - तोड़।
छोड़ शहर मकान बेच कर , भगे बिचारे बस्ती छोड़।
 
 
इस दुनिया में भाषण चक - मक, बातें होतीं होड़म- होड़।
कहाँ गए सुख -दुःख के साथी, दुनियां पर है छाया कोढ़।
कैसा शहर ये कैसा मेट्रो , चुरा ले गया सब जमा-जोड़।
हार गए बेचारे थक कर, याद आये गाँवों के मोड़।
 
~~ ममता शर्मा ~~ 
 
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Amrit Kalash baat do jag me - Anand Vishwas

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अमृत-कलश बाँट दो जग में
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अगर हौसला तुम में है तो,
कठिन नहीं है कोई काम।
पाँच - तत्व के शक्ति - पुंज,
तुम सृष्टी के अनुपम पैगाम।

तुम में जल है, तुम में थल है,
तुम में वायु और गगन है।
अग्नि-तत्व से ओत-प्रोत तुम,
और सुकोमल मानव मन है।

संघर्ष आज, कल फल देगा,
धरती की शक्ल बदल देगा।
तुम चाहो तो इस धरती पर,
सुबह सुनहरा कल होगा।

विकट समस्या जो भी हो,
वह उसका निश्चित हल देगा।
नीरस जीवन में भर उमंग,
जीवन जीने का बल देगा।

सागर की लहरों से ऊँचा,
लिये हौसला बढ़ जाना है।
हो कितना भी घोर अँधेरा,
दीप ज्ञान का प्रकटाना है।

उथल-पुथल हो भले सृष्टि में,
झंझावाती तेज पवन हो।
चाहे बरसे अगन गगन से,
विचलित नहीं तुम्हारा मन हो।

पतझड़ आता है आने दो,
स्वर्णिम काया तप जाने दो।
सोना तप कुन्दन बन जाता,
वासन्ती रंग छा जाने दो।

संधर्षहीन जीवन क्या जीवन,
इससे तो बेहतर मर जाना।
फौलादी ले नेक इरादे,
जग को बेहतर कर जाना।

मानव-मन सागर से गहरा,
विष, अमृत दोनों हैं घट में।
विष पी लो विषपायी बन कर,
अमृत-कलश बाँट दो जग में।

~~ आनन्द विश्वास ~~ 

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Meri Maa - Bhavana Tiwari

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 मेरी माँ
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अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ ,
चूल्हे चौके से घिरी,प्यार भरी,घर को घर सा बनाएँ, मेरी माँ ..!!

अंक में प्यार भरे ,
सोच को पंख दिए
पूजे बरगद तुलसी ,
हाथ में शंख लिए !
अपनी चोटi में गूँथ लीं तुमने,मेरे सर की बलाएँ ,मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!

तेरे वरदान फले ,
मुझको सम्मान मिले
चार धामों के सभी,
पुण्य चरणों में मिले !
मेरे जीवन में कड़ी धूप बढ़ी,अपना आशिष उढ़ाएँ,मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!

भोर की पहली किरण,
प्रार्थनाओं का चलन ,
सब दवाओं में दुआ
मंत्र पढ़ती है छुअन !
दर्द को दूर उड़ा ले के गईं ,बनके ठण्डी हवाएँ मेरी माँ !!
अपने पल्लू में बाँध लीं तुमने,सारे घर की व्यथाएँ, मेरी माँ !!


~~ भावना तिवारी ,कानपूर  ~~ 
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Us chaukhat se - Devendra Sharma

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उस चौखट से 
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उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ,
कुछ ख्वाबो का दरिया , सपनीली रात थी ,
कहना बहुत था ,सुनाने थे किस्से ,
यादों ने रखे थे अनजाने हिस्से ,
बेबस सी रोती वो चौखट दुखी थी ,
बांटी थी खुशिया जो ,शायद छिपी थी ,
जो अरमाँ संजोते थे अक्सर इकठ्ठे ,
जो नज़्मे लिखी थी यूँ लड़ते झगड़ते ,
वो रूठे मनाते , वो किस्से सुनाते ,
बारिश में मिलकर वो बूंदे चुराते ,
वो सिसकी वो आंसू जो बहते से उसपे ,
वो आंगन के पौधों से तितली उड़ाते ,
वो ममता का आँचल वो अपनों सा रिश्ता ,
वो अश्को की ज्वाला में अरमाँ झुलसते ,
कुछ छूटी हुई सी अनकही बात थी ,
हाँ उस चौखट से वो अंतिम मुलाकात थी ...
~~ देवेन्द्र शर्मा ~~ 
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Aasha aur dard - Milap Singh

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आशा और दर्द - मिलाप सिंह 
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उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
खुशियों की माला बनाने की कोशिस में
टूटे धागे के मनको सा बिखर जाता हूँ

बज्म में अपने जज्बात छुपाने की खातिर
उछलते पैमाने की तरह मैं छलक जाता हूँ
हाल ये है हिज्र-ए-मोहबत में मेरा कि
दीद के बस एक पल को मैं तरस जाता हूँ

दिल जलाती हुई अँधेरी रातों में 'अक्स'
गरीब के आंसूं की तरह मै बरस जाता हूँ
शव को देखता है कोई हसरत से मगर
सुबह नशे की तरह मै उतर जाता हूँ

दर्द, गम और तन्हाई ही दिखे मुझको बस
उठा के कदम खुदा मै जिधर भी जाता हूँ
उफनते गम के सुमुंदर में उतर जाता हूँ
मै हंसते -हंसते कहीं पे सिसक जाता हूँ
 
~~ मिलाप सिंह ~~ 
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Saturday, May 11, 2013

Prayatn - Abhishek

 प्रयत्न 
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मंजिले खोयी नहीं जाती, धुंधलाती रोशनी-ए-मशालो में ,
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलानों में ||

उम्मीदें टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
अभिमन्युं के भेदन से कोई बच  सकता नहीं | 

सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||

शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||


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Mujhko itni himmat dilwa de - Ajay Tiwary


मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे +
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कोलाहल से ऊपर उठती हो
ऐसी बुलंद आवाज़ दिलवा दे|
उल्टी धार में भी मुझको
पतवार चलाना सिखला दे|
रेंग रहा हूँ पृथ्वी पर कब से
मुक्त आकाश की पतंग बनवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|

आलोचनाओं के झंझावातों में भी
सिर ऊंचा रखना सिखला दे|
मुश्किलों के अंधड़ में भी
वक्ष खोल चलना सिखला दे|
अत्याचारों को सहने की
कायरता से मुक्ति दिलवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|

सच को सच कह पाऊँ जो
ऐसी अद्भुत शक्ति दिलवा दे|
रिपु को गले लगा लूँ  जो
ऐसी चमत्कारिक युक्ति बतला दे|
तुझसे विश्वास न हटे कभी
ऐसी अविराम भक्ति दिलवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|

दुर्गम पथरीली राहों पर निर्भय
आगे बढ़ने के गुर बतला दे|
प्यार की खातिर ग़म सहने का
पर्वतसम सम्बल दिलवा दे|
उगते सूर्य की प्रथम रश्मि का
एक अग्रणी अश्वारोही बनवा दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|



दुखियारों के दुख में हमदम हो
आँसू दो बहाना सिखला दे|
कृत्रिमता में जकड़े जग में
पुनः बाल्यसम किलक बँटवा दे|
अपनी कमियों पर हँस कर
अपनाने का रज सिखला दे|
मुझको इतनी हिम्मत दिलवा दे|

~~ अजय तिवारी ~~

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Tuesday, March 26, 2013

Aadhunik - Vaisshali S Behani

आधुनिक
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बदल रहा है दौर सारा ,
सब कुछ है बदला -बदला सा ,
नया ज़माना नए है रंगरूप ,
नया चलन है बहुरूप !



बोल चाल का ढंग बदला,
सोच विचार का रूप बदला,
क्या बदला है स्वरुप माँ का?
क्या बदली है ममता उसकी ?



क्यों न ममता आधुनिक हो जाये ?
क्यों अब भी रोये-चिल्लाए ?
क्यों वो दे कुर्बानी खुद की ?
क्यों वो हरपल नीर बहाए ?
क्यों न वो आज़ाद हो जाये ?



संतान अब तक बदली बदली
क्यों न अब ममता बदल जाये ?
संतानों की हर एक गलती पर
क्यों न अब वो सबक सिखाए ?



मुख मोड़ती थी संतान अब तक,
क्यों न माँ यह चलन अपनाये ?
हो जाये गर स्वार्थी माँ तो,
क्या हमे यह स्वीकार होगा ?



आधुनिकता के इस दौर में ,
माँ की है वही कहानी।
बदला कहाँ है ज़माना यारों
ममता अब भी है पुरानी।।

~~ वैशाली बहानी ~~

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Saturday, March 16, 2013

Videsh - Mamta

 
विदेश
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 क्या गुजरती उन पे है ,तुम छोड़ जाते हो जब अकेला
टीस सी उठती है मन में ,ज्यों केला हो ये मेला
बूढी आँखें सुख- व् -दुःख में ,गीली हो -हो सूख गईं
पुत्र प्रेम की वो डोर जपते -पते चूर हुई




कोई आता अपने मन के भाव भर वो ैलियों में
भेजते हैं दूर देश प्रेम मन का थैलियों में
अश्रु पूर्ण आँखों से चुन - चुन कर तेरी रुचियाँ
माँ भरती मुट्ठी में भेजती तुझको है खुशियाँ




फ़ोन पर सुन तेरी बातें ,चाहती छिपाना भाव
शक ना हो तुझे कोई झेल जाती है वो घाव
यूँ ही लड़ झगड़ के वो काटते है अपनी शाम
क्यों हमने सींचे बाग़ क्यों हमने रोपे आम




बेटा तू छोड़ - छाड़ जा अब यहाँ ही
हमें क्यों बुला है रहा घर अपना यहाँ ही
पर बेटा गया जो है आएगा कहाँ वापिस
वह तो सुख की दुनियाँ,दुःख से क्या हासिल




अपने बच्चे अपनी बीवी ,माँ की जगह टीवी
सुख -सुविधा धन - माया ,सब की यहीं वीथी



पलक पांवड़े बिछाये ,दिन बीते रात जाएँ



बेटा - बहू गए जो हैं लौट के शायद वो आयें ................
 


मता

Manali - Dharam Singh Thakur

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मनाली 
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तुँग-श्रृँग से घिरी
शस्य-श्यामला भरी,
दिव्य,अलौकि धाम यह
पावन’मनु’ की स्थली।

नैसर्गिक हिम श्रृंखलायें धवल
निस्तब्ध अंजुल सुर भू तल,
शिखरों पर हिम रूप निरन्तर
संचित विशाल जलधि जल।

मूल मनुष्य का जगती के
मनाली पौराणिक ऋषि संगम,
व्यास की गूँजे ऋगवेद वाणी
प्रथम विधि ज्ञान का उद्दगम।

विश्व पर्यटन व्योम में
यह चमचमाती चन्द्रिका,
मनु और व्यास की
विश्व कीर्ति पताका यहाँ।।

ऋगवेद दात्री तपोभूमि का
गौरव इतिहास दबा पड़ा,
विश्व गौरव का दिव्य ‌पुञ्ज
अपेक्षित मनु मन्दिर खड़ा।

मनु की मनाली में
‘मनालसु’ की धवल धारा,
इस धारा के तट से उपजा
मानवता का जग सारा।

मनमोहक उपयोगी प्राणाधार
तट पर सुन्दर वन-उपवन,
देव-मानव-दानव सबको
अर्पित करता तन-मन-धन।

~~ धरम सिंह ठाकुर ~~ 
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Prayatna - Abhishek Gupta

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 प्रयत्न
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मंजिले खोयी नहीं जाती, धुंधलाती रोशनी-ए-मशालो में ,
इश्क भुलाया नहीं जाता, साकी के पैमानों में |
समुद्र का सूरज तो रोज पानी में डूब के भी ऊपर आता है
क्यूंकि जिंदगी हारी नहीं जाती, उम्र के ढलालो में ||

उमीदे टूट जाती है विलापो से, ख़ुशी के ठहाको से नहीं ,
जंग जीती जाती है वफ़ा से, सैन्य लड़ाको से नहीं |
चक्रव्यूह के दरवाजो पर चाहे बैठा दो, दस महारथी,
भेदने से थमते नहीं, अर्जुन के बेटे इनके प्रहारों से नहीं||

सब कुछ हार गए तो क्या, क्यूँ तुम निराश हो |
सृष्टि थी समाप्त, जब जग था पूर्ण जल मग्न ,
क्या हारे थे मनु, भूल कर पुनःसृजन का स्वप्न,
उठो, स्मरण रहे मनु पुत्र हो तुम , तुम मनुष्य हो ||

शत प्रयत्न असफल हुए; तो क्या , तुम नही असफल हो |
भागीरथ रुक जाते, तो वंचित रह जाता जग भागीरथी के अवतरण से|
बुझते दिए की लौ भी आंखिरी सांस चीख के लेती है,
छोड़ असफलता का मोह, मनुज, अनिराश तू फिर प्रयत्न कर ||
 
 
 ~~ अभिषेक गुप्ता ~~ 
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