Saturday, December 24, 2011

Nigah dhundata hoon - Ankita Jain

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निगाह ढूँढता हूँ 
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अब भी तेरी नज़र में मेरा गुनाह ढूँढता हूँ,
बेदर्द हर पहर में, मौत की पनाह ढूँढता हूँ !
तूने तो सरे आम मुझे गुनेहगार करार दिया,
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

बंजर हुई ये आँखे मेरी, छू सके वो गागर अश्क भरा,
थाम सके जो सांसे मेरी, मिल जाये मुझे वो शख्स मेरा !
कर सके मेरी ये फरियाद पूरी वो अल्लाह ढूँढता हूँ
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

बीच समंदर मुझे बुलाकर, जब छोड़ा था तूने साथ मेरा,
आया भी वापस कुछ पल को, तो थामा न तूने हाथ मेरा !
क्यूँ गैरत बनी फिर चाहत तेरी, खुद में वो गुनाह ढूँढता हूँ
जो तुझे तेरी बेफ़वायी दिखादे, वो निगाह ढूँढता हूँ !!

~~ अंकिता जैन " भण्डारी " ~~

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Mere desh ki maati sona - Anand Vishwas

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मेरे देश की माटी सोना
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मेरे देश की माटी, सोना, सोने  का  कोई  काम  ना.
जागो  भैया   भारतवासी, मेरी  है   ये    कामना.
दिन तो दिन है, रातों  को  भी, थोडा-थोडा  जागना,
माता  के आँचल पर  भैय्या ,आने  पावे  आँच  ना.

अमर  धरा  के वीर सपूतो, भारत  माँ की शान  तुम,
माता के  नयनों  के तारे. सपनों  के   अरमान  तुम.
तुम  हो वीर शिवा के वंशज, आजादी  के  गान   हो,
पौरुष  की  हो खान, अरे तुम, हनुमत से अनजान हो.

तुमको  है आशीष   राम  का, रावण पास   ना आये,
अमर  प्रेम हो  उर में इतना, भागे  भय से  वासना.

आज  देश का वैभव रोता, मरु  के नयनों मे पानी  है,
मानवता रोती है  दर - दर,उसकी  भी  यही कहानी है.
उठ कर गले लगा लो तुम, विश्वास  स्वयं ही सम्हलेगा,
तुम  बदलो  भूगोल जरा,  इतिहास स्वयं ही  बदलेगा.

आड़ी - तिरछी   मेंट लकीरें , नक्शा   साफ  बनाओ,
एक  देश  हो, एक  वेश हो, धरती  कभी न  बाँटना.

गैरों   का  कंचन  माटी है, देश  की  माटी   सोना.
माटी  मिल  जाती   माटी  में, रह  जाता  है  रोना.
माटी की खातिर  मर मिटना, माँगों  को सूनी कर देना,
आँसू  पी - पी सीखा  हमने,  बीज शान्ति के  बोना.

कौन  रहा  धरती  पर भैय्या, किस  के साथ गई  है,
दो पल  का है  रेंन  बसेरा, फिर  हम सबको  भागना.

हम  धरती के लाल, और  यह हम सबका आवास  है.
हम  सबकी हरियाली   धरती, हम  सबका  आकाश है.
क्या हिन्दू,  क्या  रूसी चीनी, क्या इंग्लिश   अफगान,
एक  खून है सबका भैय्या , एक सभी की   साँस  है.

उर  को  बना  विशाल ,प्रेम का  पावन  दीप जलाओ,
सीमाओं  को  बना  असीमित,  अन्तःकरण   सँवारना.
मेरे  देश  की  माटी,  सोना ...........


 
~~ आनंद विश्वास ~~
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Meri Zindagani - Gaurav Mani Khanal

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मेरी ज़िंदगानी
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मेरी जिंदगानी....

कुछ नगमे अधूरे से,

कुछ ख्वाब सुनहरे से,

कभी हकीक़त तो कभी सपनो की कहानी,

यही है मेरी जिंदगानी,

कुछ पल का साथ आपनो का,

लम्बी रातो मे साथ सूनेपन का ,

कभी महफ़िल तो कभी तन्हाई की कहानी,

यही है मेरी  जिंदगानी,

बहुत नाजुक धागा प्यार का,

पल भर मे बिखर जाता है महल कॉच का,

कभी प्यार तो कभी दर्द की कहानी,

यही है मेरी जिंदगानी,

एक भरा टोकरा यादो का,

खट्टी मीठी बातो का,

कभी खुशी कभी गम की कहानी,

यही है मेरी जिंदगानी,

ये पल है संसार का,

एक पल आएगा श्मशान का,

मेरे अच्छे बुरे कर्मो की निशानी,

यही है मेरी जिंदगानी...


 ~~  गौरव  मणि  खनाल  ~~
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Ek Ajnabi Raat - Sushil Kumar Singh

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 एक अजनबी रात
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तकियों से लिपटी हुयी एक अजनबी रात,
कुछ ऐसे बीती, उनकी ठंढी सी मुलाकात,


जाने कहा से वो, सूरज ढलते ही आये थे,

तलासु मै चैन, वो बेचैनी का सेज लाये थे,


पलकों से उठ कर जब नज़ारे देखती,

वही कोने में मिटी-2 सी नीद रह जाती,


आँखों के किनारों पे सपने हजार थे,

पर उनकी एक झलक ही बाकि थी,


कहे "अकेला" इस रात अकेला नहीं था,

कुछ चटपटे लम्हों से घिर सा गया था,


फिर हांथो पे अपने सर को ठहराए,

दिल के पीछे धड़कन को छिपाए,


एक टक-टकी सी लगी थी दरवाजो पे,

उनकी हल्की-2 छनकती पाजो पे,


तभी झरोखों से कट के आती ठंढी हवा,

 जैसे उनका ही अहशास हो रहा हो,


यारो सरे बाज़ार उनका नाम न पूछना,

मेरी मोहब्बत का कभी एहशान न पूछना,


कहू कहानी क्या उस अजनबी रात की,

सुनो मेरी जबानी उस मुलाकात की,


तकियों से लिपटी हुयी एक अजनबी रात,

कुछ ऐसे बीती, उनकी ठंढी सी मुलाकात

~~ सुशील कुमार सिंह ~~ 

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Friday, December 23, 2011

Tere nishan - Abhishek kumar Gupta

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तेरे निशाँ

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फिर से जिंदगी के उस मुकाम पर खड़ा हूँ |
सवाल तो कई है लेकिन जवाबो का पता नहीं |
वफ़ा तो याद, पर ना मालूम, कि क्या खता रही |
जो पता तूने दिया खुद, उस पर ही तेरा पता नहीं ||

इतनी दूर यूँ चला आया मैं, तेरे इश्क में थी ऐसी इबादत,

आँखों में  बेताबी थी और दिल में सिर्फ मोहब्बत |
तू ना थी साथ और पथ पर आई बहुत सी रुकावट ,
गम ना था उस दर्द का, केवल एक है अब शिकायत,
मजिल पर तो मैं पहुँच गया लेकिन तेरा कोई निशाँ नहीं ,
जो पता तूने दिया खुद,  उस पर ही  तेरा पता नहीं ||

नभ पर सप्तऋषि सा, तुम्हारे जीवन का संकेत तो दिखता है,

उस दिशा में देखू तो ना ध्रुव, ना  कोई अवशेष झलकता है  |
तुम आये थे तो  इस ओर, तेरे पैरो के निशान मैं जानता हूँ |
तुम रोये थे, मिटटी के मिली तेरे आंसूओ  की खुशबू मैं पहचानता हूँ  |
तेरी हर एक बात मुझे याद, तड़पा सता रही ,
जो पता तूने दिया खुद, उस पर ही  तेरा पता नहीं ||

सफ़र तो था साथ किया शुरू, प्यार ही था केवल एक कायदा |

ना जाने कब बिछड़े  तुम, पर फिल मिलने का था एक वायदा |
मेरे आने में थोड़ी देर हुई, क्या उसकी ऐसी सजा मिली |
इंतजार  तो अभी भी करेंगे, हार मानने की अभी रजा नहीं |
अनजान पंक्षियों को सुनने की कोशिश करता, शायद ये कुछ बता रही,
जो पता तूने दिया खुद,  उस पर ही  तेरा पता नहीं ||

~~ अभिषेक कुमार गुप्ता ~~
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Sunday, August 14, 2011

Samay Dhara – Gaurav Mani Khanal

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Sun       समय धारा       Clock

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समय की धारा मे बहता जा रहा हु,
कोई डर नहीं मन मे है,
निर्भीक हो के चला जा रहा हु,
किनारों की कोई खबर नहीं,
बस जैसे जैसे समय धारा चलती,
मुझको भी चलते जाना है,
मंजिल कहा मेरी किसको पता,
कल कहा लेजायेगी धारा किसको पता,
मुझे तो आज ही मौज मानना है,
बस जैसे जैसे समय धारा चलती,
मुझको भी चलते जाना है,
कभी छल छल करती बहती धारा,
कभी शांत स्थिर रहती है,
मै भी धारा के संग बदलता हु,
कभी मुस्कुराता तो कभी रोता हु,
बस जैसे जैसे समय धारा चलती,
मुझको भी चलते जाना है,
आज देश कल परदेश लेजाती है,
कभी सुख कभी दुःख दिखाती है,
सुख दुःख देश परदेश घुमते हुए,
मुझे आपनी अनदेखी मजिल पानी है,
बस जैसे जैसे समय धारा चलती,
मुझको भी चलते जाना है,
आपनी मजिल को पाना है
बस जैसे जैसे समय धारा चलती,
मुझको भी चलते जाना है...


In love  गौरव मणि खनाल  Hot smile ~

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Friday, July 22, 2011

Ab akele chalna hoga – Gaurav mani khanal

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Rainbow  अब अकेले चलना होगा Coffee cup

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अब अकेले चलना होगा
चला हु अब तक ऐ  दोस्त तेरे साहरे,
पर चलना होगा अब मुझे अकेले,
अपने कर्मो के फलो को भोगना होगा,
बन्धु मेरे अब अकेले चलना होगा,
तेरी कमी हर पल सताएगी,
हँसी पुरानी फिर चेहरे पर नही आएगी,
पर यादो को संजोना होगा,
यार मेरे अब अकेले चलना होगा,
कभी शाम तनहा रुलाएगी,
सच कहता हु तेरी याद बहुत आएगी,
पर बनाकर दोस्त आपने अकेलेपन को,
सखा मेरे अब अकेले चलना होगा,
जीवन का पथ ही ऐसा है,
हर मोड़ पर कुछ मिलता कुछ खोता है,
मिलने छुटने के फेरो से अब निकलना  होगा,
साथी मेरे अब अकेले चलना होगा,
अब आपनी पहचान बनानी होगी,
जीवन संघर्ष की लड़ाई अकेले लड़नी होगी,
जीत कर इस लड़ाई को तेरा मान रखना होगा,
दोस्त मेरे अब अकेले चलना होगा,
दुनिया की चालो को पढना होगा,
धर्मं आर्थ काम मोक्ष को साधना होगा,
मानुष जन्म को सफल बनाना होगा,
मित्र मेरे अब अकेले चलना होगा,


             गौरव मणि खनाल.

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Adhunik Sanskar - Kusum

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Sun आधुनिक संस्कार Fingers crossed

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न जाने क्यों मेरी आखें नम थी ।
न जाने किस दर्द में गुम थी ।
किसी भ्रम में या किसी स्वपन में गुम थी।
देख रही थी शायद आधुनिकता को ,
या फिर ढूढ़ रही थी पुराने संस्कारो को
न जाने किस चीज़ की उसको तलाश थी ।
आज अचानक देखे गए दृश्यों से दंग
थी ।
या हो रहे अत्याचार से तंग थी ।
कल तक जिसने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था
अपने मुह का निवाला भी तुमको खिलाया था
आज उसी के लिए अपने घर पर जगह नहीं ,
आज उसकी कोई कीमत या कदर नहीं,

क्यों छोड़ देते है अकेला उनको ,
जिन्होंने स्वपन देखने सिखाये हो तुमको ।

राहो मे चलना सिखाया हो तुमको ।।

Red rose कुसुम  

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Friday, July 1, 2011

Sapna sa lage - Ankita Jain "Bhandari"

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सपना सा लगे
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गरजते बदरा की धुन सा लगे,
तो कभी बारिश की फुहार की छुवन सा लगे !
क्यूँ वो अनजान चेहरा मुझे अपना सा लगे,
पर जब पाने को हाथ बढाऊं तो सपना सा लगे !!
 
कभी सितार की मधुर सरगम सा लगे,
तो कभी तेज़ बारिश की छनछन सा लगे !
क्यूँ उसके अहसास से तनहा राहों पर दिया सा जले,
पर जब पाने को हाथ बढाऊं तो सपना सा लगे !!

जाने कबसे वो संगसंग मेरी धड़कन के चले,
जाने कबसे वो आकर इन ख्यालों में बसे !
है इंतज़ार उस लम्हे का जब वो इन ख्वाबों से निकले,
और जब पाने को हाथ बढाऊं तो इक सच सा लगे !!

~~ अंकिता जैन "भंडारी" ~~
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Mitne wali raat nahi - Anand Vishwas

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                मिटने वाली रात नहीं ........
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दीपक की है क्या बिसात , सूरज के वश की बात नहीं,
चलते - चलते थके सूर्य , पर मिटने वाली रात नहीं.

चारों ओर निशा का शाशन,
सूरज भी निश्तेज हो गया.
कल तक जो पहरा देता था,
आज वही चुपचाप सो गया.

सूरज भी दे दे उजियारा , ऐसे अब हालत नहीं,
चलते-चलते ..............................

इन कजरारी काली रातों में,
चन्द्र-किरण भी लोप हो गई.
भोली - भाली गौर वर्ण थी,
वह रजनी भी ब्लैक हो गई.

सब सुनते हैं, सब सहते, करता कोई आघात नहीं,

चलते-चलते.............................

सूरज तो बस एक चना है,
तम का शासन बहुत घना है.
किरण - पुंज भी नजर बंद है,
आँख खोलना सख्त मना है.

किरण पुंज को मुक्त करा दे, है कोई नभ जात नहीं,
चलते-चलते ..........................

हर दिन सूरज आये जाये,
पहरा चंदा हर रात लगाये.
तम का मुंह काला करने को,
हर शाम दिवाली दिया जलाये.

तम भी नहीं किसी से कम है, खायेगा वह मात नही,

चलते-चलते .............................

ढह सकता है कहर तिमिर का,
नर तन यदि मानव बन जाये.
हो सकता है भोर सुनहरा,
मन का दीपक यदि जल जाये.

तम के मन में दिया जले, तब होने वाली रात नहीं,

चलते-चलते ............................

~~आनन्द विश्वास~~
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Pita - Gaurav Mani Khanal

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पिता
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जिनकी उंगली पकड़ सिखा चलना,

जिनके सहारे से सिखा मुसीबतों से लड़ना,

जिन्होंने कर दिया त्याग आपने अरमानो का मेरे लिए,

दिन रात बिना आराम किया काम मेरी इच्छा पूर्ति लिए,



बनकर सच्चा दोस्त सदा मेरा साथ निभाया,

बनकर गुरु दुराहे पर सही मार्ग दिखाया,

बनकर भाई दुःख सुख मे गले लगाया,

बनकर योध्या जीवन संघर्ष का पाठ पढाया,



भूल गए आपने दर्द मेरी हँसी के लिए,

रोये अकेले मे मेरी उदासी के लिए,

थके नहीं कभी मेरे संग संग चले,

कैसे हो हालात हाथ कभी नही छोड़े,



माँगा नही रब से कभी कुछ आपने लिए,

मेरी ही ख़ुशी बस एक चाहत उनकी,

त्याग समर्पण नि:स्वार्थ प्रेम,

पिता और ईश्वर मे नही कोई भेद,



नहीं हो सकता है वर्णन पिता के उपकारो का,

नहीं हो सकता है वर्णन पिता के बलिदानों का,

करू जितनी भी वंदना पिता के पावन चरणों की,

नहीं गा सकता हु महिमा भगवान स्वरूप पिता की,



बस इतनी विनती करता हु परम दयालु भगवान से,

दुःख ना आये कभी मेरे पिता के भाग्य मे,

बना देना लायक इतना है परमेश्वर,

की दे सकु सारी खुशिया और सुख आपने पिता भगवान को..



~~ गौरव मणि खनाल ~~
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