Sunday, January 16, 2011

Mere Shyam - Ankesh मेरे श्याम  - अंकेश 

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कुछ पनघट से लाकर छोड़ा

कुछ अंखियो से पाकर जोड़ा

देख श्याम की राह में व्याकुल

गोपी का जल हुआ न थोडा

डूब गया दिन हुई है रतिया

लौट चली अब सारी सखिया

बोलो मेरे श्याम सलोने

ओर करू में कितनी बतिया

कही बावरी रात का घूघट

मुझको अपने अंक न ले ले

नटखट हुई चांदनी देखो

अपने सारे भेद न खोले



इन बिखरी आँखो का काजल

अर्धविप्त नयनो से बोले

बनी श्याम की राह में व्याकुल

इन नैनो से श्याम न खो दे

चली बावरी पवन भी देखो

मंद सौम्य सी ध्वनि सुनाती 

कही श्याम की बंसी पाकर

मुझ पर तो न रोब जमाती

उठी दिवा सी स्वेत किरण जो

इंदु छवि है मेरे उर की

आलंगन अधिकार अधूरा

आकर्षित अमृत अनुभेरी 





नयन ताकते तेरी सीमा 

निशा चली अब अपने डेरे

देख रवि कि किरण क्षितिज पर

भंवरो ने भी पंख है खोले 

बनी विरह कि बेधक ज्वाला

उषा का आह्वान कराती

अंधियारे से ढके विश्व को

अपनी लाली से नहलाती

कही श्याम कि चंचल लीला

निशा नीर सी आई हो 

सम्मुख होकर भी गोपी से 

वह तस्वीर छिपाई हो

उठी सुप्त सी कोई छाया

चली कही वो अपने डेरे

छिपी लालिमा अधर में जाके

यमुनाजल रवि किरणो से खेले

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Taruvar - Ankesh Jain तरुवर - अंकेश जैन

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एक पेड़ का पत्ता
टूटा डाली से जा बिखरा
माँ के आँचल में जा निखरा
ले चली पवन यह किस ओर
कैसा है यह शोर


सपनो का वो बादल

प्यारा सा था वो तरुवर
सूरज की किरणो ने बेधा
मेरे अन्तर्मन का शोर 
ले चली पवन यह किस ओर

उठती है सपनो की लहरें
गिरते है संशय के परदे
तूफा की धारा में बहकर
तय करने है मीलो के पहरे
ले चली पवन यह किस ओर

अंधियारे की बस्ती
मिटती नहीं मिटाये हस्ती
जीवन के अनमोल क्षणॊ को देकर
पाए है शब्दो के मोल
ले चली पवन यह किस ओर...



                                   _ अंकेश जैन


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Smriti - Ankesh Jain स्मृति - अंकेश जैन

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अधूरी सी रही जो ख्वाइश कभी 
वो आज जीने की ख्वाइश हुई
छिपे रंग बीते समय के तले
तस्वीरो को रंगी बनाने की ख्वाइश हुई

ढूँढो बीता समय वो गुजरा सा कल
कहा बिखरे वो चंचल से पल
वो तेरी हसी अधूरी पज़ल
में भूला बेरंग मौसम की ग़ज़ल

तराशे से मोती वो साथी पुराने
नुक्कड़ की मस्ती कई अफसाने
अधूरी सी ख्वाइश अधूरी सी हस्ती
हकीकत की दुनिया में सपनो की बस्ती

चले संग बहते समय के तराने
किस मोड़ मिलते यहाँ कौन जाने
ख्वाइश ही संजोये चले जा रहे है

अधूरे से सपने पले जा रहे है


___ अंकेश जैन                                 
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Friday, December 17, 2010

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में - राम भजन

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        मन लाग्यो मेरो यार
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..

जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..

भला बुरा सब का सुन लीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..

आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..

प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..

कहत कबीर सुनो भयी साधो
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ..


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ठुमक चलत रामचंद्र जी - Thumak Cahalat Ramchandra ji


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ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ..

किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ..

अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ..

विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर .
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ..

तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां ..
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श्री राम के भजन - Shree Ram Ke Bhajan

_______श्री रामचन्द्र कृपालु_______


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् .
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुखकर कञ्जपद कञ्जारुणम् .. १..

कंदर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम् .
पटपीत मानहुं तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरम् .. २..

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंशनिकन्दनम् .
रघुनन्द आनंदकंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनम् .. ३..

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषणम् .
आजानुभुज सर चापधर सङ्ग्राम जित खरदूषणम् .. ४..

इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मनरञ्जनम् .
मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादिखलदलमञ्जनम् .. ५..
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Wednesday, December 15, 2010

यादें - नितिन Yaadein _ Nitin

यादें
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चला जऊँगा इस जहाँ से,
आंसूं छोड़ जऊँगा|
सराहा जिन चंद दिलों ने ,
बेदर्द मैं उन्हें तोड़ जऊँगा |

तड़पा था साडी ज़िन्दगी
तड़प अब भी बाकी थी |
ख्वाहिशें जोह रहीं अदूरी हमेशा,
ख्वाहिशें वोह अब भी बाकी थी|.

मोहब्बत और हिम्मत मिली बहुत,
उनके भीड़ में ही अक्सर घिरा रहा,
पर मजबूर , बेबस, बदनसीब था मैं ,
तन्हा ही ता-उम्र मैं जीता रहा |

थक - हार गया जो हालातों से,
मौत को तो खुद ही मैं अपना रहा ,
चाहत वर्ना जीने की तो,
सदा ही बाकी थी.

 
नाकामी  हो गयी मुझ पर हावी  jo
सांसे लेना भी जैसे हो गया भारी  हो.
खुश सबको देखना चाहता था
पर गम ही सबको दिए जाता रहा..



 अपनों से शुरू होती थी ज़िन्दगी मेरी,
और ख़त्म भी होती थी जिन पर.
ऐसे सच्चे ,शरीफ  इंसानों को,
जल्लाद मैं अधर  में छोड जऊँगा


सफ़र ज़िन्दगी का अब
जो अब मैं ख़त्म  कर रहा हूँ
न जाने किन किन दिलों में
मैं यादें छोड जऊँगा |

ख्वाब ख़ुशी के लाया था
यादें हादसों की ले जऊँगा
वफायें  निभाई  संग जिनके 
जफ़ाएं उनकी संग ले जऊँगा



चला जऊँगा  इस जहाँ से ,
आंसूं छोड जऊँगा
सराहा जिन चंद दिलों
बेदर्द मैं उन्हें तोड़ जऊँगा 

__ नितिन कुमार  

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Saturday, September 11, 2010

दोहे ~ बिहारी Dohe ~ Bihari

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मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तनु की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय॥

अधर धरत हरि के परत, ओंठ, दीठ, पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष दुति होति॥

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥

पत्रा ही तिथी पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौ ही रहे, आनन-ओप उजास॥

कहति नटति रीझति मिलति खिलति लजि जात।
भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात॥

नाहिंन ये पावक प्रबल, लूऐं चलति चहुँ पास।
मानों बिरह बसंत के, ग्रीषम लेत उसांस॥

इन दुखिया अँखियान कौं, सुख सिरजोई नाहिं ।
देखत बनै न देखते, बिन देखे अकुलाहिं॥

सोनजुही सी जगमगी, अँग-अँग जोवनु जोति।
सुरँग कुसुंभी चूनरी, दुरँगु देहदुति होति॥

बामा भामा कामिनी, कहि बोले प्रानेस।
प्यारी कहत लजात नहीं, पावस चलत बिदेस॥

गोरे मुख पै तिल बन्यो, ताहि करौं परनाम।
मानो चंद बिछाइकै, पौढ़े सालीग्राम॥

मैं समुझ्यो निराधार, यह जग काचो काँच सो।
एकै रूप अपार, प्रतिबिम्बित लखिए तहाँ॥
- बिहारी 
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जो बीत गयी सो बात गयी ~ हरिवंषा राइ बच्चन Jo beet gayi so baat gayi ~ Harivansha Rai Bacchan

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नर हो न निराश करो मन को - मैथली शरण गुप्त Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko - Maithli Sharan Gupt

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नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो

जग में रह कर निज नाम करो
यह जन्म हुआ अर्थ हुआ अहो
समझो जिसमे यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को

संभालो की सुयोग न जाये चला
कब व्यर्थ हाउ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना 
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हे सब तत्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्व कहाँ
तुम स्वत्व सुधा अस्पान करो
उठ कर अमरत्व वधान करो
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी है कुछ ध्यान रहे
सब जाए अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित ज्ञान रहे
कुछ हो न तीजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को
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Ek Baras Beet Gaya - Atal Bihari Vajpayee एक बरस बीत गया - अटल बिहारी वाजपेयी

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झुलसाता जेठ मॉस
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया


सीकंचो में सिमटा जग
किन्तु विकल प्राण विहाग
धरती से अम्बर तक
गूँज मुक्ति गीत्गाया
एक बरस बीत गया




पथ निहारते नयन
गिनते दिन पलछिन 
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
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