Thursday, February 24, 2011

yeh kaisi teri maya|GAURAV MANI KHANAL

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ये कैसी तेरी माया है - गौरव मणि खनाल
Ye Kaisi Teri Maaya Hai 
                     - Gaurav Mani Khanal
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                     ये कैसी तेरी माया है!!!

 
                 कहते है मुनि योगी साधू,
                 तू तो कण कण मे समाया है,
                 तुने ही आपनी माया से संसार को बनाया है,
                 फिर भी धरती की वेदना से तू अनजान है,
                 ये कैसी तेरी माया है,

                 कहते है धर्म ग्रथ सभी,
                 तू तो करुणा की खान है,
                 तू ही प्रेम मूर्ति और दया वन है,
                 फिर क्यों तेरा संसार बन रहा शमसान है,
                 क्यों है ये भेद भावों और
                 क्यों कोई दुखी और बीमार है,
                 ये कैसी तेरी माया है,

                 क्या नही देख सकता तू,
                 तेरी ही संतानों ने धरती का क्या हाल कर दिया है,
                 गंगा की धारा को मैला और हिमालय को नंगा कर दिया है,
                 कभी हरी भरी दिखती थी जो धरती,
                 उसको आपनो के ही खून से लाल कर दिया है,
                 तू जान कर भी सब अनजान बना है,
                 ये कैसी तेरी माया है,

                 कृष्ण को सबने मार दिया कंस को अमृत पिलाया है,
                 राम को सबने त्याग दिया रावन को आपना बनाया है,
                 हरी नाम की माला को फेक दिया बन्दुक को उठाया है,
                 धर्मं का साथ कोई नही चाहता केवल अधर्म ही एक सहारा है,
                 तेरे बनाये इस संसार मे तुझे कब कोई नही पूछता पैसे का खेल सारा है,
                 सच्चे का मुह कला और जूठे का बोल बाला है,
                 ये कैसी तेरी माया है,

                 अब प्रभु धरती को तेरा ही सहारा है,
                 धर्मं और मानवता को भी तेरा ही आसरा है,
                 योगी, मुनि, साधु, सत् पुरुष, पेड़, पक्षी सरे अब तेरी ही राह निहारते है,
                 तू आएगा आपनी असली माया देख्लायेगा इस उम्मीद मे रोज़ तुझे पुकारते है,
                 मत बन इतना कठोर, सुन ले पुकार हमारी,
                 आजा एक बार फिर इस धरती पर और दिखा दे
                 कैसी है माया तुम्हारी ll


                     _ गौरव कुमार खनाल


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Wednesday, February 23, 2011

श्रृष्टि का सार-अंशु जोहरी|Shrishti Ka Saar-Anshu Johari

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श्रृष्टि का सार - अंशु जोहरी
Shrishti Ka Saar - Anshu Johari
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  रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार।।

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की मान्यतायें
मेरे अस्प्ष्ट भावों का विकार॥

तभी तो तब से अब तक
यद्यपि बहुत बार .....
एकत्रित किया रेखाओं को,
रचने भी चाहे सीमाओं से
मन के विस्तार ..... ॥

 
फिर भी कल्पना को आकृति ना मिली
ना कोई पर्याय, ना कोई नाम
बिछी है अब तक मेरे और कैनवस के बीच
एक अनवरत प्रतीक्षा ....
जो ढंढ रही है अपनी बोयी रिक्तताओं में
अपनी ही सृष्टि का सार ॥

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अगले खम्भे तक का सफ़र - अनूप भार्गव Agle Khambe Tak Ka Safar - Anoop Bhargav ( Submitted by Uttam Pandey)

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याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।

आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !
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साखी  - कबीरदास Saakhi - Kabeer

( submitted by uttam Pandey  )
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कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय ।
रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास ।
जो है जाको भावता, सो ताही के पास ॥

प्रीतम के पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस ।
तन में मन में नैन में, ताको कहा सँदेस ॥

नैनन की करि कोठरी, पुतली पलँग बिछाय ।
पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय ॥

भक्ति भाव भादों नदी, सबै चलीं घहराय ।
सरिता सोइ सराहिये, जो जेठ मास ठहराय ॥

लागी लागी क्या करै, लागी बुरी बलाय ।
लागी सोई जानिये, जो वार पार ह्वै जाय ॥

जाको राखे साइयाँ, मारि न सक्कै कोय ।
बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय ॥

नैनों अंतर आव तूँ, नैन झाँपि तोहिं लेवँ ।
ना मैं देखी और को, ना तोहि देखन देवँ ॥

सब आए उस एक में, डार पात फल फूल ।
अब कहो पाछे क्या रहा, गहि पकड़ा जब मूल ।।

लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल ।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़ै बन माहिं ।
ऐसे घट में पीव है, दुनिया जानै नाहिं ॥

सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय ।
जैसे बाती दीप की, कटि उजियारा होय ॥

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥

बिरहिनि ओदी लाकड़ी, सपचे और धुँधुआय ।
छुटि पड़ौं या बिरह से, जो सिगरी जरि जाय ॥

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं ॥

इस तन का दीवा करौं, बाती मेलूँ जीव ।
लोही सींचीं तेल ज्यूँ, कब मुख देखीं पीव ॥

हेरत-हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ ।
बूँद समानी समँद में, सो कत हेरी जाइ ॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरज से सब होय ।
माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ॥

दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।
बिना जीव की स्वाँस से, लोह भसम ह्वै जाय ॥

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय ।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥

जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल ।
तोकि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल ॥

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥

माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदै मोहिं ।
इक दिन ऐसा होइगा, मैं रौंदोंगी तोहिं ॥

माली आवत देखिकै, कलियाँ करीं पुकार ।
फूली-फूली चुनि लईं, कालि हमारी बार ॥

 - कबीरदास
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BALKAND ( RAM CHARIIT MANAS)                       - GOSWAMI TULSIDAS बालकाण्ड ( राम चरितमानस -अंश ) - गोस्वामी तुलसीदास

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कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥

सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥ २३० ॥

तात जनकतया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥
पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई॥
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मन कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ प्ररनारि न हेरी॥
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥
मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥

करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥ २३१ ॥

चितवति चकित चहुँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहुँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥
लोचन मग रामही उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥

लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ॥ २३२ ॥

सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥

केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥ २३३ ॥

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहु। भूपकिसोर देखि किन लेहु॥
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंह निहारे॥
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥
गूढ़ गिरा सुनि सुय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥ २३४ ॥

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही॥
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥

पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥ २३५ ॥

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥
देबि पुजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥ २३६ ॥
- गोस्वामी तुलसीदास
 
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Tuesday, February 22, 2011

रश्मिरथी - रामधारी सिंह "दिनकर"  RashmiRathi - Ramdhari Singh "Dinkar"                          (Submitted by Shrawan Kumar Dwivedi)

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          वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
          सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
          सौभाग्य न सब दिन सोता है,
          देखें, आगे क्या होता है।
        
          मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
          दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
          भगवान् हस्तिनापुर आये,
          पांडव का संदेशा लाये।

          'दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
           तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।
           हम वहीं खुशी से खायेंगे,
           परिजन पर असि न उठायेंगे!

           दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका,
           उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला।
           जन नाश मनुज पर छाता है,
           पहले विवेक मर जाता है।

           हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
           डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-
          'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
          हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

          यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
          मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
          अमरत्व फूलता है मुझमें,
          संहार झूलता है मुझमें।

          'उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
           भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
           दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
           सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

          'दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
           चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
           शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
           शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

          'शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
           शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
           जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
           हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

           'भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख,
           यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण,
           मृतकों से पटी हुई भू है,
           पहचान, इसमें कहाँ तू है।

           'अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख,
            मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख।
            सब जन्म मुझी से पाते हैं,
            फिर लौट मुझी में आते हैं।

           'जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन, साँसों में पाता जन्म पवन,
            पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर!
            मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
            छा जाता चारों ओर मरण।

           'बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
            यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
            सूने को साध न सकता है,
            वह मुझे बाँध कब सकता है?

           'हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
            तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
            याचना नहीं, अब रण होगा,
            जीवन-जय या कि मरण होगा।

           'टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
            फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
            दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
            फिर कभी नहीं जैसा होगा।

            'भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
             वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
             आखिर तू भूशायी होगा,
             हिंसा का पर, दायी होगा।'

             थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
             केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
             कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
             दोनों पुकारते थे 'जय-जय'! 

   ~~ रामधारी सिंह "दिनकर" ~~

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Ek purani tasvir - Gaurav Mani Khanal एक पुरानी तस्वीर - गौरव मणि खनाल

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 आज एक पुरानी तस्वीर देखी,
तस्वीर मे एक हँसी देखी,
फिर थोडा ध्यान दिया तो, पाया
हँसी के पीछे का चेहरा, कुछ जाना पहचाना,
माँ को दिखया और पूछा ये कौन है?
माँ मुस्कुराई बोली, ये तू ही है प्यारे,
मै बोला, माँ अब वो हँसी कहा गयी
माँ फिर मुस्कुराई और बोली,
अब मै समझदार हो गया हु,
जीवन की दौड़ मै, कही खो गया हु,
वो बचपन की हँसी तो वही है,
बस उसको मुख पर चमकाने की कला भूल गया हु!!!!

-- गौरव मणि खनाल
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हरी हरी दूब पर - अटल बिहारी वाजपई Hari hari doob par - Atal Bihari Vajpayee

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                         हरी हरी दूब पर ओस की बूंदे
                         अभी थी,अभी नहीं हैं|
                         ऐसी खुशियाँ जो हमेशा हमारा साथ दें
                         कभी नहीं थी, कहीं नहीं हैं|
                         कायर की कोख से,फूटा बाल सूर्य,
                        जब पूरब की गोद में,पाँव फैलाने लगा,
                        तो मेरी बगीचे का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
                        मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
                        या उसके ताप से भाप बनी, ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

                        सूर्य एक सत्य है , जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
                        मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
                        यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
                        क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
                        कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

                        सूर्य तो फिर भी उगेगा, धूप तो फिर भी खिलेगी,
                        लेकिन मेरी बगीचे की हरी-हरी दूब पर,
                        ओस की बूंद, हर मौसम में नहीं मिलेगी|

                         ~~ अटल बिहारी वाजपेयी ~~
 
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प्रतिध्वनि - विकास चन्द्र पाण्डेय Pratidhwani - Vikas Chandra Pandey

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           आज अचानक मेरी परछाई से मुलाकात हुई ..
           धुंधली रौशनी में कुछ अनोखी सी बात हुई ..
           उसके साथ को पाकर एक अजीब सी अनुभूति हुई ..
           यादों के खोये हुए पन्नो से फिर मुलाकात हुई ..

                          तभी कुछ अप्रत्याशित से बात हुई ..
                          उस परछाई ने मुझे आवाज़ दी ..
                          प्रश्नों की अविरल धारा से ये मेरी पहली मुलाकात थी ..
                          ये और कुछ नहीं शयेद मेरे अंतर्मन की आवाज़ थी ..

           रात के अँधेरे में वो अजीब सी राह थी ..
           वो मेरी मेरे सच से पहली मुलाकात थी ..
           फिर भी मन में एक अजीब से हलचल है ..
           क्या ये सब सच है ..
           या बस आँखों का भ्रम है ...
                       पर उसकी आवाज़ में कुछ तो बात थी ..
                       क्या ये सभी मेरे अतीत की बात थी ?? ..
                       उन प्रश्नों ने मुझे एक नयी राह दी ..
                       मेरे भटके हुए वर्तमान को एक नयी पहचान दी ..
 
            ये मेरी परछाई से पहली मुलाकात थी ..
            नहीं ये मेरी खुद से पहली मुलाकात थी ..  

                               ~ विकास चन्द्र पाण्डेय ~
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Monday, February 21, 2011

मिली सच्चाई - अंकिता जैन Mili Sacchai - Ankita Jain


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इक दिन अनजाने में मिली सच्चाई ,
थोड़ी सहमी, थोड़ी घबरायी ,
धीरे से मुझे पास बुलाकर ,
कहने लगी अब शामत आई ,
आँखों में आंसू भरकर ,
अपनी कहानी मुझे सुनाई ,
कहने लगी सपने में मैंने ,
खतरे सी की इक आहट पाई ,
अपने दिल से मुझे हटाकर ,
झूठ की चादर सबने चढ़ाई,
इक दिन अनजाने में मिली सच्चाई ,
थोड़ी सहमी, थोड़ी घबरायी …..
 





बदल गयी रिश्तों की भाषा ,
प्यार ने ली इक नयी परिभाषा ,

सादगी से दूर कहीं अब ,
प्रदर्शन पर तीर है साधा ,
  कॉलेज में जब पड़ने जाएँ ,
टीचर, लेकचर सभी भुलाएँ ,

हर दिन इक नयी कहानी बनाये ,

झूठ के हर रिश्ते अपनाएं ,
वफ़ा हटाकर हर व्यक्ति ने ,
बेवफाई दिल में है बसाई
इक दिन अनजाने में मिली सच्चाई ,
थोड़ी सहमी, थोड़ी घबरायी ….
                      
                               अंकिता जैन

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मेरे मन की बात - गौरव मणि खनाल Mere Man Ki Baat - Gaurav mani Khanal

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कभी कोई मेरे दर्द को भी समझे,
दिल के पिंजरे में बंद मेरे अरमानो को समझे,
उड़ना चाहता हूँ मै भी खुले आकाश मै,
कोई मेरे मन के भावों को समझे |

थक चूका हु मै दुनिया के साथ चल कर,
कोई मेरा हाथ पकड़ मुझे नयी रहा दिखा दो,
बिक गए है मेरे अरमान दुनिया के बाज़ार मे,
कोई मेरे अरमानो को फिर से जगा दो |

नए सपनों को देखने से  डरता है अब मन मेरा,
नए रास्तो मे चलने से थकता है अब तन मेरा,
प्रेम गीत गाने से मौन है अब दिल मेरा,
सोचता हु इस खुदगर्ज़ दुनिया मे कौन है अब अपना मेरा,


खो गया हु कही मै झूठ और बेईमानी के फेरे मै,
हर चेहरा हंस रहा है जूठी हँसी इस मेले मे,
मे भी उन जूठे चेहरों मे शामिल एक चेहरा हूँ ,
मुख से दीखता भोला पर अन्दर मन से मैला हूँ ,

अब ऊब कर इस जूठे भोले पन से,
आपने मन मे फेले इस मल से,
चाहता हु अब निर्मल करना इस धूमिल मन को,
पवित्र करना चाहता हु इस जीवन धन को,
बहुत जी लिया दुनिया के विचारो के साथ,
बहुत रुक लिया पाने आपनो का हाथ,

अब सव्छंद और स्वतंत्र करना,
              चाहता हु इस तन मन को,
जीना चाहता हूँ अब ऐसे,
             दे सकू प्रेरणा आने वाले कल को ..

                                      
            ~ गौरव मणि खनाल ~

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