Wednesday, December 31, 2014




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Wednesday, June 11, 2014

Gairat - Dr. Pawan Kr. Bharti

गैरत 
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डा. पवन कुमार भारती

Aag jalana avi baaki hai - Dr. Pawan Kr Bharti

आग लगाना अभी बाकी है _____________________________

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डा. पवन कुमार भारती

Mahfuz - Pallav

महफूज
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माँ !
मैं बहुत खुश हूँ
यहाँ तुम्हारे अंदर...
सुखी,सुरक्षित,निर्भीक
और स्वतन्त्र भी.
ले सकती हूँ
अपनी मर्जी की साँसें
यहाँ मेरे लिए
कोई बंदिश भी नहीं है
फैला सकती हूँ पंखें
उड़ सकती हूँ निर्बाध.
दूर-दूर तक नहीं है यहाँ
घृणित मानसिकता की
घूरती आँखें
आदमजात की खालों में
पशुओं की घातें.
महफूज हूँ उन खतरों से भी
जिससे तुम्हें हर रोज वाकिफ
होना पड़ता है
मेरी दुनियाँ छोटी ही सही पर
तुम्हारी दुनिया जितनी
स्याह और विषैली नहीं है...
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पल्लव 

Matdan - Mamta Sharma

"मतदान "
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अपनी ढपली , अपना राग ,
बेसुरी धुन व बेसुरी तान, 
फिर से वही गवैये आये,
फिर  मतदान के दिन हैं आये। 

जगह -जगह बरसाती मेंढक ,
निकल आये मेढ़ों पर चढ़ कर ,
जाने कैसे गीत ये गायें ,
फिर मतदान के दिन हैं आये। 

वही  पुरानी चित - परिचित धुन,
अपनी मैं -मैं ,दूजों की  चुप,
लीपा -पोती सीख के आयें ,
फिर मतदान। ……। 

लिए आये फिर धूर्त चरित्र ,
माला फूलों के वही चित्र ,
हार में खुद को हार  ना जाएँ  ,
फिर मतदान के। ……। 

जगह जगह फिर उत्स खड़ा है ,
मतदाता वीभत्स खड़ा है ,
अक्ल पे धुंध व् बादल छाये ,
फिर मतदान। … 

कुत्ते -बिल्ली , शेर -बिलाव ,
लड़ें ज्जोर व् फेंकें दाव ,
शर्म को ताक पे ही धर आये ,
फिर मतदान। … 

रंक महीपति सभी खड़े हैं , 
क्षेत्र छोड़ कहीं दूर लड़े है ,
सामने से वो भिड़ने जाएँ।,
फिर मतदान  ..........   

कोई लल्ला , कोई अल्ला वाले ,
बड़े ठगों के हैं कोई साले ,
सबका माल पेट में जाए ,
फिर मतदान। .... 

हरदम हल्ले , हरदम रैली ,
दुनिया भीतर -बाहर मैली ,
आम - ख़ास कुछ समझ ना पाये ,
फिर मतदान के दिन हैं आये। 

जरा अगर देश कि होती ,
फिर यूं त्राहि -त्राहि न होती ,
बच्चे भूखे ही सो जाएँ ,
फिर मतदान। .... 

जन -जन पे रोटी जो होती , 
शिक्षा की सोटी जो होती ,
ओ प्रभु दिन ये क्यूँ दिखलाये ,
फिर मतदान के दिन हैं आये। 

देश की  बेटी लाज जो होती , 
युवकों में कुछ लाज जो होतीं ,
देश को दिन फिर ही लग जाएँ,
फिर मतदान 

चुनो जरूर सब देख - परख के ,
मत देना सब आँख में रख के ,
फिर से देश शिखर पे जाए 
फिर मतदान। .... 

लाईन लगेगी , छुट्टी होगी ,
घर में खीर , बाहर भी होगी,
सभी चलो मिल बाँट के खाएं ,
फॉर मतदान। … 

आह !ये कैसा शुभ दिन आया ,
सारी खुशियां  संग ही लाया,
वोटर जब से हैं बन पाये ,
फिर मतदान। … 

पंडित ,मोची ,धोबी , नाई ,
मास्टर , क्लर्क ,बढ़ई , हलवाई , 
सभी एक संग हैं लो आये ,
फिर मतदान। .......   

नंदी -भाभी ,सास बिदक गईं ,
मित्र -पड़ोसन भी लो भिड़ गईं ,
काहे को जी राड़ बढ़ाएं ,
फिर मतदान के। … 

मन्नत तीरथ व्रत हैं बोले , 
बाला जी, पुष्कर ,या भोले ,
तीरथ भजन कुछ काम न आये ,
फिर मतदान। ………  

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ममता शर्मा 

Jise tum samajhte ho abhishaap - Mamta Sharma

जिसे तुम समझे हो अभिशाप 
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जिसे तुम समझे हो अभिशाप 
मृत्यु ही जीवन का संदेस। 
अगर दुःख न होगा तो सुनो !
सुखों कि आग जलेगा गेह। 

 जहाँ पर भरी निराशा सुनो !
चलेगी आशा की गाड़ी ,
अगर है सुख ही सुख गर जो ,
बिछड़ जाएँगी वे सारी।

बनाया सुख -दुःख का संसार 
बड़ा ही उच्च खिलाडी  है ,
सुबह को  धूप खिलाई जो,
रात्रि में चन्द्र की  बारी है .

 रचाया पूरा हमने स्वांग ,
पता न कब जाना हो दूर ,
कहीं जो रहें तकें हर पल, 
सांसों की अर्जी  ना मंज़ूर।

मृत्यु जीवन के बीच फंसे।,
लगे जादू - टोना सी सांस,
लगे सब कुछ अपना सा आज ,
बनेगा वह जीवन की  फांस। 

बने हम फूल पंछी पत्थर ,
बने हम ही हैं जीव हज़ार     
चली चाकी  पृथ्वी की  है ,
पिसे हैं अन्न बने कई बार। 

धरे नव रूप ,पात नव गात ,
नये  से लिए वर्ण कई बार 
चलाया उस ने यह व्यापार,
इसे न समझो तुम अभिशाप ,
यही तो जीवन है अभिराम 
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ममता  शर्मा 

Prayatn - Sumit Jain

प्रयत्न
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मनुष्य का जीवन सफलता
और असफलता के बिच घिरा हुआ है
मानो इस का कारण प्रयत्न ही तो है
किसी को थोडा तो किसी को ज्यादा
और किसी को कुछ भी नहीं
प्रत्येक प्रयत्न सफल होता है
आज नहीं तो कल होता है

व्यक्ति हर पल प्रयत्न करता है
कभी वह अपने आप से
कभी नींद से जाग ने के लिए
कभी तो जाग कर सोने के लिए
कभी वह जित ने के लिए
कभी वह हार ने के लिए
कभी दुनिया से लढने के लिए
फिरभी वह प्रयत्न करता ही जाता

क्यों मनुष्य जल्दी से विचलित हो जाता है
और अपने को गम के आसु से भिगो देता है
क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकता असफलता को
या क्यों खुश हो जाता है सफलता से
और क्यों भाग खड़ा होता है प्रयत्न करने से

पानी की बूंद- बूंद से घड़ा भरता है
वैसे ही थोड़ा थोड़ा प्रयत्न करने से
एक दिन सफलता मिल ही जाती है
प्रयत्न का मतलब ही तो स्वयं को खोजना
और जीवन को सही राह बताना है
सफलता की कुंजी ही है एक मात्र प्रयत्न

हमें जोड़ना होगा स्वयं को व्यक्ति से,
और व्यक्ति को धर्म से
मुक्ति के मार्ग पर चल ने के लिए
हमें प्रयत्न करना है - और करते रहना है!!
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सुमित जैन

Mujhe Sangharshrat rehne do - Sanjay Kirar

मुझे संघर्षरत रहने दो
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मुझे संघर्षरत रहने दो
अभी हवाओ की डोर थामी है
मौसमों से कहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...

तलवों ने अभी रेत चूमी
जिज्ञासा अभी इर्द हिर्द घूमी है
अंगड़ाई लेकर रूह जागी अभी
इसे प्रातः की पहली किरण छूने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...

इतनी प्यास की समुन्दर सूख जाए
इतिहास आज खुद से ऊब जाए
जीवन मरण की सेज बिछाकर
कुछ कर्त्तव्य अर्पित करने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...

माना घनी रात है उजाला नहीं
प्रेरणा दीप से कब डरा धुधलका नहीं
एक दीप ही सही आंधियो में
प्रेरणा के नाम प्रज्वलित रहने दो
मुझे संघर्षरत रहने दो ...
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संजय किरार

Saturday, April 19, 2014

Chitran - Adarsh Tiwary

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चित्रण 
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चौकोर सफ़ेद पन्ने सा जीवन चरित्र था मेरा
कोई दाग नहीं, कुछ भी नहीं, अंत किनारा गहरा
जब बरस पड़े कुछ रंग, लाल हरे नीले से सारे
चित्र बना वो ऐसा , सुनहरे चमक मे इंद्रधनुष उखर पड़ा हो जैसे

कागज के कश्ती बन, दरिया मे मैं बह चला
कश्ती और पानी का, शुरू हुआ यूं सिलसिला
थपेड़ो को झेलता, तूफानों से खेलता
आगे बढ़ चला मैं काफिर सा फुहारो संग संभालता

तूफानो के आगाज से कायर सदैव घबराते हैं,
रंग भरी इस दुनिया मे, कोरे ही रह जाते हैं
जो सैलाब न आते तो ठहराव का जिक्र न होता
जो फुहारे समझ इन्हे पार न करते, उन्हे वीर कहा ना जाता

रास्ते आसान सभी को भाते है,
कुछ अपने रास्ते खुद लिख जाते है
जोखिम उठाना हर एक के बस का नहीं,
 चुने कल को गढ़ने के अपने माने होते हैं


रास्ता नया हर वक़्त सहारे को पुकारा करती है
हर शाम ढलने पर निशा सूरज को आवाज़ देती हैं
आत्म परिभाषित ये जीवन का मेरा यह एक अंश हैं
प्रीत संकल्प का चित्रण है, यह मेरे स्वेत लेखन मे।।

- आदर्श तिवारी
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Friday, October 25, 2013

Prasang - Adarsh Tiwary

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    प्रसंग
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लफ़्ज़ों में इज़हार करना चाह रहा था जिन बातों को,
उस जज़्बात के मायने मेरे लिए बड़े ख़ास थे,
इशारे काफी थे समझाने को,
पर सुनने वो लफ्ज़ तुम वही मेरे साथ थे।

धीमी धीमी बूंदों की बारिश,
बरश रही थी नन्ही बूंदे
कर रही थी श्रृंगार तेरा,
मृगनैनी पलकों के तेरे ।

चिन्हित करे सौंदर्य को ,ऐसी सकशियत तेरी,
मुख दर्शाती स्वप्नसुंदरी, रंग तेरा सुनेहरा
कमल पंखुड़ी से पवित्र तू, मन चुलबुल अति चंचल ,
हर बात में तेरी सोच सही, सलाह भाव अति गहरा ।


कैसे करू मैं पहल, बुनू शब्दों के जाल संग तेरे,
जानता हु तेरे दिल का राज़ पर  कैसे निकालू तुमसे वो बात
तेरे भी नज़रिए में अपने को तौलना बड़ा ज़रूरी था,
तुमने जो संकेत दिए, वो भाव नित नृत्य मयूरी था ।

स्वाभाविक विचार सामान, सम्मान था मेरे प्यार को
अत्यंत मतभेद के पार , मुझे मेरा नया संसार स्वीकार था ।।

 - आदर्श तिवारी
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Andhakaar aur main - Sanjay Kirar

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 अन्धकार और मैं
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मैं जब से अंधेरों में चलने लगा हूँ

उजालो से डरने लगा हूँ

जब अँधेरे ने मुझे पहली दफा छुआ

मैं डरा, सहमा

अरे ये ! क्या हुआ

मेरी आँखे चुप थी जुबा बेजुबा बन गई

रास्ते गुम थे,

मंजिल पर पहुंचना सज़ा बन गई

सन्नाटा एक दम सन्नाटा ...........

अचानक एक पल ने मुझे,

अपना मतलब सिखा  दिया

जब मुझे रूबरू अपने दिल से करा दिया

रास्ते बीहड़ो से अपने आप खुल गए

उस दिन जाना,

मेरे कुछ बिछड़े पल मुझसे कैसे जुड़ गए

और सपनो की बागडोर उन अंधेरो के हवाले कर गए।

              -संजय किरार
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Patjhad - Kusum

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 पतझड़
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जब तुम हम से मिले तो ऐसा लगा
मानो जीवन में बाहार आ गई
जैसे कलि खिल कर फूल बन गई
चारो ओर खुशियों की हरियाली थी
आकाश में छाई लाली थी

हम मदहोश थे तेरी आहोश में
न खबर थी दिन और रात की
चारो ओर प्यार ही प्यार का डेरा था

तुम क्या गए कि मानो जिंदगी वीरान हो गई
बहारो कि जगह ली पतझड़ ने
कलि फूल बन कर बिखर गई
चारो और छाया दुखो का कोहरा

कभी सोचते है कि तुम हमारे जीवन में न आते
न ही बाहार आती न ही पतझड़ लाती
फिर भी पतझड़ में सावन का दीदार करते है
हर घड़ी सिर्फ तेरा इंतज़ार करते है

_________कुसुम________

Pukaar - Kusum

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पुकार 
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सुनों देश के लाल ये माँ तुम्हे पुकारती,
जुल्मो से दबी हुई ऐ दर्द से कराहती,
कब तक सोओगे अब तो तोड़ दो इस निद्रा को,
जागो और देखो कैसे रौंद रहे है इस माँ के सीने को,
किसी ने छोड़ा धर्म, तो किसी ने संस्कार को,
कोई तोड़े देश को तो कोई माँ के प्यार को,
कोई माँ की आबरू को पैसों में है तोलता,
कोई सिंदूर पोछता तो कोई आंचल को नोचता,
कोई लूटता खसोटता कोई खून चूसता,
आबरू लुट रही तेरी माँ की देख
क्यों खून पानी हो गया क्यों आता नहीं उसमे उबाल,
क्यों गहरी नींद सोया है मेरे लाल,
क्या बात है जो तू खामोश है,
माँ की आत्मा झकझोरती और धिक्कारती
उठा ले क्रांति की मशाल ये माँ तुम्हे पुकारती
सुनो सुनो सुनो ये माँ तुम्हे पुकारती,

- कुसुम 
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Mera Raj dulara - Kusum Sharma

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मेरा राजदुलारा आँखों का तारा
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सो जा मेरे राजदुलारे, तुम हो मेरी आँखों के तारे
माना तेरे पास नहीं मै, पर तुझसे भी दूर नहीं मै
हरदम तेरे साथ रहूंगी, चारो पल में पास रहूंगी
निदिया रानी आएँगी, तुझको वो सुलायेंगी
चंदा मामा आएगा, झुला वो झुलायेगा
परियां रानी आएँगी, लोरी तुझे सुनाएंगी
मेरा राजा सो जायेंगा, निदिया में वो खो जायेंगा ।

उस समय मै तेरे सपने में आकर, तुझ पर प्यार लुटाओंगी
तेरे नन्हे हाथो को छु कर, तुझसे लड़ लड़ाऊँगी
तुझ पर प्यार लुटाऊगी, तुझ को ये समझाऊगी
माना तुम मुझको देख न पाओ, लेकिन ये एहसास कराऊगी
चलते हुए तुम गिर जाओ, तो आकर तुम्हे उठाऊँगी

टौमी तेरे साथ रहेगा, तुम सोओगे वो सोएंगा, तुम खेलोगे वो खेलेगा
तुम दोनों की मस्ती देख कर, मै भी मस्त हो जाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे, कल फिर मिलने आऊँगी
परियों के साथ मिलकर, तुझको तारो की सैर करवाऊँगी
सो जा मेरे राजदुलारे तुम हो मेरी आँखों के तारे ।

- कुसुम 

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Kaate - Amulya Bharti

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काटें
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रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
ओसो से नहाती देखी ।
पत्तियों के ओंठ से सरमाती देखी ॥
रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
                                          सज - धज मुस्कुराते देखी ।
                                          भ्वरो के लिए बैठी बेकरार सी देखी ॥
                                          हवा के संग खेलती सी  देखी।
                                          अपने के लिए इंतजार सी देखी ॥
                                          रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
                                           काँटो के संग हँसती देखी ॥
औरो के लिए अर्पण सी देखी ।
टूटना ही जीवन सी देखी ॥
देखी कर्म ही झुक जाना ।
कलियो के स्वागत मे देखी ॥
स्वय ही मिट जाना ।
जब -जब देखी ऐसी ही देखी ॥
रंग - बिंरगी फूलो को देखी ।
काँटो के संग हँसती देखी ॥
         
   - अमूल्या भारती

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Maa - Vivekanand Joshi

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  माँ
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तू उम्मीद है
 तू हि धूप है
 तेरा ही ये जहाँ
 "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"
                    तुझ से ही तो मैं हूँ माँ
                    तू ही है खुशी
                    तू ही है हँसी
                    एक पल को भी रूठे मुझसे
                   वो दिन अब तू कभी ना लाना
                   तू ही है मेरी दुनिया
                  "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"
 तू एह्सास है
 जिसके आगे शब्दों ने भी सर झुकाया
 और मैं बस इतना ही कह पाया
 कि तेरा साया रहे सदा
 आखिर "तुझ से ही तो मैं हूँ माँ"

- विवेकानन्द जोशी

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Kanya - Puneet Jain

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कन्या - पुनीत जैन
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सुनता आया हूँ बरसों से.. की बेटिया तो घर की शान होगी,
पर किसने सोचा था की .. आते ही उनकी जिंदगी मौत के नाम होगी !

यूँ तो देवी बना पूजा करते हो मंदिरों में,
फिर क्यूँ दिखाई देती है हमें वो कचरे के ढेरो में !

राहगीरों का मनन भी पसीज उठता हैं,
जब तुम्हारे अंश क टुकड़े को कुत्ता खाता हैं !

रे निर्लज मानव..कैसे तू ये खता कर लेता है,
अपने ही अंश के टुकड़े को जुदा कर लेता है ?

बेटी से अगर इतनी ही नफरत है तो फिर क्यूँ पूजा करता हैं,
क्यूँ औलाद की उम्मीद में देवी के दर दर तू भटकता हैं !!

अरे !! बेटे तो अपने हो कर भी पराये हैं,
पर बेटियों ने तो पराई हो कर भी दो दो घर बसाए हैं !

नारी न होती तो तुम दुनियां में कैसे आते,
कैसे अपनी माँ के आँचल से यु लिपट जाते !!

विनाशकाले विपरीत बुद्धि का कथन सत्य ही समझो,
आज देवी का कातिल इंसान ख़तम ही समझो !

एक बेटी का नहीं एक माँ का भी वध करते हो,
अपने स्वार्थ की खातिर उसका दिल भी नहीं समजते हो !

ज़रा खुद को कल्पित करो उन् कंटीले नुकीले झाडो में,
पता चलेगा, कैसा दर्द होता है उन् कांटो से हुए जख्मो में !!

रे पापियों अब तो तरस खाओ, कुछ तो रहम करो,
अपने स्वार्थ की खातिर उनको यु ना ख़त्म करो.

इसलिए कहता हूँ यारो बेटी को धरती पर आने दो,
उसके पावन कदमो से इस कलयुग को स्वर्ग बन जाने दो.


- पुनीत जैन

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Dahej ek ku-riti - Puneet Jain

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 दहेज़ ...
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आज फिर मेरा कलेजा चिर गया,
दहेज़ का दानव फिर किसी की जान लील गया.

एक लड़की.. शादी कर अनजाने घर वो आती है,
बहु नहीं, एक बेटी बनने की कोशिश करती है.

फिर ऐसा क्यूँ होता है, पैसो से क्यूँ उसका मोल आँका जाता है,
दहेज़ की खातिर क्यूँ उसे प्रताड़ित किया जाता है.

क्या होता होगा जब उसके माँ-बाप को पता चलता होगा,
देख बेटी की ये दशा… कलेजा मुह को आता होगा.

क्यूँ तुम्हे बहु से नहीं, पैसो से प्यार है,
पति का भी देखो कितना कठोर व्यवहार है.

जरा सोचो.. तुमने भी तो बेटी जनी है.
वो भी तो किसी घर की बहु बननी है.

कल को उसके साथ भी ऐसा होगा,
क्या  तुमसे वो सहन होगा ,

अरे .. अब तो संभलो !! इस दहेज़ के दानव को रोको.
अपने लालच की खातिर मत किसी को आग में झोंको.

तुम्हारी बहु भी तो किसी की बहिन, किसी की बेटी है,
अब भी न संभाले तो इस दहेज़ की आग में तुम्हारी बेटी है.


- पुनीत जैन
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Bharat ka yuvak - Puneet Jain

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भारत का युवक
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युवा हूँ मैं नव भारत का, युवा हूँ में इस समाज का ,
हीरा हूँ में राष्ट्र उन्नति के इस सुनहरे ताज का .

ठान लू 'गर में कुछ भी, तो कर दिखलाता हूँ ,
नव अंकुरित पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता हूँ .

हिला न सके मुझको कोई ऐसी बुनियाद हूँ में ,
बदलना पड़े देश को कानून ऐसी फ़रियाद हूँ में .

खेल, शिक्षा, व्यापार, समाज हर जगह परचम फेहराया हैं ,
आज मेरी ही बदोलत ऊँचे शिखरों पर भारत का ध्वज लहराया हैं .

बस सकू सबके दिलो में , ऐसा युवा बनू में इस समाज का ,
धर्म, जात-पांत में ना पडू, पाठ पदु नैतिक रिवाज़ का .

बनू श्रवण सा आज्ञावान, अर्जुन सा धीर गंभीर ,
बन पथिक हिमालय का , होउ उनती शिखर का अधीर ,

युवा हैं तू आज का.....
सत्य को हत्यार बना , आत्मसमान को सारथि,
निर्भय हो चला चल, रुकना ना ऐ भारती .
तू हैं भविष्य भारत का, तू हैं इसकी आरती

बना वही भारत, जो गाँधी का अपना था ,
जला दे वही ज्योत, जो नेहरु जी का सपना था .

उठ जाग मुसाफिर नया लम्बा सफ़र तय करना हैं,
संसार में फिर से नया जोश भरना हैं .

लौटना है तुझे हर माँ का सम्मान,
बना रहे हर वीर का बलिदान ,

हो पुरे संसार को तुझे पर नाज ,
उठ जाग युवा. पहना दे भारत को उसका ताज ।

 - पुनीत जैन

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